Saturday, June 6, 2009

*** दिशाएँ बनी अग्नि की लहरें.. *** (~जयंत)


दिशाएँ बनी अग्नि की लहरें,
वायु-कण भी थे सहमें सहमें...
बहती थी मृत्यु हवाओं में,
तब कूद पड़ा था वो उस रण में...

मैं पीछे ना हटूँ, उसका प्रण था,
माँ पर न्यौछावर कण कण था...
साहस बढ़ता उसका हर क्षण था,
भीषण होता जितना भी रण था...

विस्मृत कर वो फेरों की क़समें,
सब पीछे छोड़ गया एक पल में...
माँ को छोड़, बसा माँ* को मन में,
जीवन उसने दांव लगाया क्षण में...

शौर्य और वीरता जिसका धर्म था,
रण करना ही उसका कर्म था...
साहस से रिपु दमन जो करता था,
वो भारत माँ का एक रक्षक था...

नहीं कोई उस जैसा इस स्रष्टि में,
फौलाद बहे उसकी नस नस में...
निकले जो बलिदान की आशा में,
उसे रोकना अब किसके बस में...

जहाँ काल नाचा करता था,
और साहस भी थर थर कांपता था...
वहाँ वो अद्भुत रण करता था,
आख़िर वो एक महानायक था....


( मेरे देश के वीर सैनिकों को.. शत नमन॥ कोटि कोटि प्रणाम॥)

~जयंत
७ जून २००९

18 comments:

अजय कुमार झा said...

jayant जी..aapkaa shabdkosh बहुत ही samriddh है..sundar rachnaa ...बढ़िया लगा...

Jayant Chaudhary said...

अजय जी,

आपके प्रोत्साहन का अत्यंत आभारी हूँ मैं..
मेरी कविताओं की रगों में आप जैसे प्रेरक पाठकों के टिप्पणियाँ ही लहू की भाँति जीवन प्रदान करती हैं..

आगमन का बहुत धन्यवाद.

~जयंत

Nirmla Kapila said...

जयंत जी बहुत ही सुन्दर सार्थक और देश के रक्षक का सच नमन है आपकी कलम को अगली पोस्ट का इन्तज़ार रहेगा बधाई

Priyanka Singh Mann said...

जयंत जी

जितना सुंदर शब्दों का चयन है उतना ही सुंदर उन शब्दों का सार ..बहुत उत्तम !

अच्छा लगता है जब पाती हूँ की मेरी तरह सोचने वाले बहुत से दीवाने हैं॥

आप की जगह ब्लॉग पर ख़ास है क्योंकि महीनो बाद जब फिर लिखना शुरू किया तो आप उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने यह अहसास दिलाया कि मैंइतना बुरा भी नहीं लिखती :-)..मेरी जय सुनने के लिए तो मैं अभी बहुत तुच्छ हूँ पर हाँ जब आप के शब्दों मैं देश की,सेना की जय जयकार गूंजती है तो मन हर्ष से भर उठता है । यूँ ही लिखते रहें ..मेरी सारी शुभकामनाएं आप के साथ हैं।

जय हिंद !!

प्रियंका

AlbelaKhatri.com said...

aapki ojasvi rachna ne meri dhamaniyon me bhi rakt ka pravaah tez kar diya hai............
waah wah
kya baat hai
anupam
anootha
abhinav anand mila
badhai..............

ओम आर्य said...
This comment has been removed by the author.
ओम आर्य said...

जितना कहा जाये उतनी ही शब्द कम पडती जा रही है.......निशब्द

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहूँ पढने के बाद जो मन में आया वो ऊपर साथियों ने कह दिया। सच आपके लेखन का जवाब नही।

Jayant Chaudhary said...

आप सब का प्रेम और प्रोत्साहन देख कर मन हर्षित हो गया,
और साथ ही साथ आशा से ओत-प्रोत हो गया,
कि आज भी कई हैं,
जो सैनिकों का सम्मान करते हैं....

जय भारत
जय भारती
जय सेना
जय सिपाही...

~जयंत

Priya said...

एक देशवासी का देश प्रहरी को कवितापूर्ण, ओजस्वी नमन बहुत पसंद आया .......जय हिंद

परमजीत बाली said...

bahut sundar rachanaa hai

vandana said...

veerras se ot-prot kavita hai..........bahut hi prabhavshali varnan ...........desh ke prati samman aur debhakti ki bhawana ko darshati kavita.shandaar.

mark rai said...

very nice...kaaphi dino baad aaya..kuchh saarthak padhne ko mila...

Harkirat Haqeer said...

Jayant ji ,

Desh prem par aadharit shandar kavita ....kuch aisi hi kavitayen maine kargil yudh ke douran likhi thi ....!!

Aapka ye zazba hamesa kayam rahe .....!!

रंजना said...

Aapke in pavitra aur vandneey bhavon ko main naman kartee hun...

Bahut hi sundar dhang se aapne bhavnaon tatha prasang ko udhrit kiya hai....

अमिताभ श्रीवास्तव said...

"वीरता और कविता
दोनो मे कितनी समता
आपकी लेखनी मे
अब मन बहु रमता ..///"
जयंत जी
दिन ब दिन
बेहतर हो रहे आपके शब्द
वाकई आपको उच्चता प्रदान करते हे.
बधाई ...

गौतम राजरिशी said...

my salute to you, sir!

ARVI'nd said...

chha gaye aap to......vaah kya andaaz hai likhne ka...rag-rag me josh bhar diya aapne

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