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Sunday, February 10, 2019

पूरबाई की एक नई दिशा है...

पुरबाई में एक नई दिशा है,
जीवन की एक नई दशा है..

चीर निराशा, फिर बहे उमंग,
दिल की धड़कन, जैसे जल तरंग... 

पल पल महका लहका है,
जीवन भी चहका चहका है...

है मस्त पवन या मेरा मन,
ये दृष्टि अपार जैसे नील गगन...

क्यों अब सब बदला बदला है,
जीवन भी उजला उजला है...

फिर उड़ें परिंदों सी आशाएँ,
नहीं शेष कोई भी अभिलाषाएँ...

क्यों मिटी भ्रांति भ्रांति भी है,
जीवन में अब कांति कांति भी है...

क्या बदल गया, या ज्ञात हुआ,
संघर्ष अब भी हैं, पर मन शांत हुआ...

क्यों अब लगता नया जन्म सा है,
जीवन में परम उत्कृष्ट उत्कर्ष सा है... 

ईश्वर ने दी एक नई दिशा है,
जीवन की ये एक नयी दशा है.....

- जयंत चौधरी (समर शेष)
(समस्त ईश्वरीय तत्वों और प्रेरणाओं को समर्पित)
०९-फ़ेब्रूएरी-२०१९

Thursday, February 7, 2019

आओ, कुछ नया करें.....

आओ, कुछ नया करें,  जीवन की किताब फिर पढ़ें,
खोलें वो अद्भुत से पन्ने, लिखे सुनहरे सपने जिनमें,

कुछ खट्टे से दिन, मीठी रातें,  मुहल्ले के मित्र, कक्षा के यार,

सच्चे रिश्तों के पल, प्यारी बातें, नहीं लंबा बैर, बस प्यार अपार,

वो ममता के पल, माँ का प्यार,  
और सिर पर सदा पिता का हाथ,

बहन संग थोड़ा लाड़ दुलार,  और खेल में, भाई के संग दो दो हाथ,

पढ़ें वो उत्साही, जोशीले क्षण,  
आशा के सामने निराशा का समर्पण,

और सुनें प्रेरक क़िस्से फिर से,  बुने सपनें, जो बनें मन का दर्पण,

पन्ने फाड़ व्यथाओं के,  
मिटाएँ शब्द काली स्मृति वाले,

सम्हाले सुंदर पलों के पन्ने, जीवन को सँवारने वाले,

मन पर चढ़ी धुल को झटकें,
जैसे वसंत में नयी कलियाँ चटकें,

समर शब्द नए, रंगीन लिखें, बेरंग पन्नों को सुनहरा कर दें....

~ जयंत चौधरी (समर शेष)

०६-०२-२०१९
(पुनः ०८-०२-२०१९ - प्रेरणा प्राप्त)

Monday, February 4, 2019

न विजय की चाह, न पराजय का डाह...

न कोई आस,
न कोई प्यास,
मात्र, जीवन जीने की अमिट अभिलास। 

न रातों के अँधेरे,
न सुबह के उजाले,
मात्र, अस्तित्व के होने का अहसास।

न रंगों की बरसात,
न मरू का पाश,
मात्र, अपने कर्तव्यों का भास। 

न विजय की चाह,
न पराजय का डाह,
मात्र, मन में कर्म प्रण का वास। 

न पाप की राह,
न पुण्य की चाह,
मात्र, सद्कर्म करने का प्रयास.... 

~ समर शेष 
०४-०२-२०१९

Saturday, February 2, 2019

एक, उद्यान मधुर...

ये है एक, उद्यान मधुर,
जो कहलाता अंतर मन...

मुखड़े पर फैली ये मुस्कान,
इसकी है मद मस्त सुगंध...

और हँसी की हर एक गूँज,
इस उपवन की है जल तरंग...

इसकी बेलाओं सा इठलाए,
इतराए लहराए झूमे मेरा तन...

गुनगुनाहट मेरे अधरों की,
इसके मधुकर का गुन गुंजन...

बन प्रभा ढली मेरे नयनों में,
इसकी मधुर चंद्र किरन...

यह सुंदर सुरभित शोभित उपवन,
यह उपवन है, मेरा जीवन...

- जयंत चौधरी 
०२-०२-२०१९

Wednesday, January 30, 2019

संघर्ष अमर हो जाता है...

परिणामों की चिंता किसे?
संघर्ष अमर हो जाता है... 
कभी विजयी होने वाला,
कभी बलिदानी भी हो जाता है.... 

अंत अगर मनोवांछित ना हो,
वो तब भी अनंत हो जाता है.... 
जो तन, मन, प्राण, और हर कण,
हर क्षण, साहस से रण कर जाता है... 

~ जयंत चौधरी
(माँ दुर्गा को समर्पित)
३१-०१-२०१९



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