Wednesday, March 25, 2009

** अथक, वो अंत तक मृत्यु से लड़ा था .**


ग्रीष्म की झुलसाने वाली लपटों से,
क्रोधित
दिनकर के अतिप्रचंड तेज से,
कोयले
सी सुलगती तपती धरती से,
अविचल, वो डटकर खड़ा था

मेघ
जब रूठकर गुम हुए थे अम्बर से,
नदी
ताल भी लुप्त हो रहे थे धरा से,
विमुख
हो रहा था जब जल जीवन से,
अडिग, वो तब भी खड़ा था

कटता
रहा छिन-छिनकर, शीत दंश से,
ठिठुरता
रहा अन्दर तक, भारी हिमपात से,
पराजित हुए जब जड़-चेतन, श्वेत काल से,
अजेय
, वो तब भी खड़ा था
(श्वेत = हिम/बर्फ)
(काल = समय/मृत्यु)

पतझड़ की दबे पाँव आने वाली म्रत्यु से,
नग्न
करती जो वृक्षों को, अपने आघात से,
कभी जो थे, हरे-भरे और पत्तों से लदे से,
अथक, वो अंत तक लड़ा था

वो एक पत्ता, बिछुडा ना अपनी डाल से,
टूटा
ना, अन्धगति पवन के तीव्र वार से,
एक
नयी कोपल, जब निकली उसकी जगह से,
हँसकर
, वो तब ही गिरा था

अथक
, वो अंत तक मृत्यु से लड़ा था
और
अंत में, जीवन ही विजयी हुआ था
अथक
, वो अंत तक मृत्यु से लड़ा था
और
अंत में, जीवन ही विजयी हुआ था

~
जयंत चौधरी
(
स्व-रचित, मार्च २३, २००९)
(
टेक्सोमा झील के किनारे)

5 comments:

रंजना said...

वाह !! अतिसुन्दर शब्द चित्रण !!

पत्ते की जिजीविषा के माध्यम से बहुत ही सुन्दर सन्देश दिया आपने....

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण हृदयस्पर्शी इस रचना के लिए आभार.

Jayant Chaudhary said...

कोटि कोटि धन्यवाद, आप जैसे व्यक्तियों के प्रोत्साहन से मुझे प्रेरणा मिलती है।

आभार सहित,
~जयंत

reecha said...

shabdo ka kalatmak roop se chitran itna sundar ban pada hai ki aapki ye rachna parakashtha si lagti hai shabdo aur vicharo ki.keep it up!

Anonymous said...

keep it up!

Harkirat Haqeer said...

अथक, वो अंत तक मृत्यु से लड़ा था।
और अंत में, जीवन ही विजयी हुआ था।
अथक, वो अंत तक मृत्यु से लड़ा था।
और अंत में, जीवन ही विजयी हुआ था।

waah...!! sakaratmak soch ki shandar kavita....!!

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