जलता हुआ... क्योंकि उसका उद्देश्य जलाना था, ना कि सच में प्रकाश दिखाना। जैसे जलते हुए लक्कड़ से रौशनी तो निकलती है, किन्तु जलन भी होती है, वैसे ही उस घटना में मैं जला तो, और अचंभित होकर थम गया।
मेरा विगत १०-१२ वर्षों का इतिहास, मेरी पथराई आखों के आगे नाच गया...
क्या खोया,
क्या पाया....
किसका हिसाब रखूं,
क्या समय व्यर्थ गवाया?
कितना कुछ छोड़ के, कितने सपने तोड़ के, मैंने जो कदम बढाया था, उस राह पर एक ऐसा मोड़ आया कि समय थम गया और मैं अतीत में विचरण करने लगा।
सफलता क्या है?
एक प्रश्नचिन्ह मेरे आगे मुहं बाएं करके खडा हो गया....
विद्यालय से लेकर aaj tak , अपने माताजी और पिता जी को हमेशा गौरवान्वित करने वाला मैं, विफल बताया गया... तो लगा कि एक पहाड़ गिर पड़ा। मैं अपने आप को सदैव सफल (अधिकाँश तौर पर) समझने वाला, जब आसमान से गिरा तो धरती पर पछाड़े खाने लगा।
थोड़ी देर कलपने के बाद सोचा कि सफलता किस तरह नापी जाती है?
क्या हर कोई सफलता को एक ही तराजू में तोलता है?
क्या सब् सिर्फ पैसे, मान, प्रतिष्ठा और सम्म्रद्धि पाने से ही सफल होते हैं?
इसमे से बीच के दो तो मेरे पास हैं, बहुत नहीं, परन्तु सामान्य से कहीं ज्यादा... आगे और पीछे वाले सामान्य से थोड़ा जयादा... किन्तु मैं फिर भी असफल हूँ॥
क्यों
आप कैसे नापते हैं सफलता?

