Friday, February 19, 2016











तुम जितने अफज़ल पैदाओगे,
हम चुन चुन कर उनको मारेंगे,
जितने भी हैं गद्दार यहां,
उनके सीने पे तिरंगा गाड़ेंगे....

Friday, July 11, 2014

उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..



उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..
कुछ छोड़ चला हूँ, तो कुछ बाँध चला हूँ..

मीठी सी जो यादें हैं उन्हें गाँठ रखा है,
कड़वी सी कुछ साँसों को मैं धो चला हूँ...

नादान से बचपन को अबतक साथ रखा है,
जहरीले से विचारों को मैं गाड़ चला हूँ...

नटखट से मेरे मन को बेलगाम रखा है,
बेबसी की बेड़ियों को मैं तोड़ चला हूँ...

नए बुने सपनों को भी आखों में रखा है,
निराशा की मरू को उमंगों से सींच चला हूँ...

साँसों को अपनी मैंने अभी बाँध रखा है,
जीवन को जीत, जीते-जागते मैं सदा चला हूँ...

उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..
कुछ छोड़ चला हूँ, तो कुछ बाँध चला हूँ..
जितना भी जिया, उतना भरपूर जिया हूँ....

(४१ अच्छे साल....)

Monday, January 13, 2014

नौका - नाविक

सागर की लहरों पर,
बढ़ती नौका में बैठे,
थपेड़ों से हिलते हुए,
कभी बाएं, तो कभी दाएं,

कभी मद्धम,
और कभी मंथर,
कहीं सुनहरे उजियारे में,
और कभी अंधियारे से घिर कर,

कभी मिली पुरवाई या फिर,
कहीं किसी तूफ़ान में फंसकर,
किन्तु आगे बढ़ते, हुए निरंतर,
किन्तु आगे बढ़ते रहे निरंतर,

आज मुझे,
आभास हुआ,
संसार है सागर,
और जीवन एक नौका।।।

~ एक नाविक
 

Friday, December 13, 2013

तू भिखारी नहीं है....

मांग मत,
तू भिखारी नहीं,
हाथ उठा, जोर लगा,
कि नाम तेरा, लाचारी नहीं

जहां पाँव पड़े तेरे,
नदिया बहे, क्रांति का,
चूर चूर हो, गिर पड़े,
किला, बेबसी और भ्रान्ति का

स्वतन्त्र होकर, उड़ चले,
फिर पांखी, तेरी आस का,
बह चले, उस गगन में,
उगे जहाँ सूर्य, प्रगति का 

मत थम,
तू मृत नहीं,
कदम उठा, हिम्मत जुटा,
क्योंकि नाम तेरा, पराजित नहीं।।।।।।।

जयंत चौधरी 
(माँ दुर्गा कृपा !!!)

जीवन मेरा


आँसू जितने जीवन से मिले,
मन बगिया को सींचा मैंने,
पत्थर जितने राहों में चुभे,
उनसे सेतु बांधा मैंने,

अंगारे जितने बसरे मुझ पर,
उनसे जीवन-दीप जलाये मैंने,
काटें जितने चुभे मुझको,
उनसे फूलों को पिरोया मैंने,





 

Wednesday, December 11, 2013

कुछ बेगाने...

सपने,
कुछ सपने,
सपनों में ही रह जाते हैं,
कुछ सपने,
सच होकर,
झूठ बन जाते हैं..।

अपने कुछ, बेगानों से, बेगाने हो जाते हैं,
अपने कुछ, बेग़ागों से भी बेगाने, हो जाते हैं,
कुछ बेगाने,
अपनों से भी अपने हो जाते हैं.....

जयंत चौधरी 

Tuesday, December 10, 2013

जीवन की सीढ़ी

जीवन के हर पल को जीता,
एक अनमने योद्धा के जैसे,
किन्तु अर्जुन नहीं हूँ मैं ,
मेरा कोई कृष्ण नहीं है,

हर सांस तोड़ जाती है,
कुछ पायदान जीवन की सीढ़ी से,
पर पीछे हट जाऊं मैं,
इसका कोई प्रश्न नहीं है,

~ जयंत चौधरी



 

Wednesday, November 2, 2011

सफलता क्या है?

जीवन की राह में, उठते गिरते, गिरते उठते, कदम बढाते जब मैं जा रहा था... तब, एक दिन कुछ ऐसा कोहराम मचा कि कभी ना रुकने वाले मेरे कदम, एकाएक थम गए। जैसे गाडी की तेज लाइट के प्रकाश से खरगोश ठिठक के जम जाता है... ठीक उसी तरह मुझे किसी ने जलते हुए प्रकाश में थमा दिया।

जलता हुआ... क्योंकि उसका उद्देश्य जलाना था, ना कि सच में प्रकाश दिखाना। जैसे जलते हुए लक्कड़ से रौशनी तो निकलती है, किन्तु जलन भी होती है, वैसे ही उस घटना में मैं जला तो, और अचंभित होकर थम गया।

मेरा विगत १०-१२ वर्षों का इतिहास, मेरी पथराई आखों के आगे नाच गया...
क्या खोया,
क्या पाया....
किसका हिसाब रखूं,
क्या समय व्यर्थ गवाया?

कितना कुछ छोड़ के, कितने सपने तोड़ के, मैंने जो कदम बढाया था, उस राह पर एक ऐसा मोड़ आया कि समय थम गया और मैं अतीत में विचरण करने लगा।

सफलता क्या है?
एक प्रश्नचिन्ह मेरे आगे मुहं बाएं करके खडा हो गया....

विद्यालय से लेकर aaj tak , अपने माताजी और पिता जी को हमेशा गौरवान्वित करने वाला मैं, विफल बताया गया... तो लगा कि एक पहाड़ गिर पड़ा। मैं अपने आप को सदैव सफल (अधिकाँश तौर पर) समझने वाला, जब आसमान से गिरा तो धरती पर पछाड़े खाने लगा।
थोड़ी देर कलपने के बाद सोचा कि सफलता किस तरह नापी जाती है?
क्या हर कोई सफलता को एक ही तराजू में तोलता है?
क्या सब् सिर्फ पैसे, मान, प्रतिष्ठा और सम्म्रद्धि पाने से ही सफल होते हैं?
इसमे से बीच के दो तो मेरे पास हैं, बहुत नहीं, परन्तु सामान्य से कहीं ज्यादा... आगे और पीछे वाले सामान्य से थोड़ा जयादा... किन्तु मैं फिर भी असफल हूँ॥
क्यों

आप कैसे नापते हैं सफलता?




Tuesday, September 6, 2011

अन्ना का तूफ़ान...

अन्ना अन्ना अन्ना.....
अन्ना का जब तूफ़ान उठे,
कोहराम मचे, बेलाम चले,
धरती डोले, आकाश हिले,
परिवर्तन का सैलाब उठे...
अन्ना अन्ना अन्ना....

Wednesday, March 16, 2011

हास्य कवि सम्मलेन - डलास २०११




Rip Roaring Laughter, Non-stop Humor, Heart Warming Recitals... If these are suite your taste buds, then come join us....

This great show will be served with fantastic food... We will fill your belly first, then your heart-for-humor will be filled.

Entrance Open: 6 pm
Complimentary Dinner Served: From 6:00 pm till 7:45 pm
Kavi Sammelan: 8:00 pm till 11:20 pm (No Intermission)
(Seating begins at 7:30 pm)
Admission Per Person: $25, VIP, VVIP
(Reserved seats for VIP & VVIP tickets)


आइये, पधारिये...

अन्तराष्ट्रीय हिंदी समिति प्रस्तुत करते हैं....

हास्य कवि सम्मलेन २०११

हंसते हंसते, पेट में बल पड़ जायेंगे
सीट पे आप उछल उछल जायेंगे,
कुछ कवितायों के आप तब मजे लेंगे,
कुछ को आप वर्षों तक दुहराएंगे....

यूँ तो कई सम्मेलनों में आप गए होंगे,
पर इसे आप सबसे अलग ही पायेंगे,
और हमारे साथ साथ आप भी दुहराएंगे,
भई इसमें तो हम बार बार आयेंगे....

आइये, पधारिये.....





Blogvani

www.blogvani.com

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