Wednesday, February 23, 2011





राही को ढूंढती मंजिल नहीं, उसे स्वयं ही चलना होता है,
हो जितना भी सच्चा राही, रस्ता, उतना ही मुश्किल होता है...

~जयन्त
१ मार्च २०११
१० फाल्गुन १९३२

Tuesday, February 22, 2011

*** राह के अँधेरे...***




चलते चलते अचानक,
जब सूर्यास्त हो जाए,
और राह के अँधेरे जब,
बढ़ कर तुझे लीलने लगें...

कभी ना थकने वाले,
कभी ना रुकने वाले,
कदम जब खुद बखुद,
पीछे हटनें लगें...

घनघोर बरसती,
बारिश में जब,
सर के साये भी,
गलनें लगें...

चंहु और विपदा से,
जब घिरा हो तू,
निराशा के जहरीले नाग,
तुझे डसने लगें...

तब याद इसे,
रखना राही,
होंगे ऐसे,
इंसान बिरले....

जो जग में,
जीवित रहकर भी,
इन तकलीफों से,
ना हों गुजरे.....

है सफल वही,
इस दुनिया में,
जिसने कभी,
हौसले नहीं हारे.....


जयन्त
(फरवरी १५, २०११)
(माघ १६, `१९३२)

Thursday, February 10, 2011

** तू अकेला नहीं.... **



एक तू ही अकेला नहीं,
आग के दरिया से गुजरे हैं कई,

पाँव के छालों से ना घबरा,
जल कर भी उस पार पहुचें हैं कई,

जीवन कभी रुकता ही नहीं,
साँसों के संग चलना होगा तुझे भी,

उसे ही मिलेगी जयमाला,
जो स्वीकारेगा यह चुनौती....

~Jayant
10 Feb 2011

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