Wednesday, May 6, 2009

> गाँधी जी की चप्पलें.. <


एक दिन जाने क्या,
मेरे मन में आ गया,
और गाँधी जी की,
तस्वीर लेने चला गया,
दूकान वाला भी,
मेरी सुन चकरा गया,
बस गनीमत समझो,
वो गिर नहीं पड़ा...

बातें सुन कर हमारी,
हैरान रह गया,
हमें नीचे से ऊपर तक,
देख, उसने कहा,
भाई साहेब, आप,
यहाँ के नहीं हो सकते हैं,
सच कहूँ, आप,
१९४७ के मॉडल लगते हैं..

भला बापू का फोटो,
किसलिए लगायेंगे,
क्या उनके फोटो के,
सामने रिश्वत खाएँगे,
मैंने कहा, क्यों,
पुलिस वाला लगता हूँ क्या?
ये रोग पुलिस को है,
जिसकी ना कोई दवा..

जब तक वो,
खुले आम नहीं खाते हैं,
हराम का माल,
पचा नहीं पाते हैं,
आम आदमी को,
मनमाना चूसते हैं,
दिखावे को, फोटो,
बापू का चिपकाते हैं..

मैं तो उनका,
एक सच्चा भक्त हूँ,
ऊपर से नरम,
अन्दर से सख्त हूँ,
जो दमन के विरुद्ध,
निहत्था खड़ा हो सकता है,
वही अन्दर से सचमुच,
फौलाद हो सकता है...

अब तो वोह,
सचमुच गिर गया,
और उसके मुहँ से,
सत्य निकल गया,
अरे ये बातें तो,
बापू के साथ चली गई,
बस उनकी चप्पलें,
चश्मा, कटोरी रह गई...

उस चश्मे पर भी धन की,
कालिख सी जम गई,
नेताओं की आखों के आगे,
देश की इज्जत बिक गई...

जो सपना उन आखों ने,
इस चश्मे से देखा था,
वो राम-राज्य बस अब,
एक सपना ही रह गया,

और चप्पलों से, नेताओं ने,
खूब अपना काम निकाला,
उन्हें सिंहासन पर रख,
अपना भ्रष्ट राज्य बढ़ा डाला,

जो उन चप्पलों की,
धूल मात्र भी ना थे,
वो ही उनका नाम,
धूल में मिलाने लगे,

देशी छोड़ सिर्फ़,
विदेशी पीने लगे,
सरेआम संसद में,
चप्पल चलाने लगे...

एक रही कटोरी,
एक छोटी सी प्लेट,
उनको भी इन भ्रष्टों ने,
अपने में लिया समेट,

जिस से महात्मा ने,
सबसे बाँट कर खाया,
उनकी ही पार्टी वालों ने,
पूरा देश बेशर्मी से पचाया,

जो गरीबों को जाना था,
इन दुष्टों के पेट में गया,
घोर गरीबी है, फ़िर भी,
मेरा देश महान बन गया...

जिसने पूरा ही जीवन,
सादगी में बिताया,
उसके चंद बचे टुकड़ों को,
लोगों ने नीलाम करवाया,

गाँधी की ही पार्टी ने भी,
खूब अपना कर्तव्य निभाया,
धरोहर लाने के लिए,
एक भी कदम ना उठाया...

हमने कहा, यहाँ तो भाई,
विसंगतियों का ही खेल है,
पर गनीमत है, कि अब भी,
एक भारत माई का लाल है,

जो अपने कमाए पैसे से,
राष्ट्र-पिता की अमानत वापस लाया,
और बापू जिसके विरोधी थे,
उसी से उसने, पैसा कमाया,

कांग्रेस ने उस पर भी,
श्रेय लेने का प्रयास किया,
और गाँधी जी के सत्य के,
सिन्धांत को खुले-आम दफना दिया,

अब मैं भी गाँधी जी की,
तस्वीर लेकर क्या करूंगा,
वो सिर्फ़ तस्वीरों में रह गए हैं,
इस सच्चाई से कब तक बचूँगा.....
इस सच्चाई से कब तक बचूँगा.....

~जयंत चौधरी
६ मई २००९
(गहन दुःख से भरे ह्रदय से...)

(Artwork by wpclipart)

19 comments:

ARUNA said...

वाह क्या गांधीगिरी है! तो आप गाँधी जी की तस्वीर लिए बिना ही चल पडे?

Jayant Chaudhary said...

उन्हें मन में बसा लिया...
बस और क्या..

~जयंत

Udan Tashtari said...

वाकई, इतनी दुर्लभ वस्तु लेकर क्या करोगे.

AlbelaKhatri.com said...

choudhry saheb,aap k blog ko dekh kar hindi k amit gaurav ki aatmik
anubhooti ho rahi hai,aap dhanya hain jo vahan raha kar bhi apni matribhasha k srijan kalash ko aur bhi samriddh kar rahe hain.........
BADHAI,,main bahut bar dallas aaya hoon...aap mere blog par aaye mujhe bahut sukh mila...DHANYAVAAD
aate rahiyega

अल्पना वर्मा said...

नैतिक मूल्यों का पतन is स्थिति का कारण है.उनके आदर्श अब कहाँ अनुसरण करते हैं लोग?

Jayant Chaudhary said...

Khatri Ji,

Aapake aagaman kaa dhanyawaad..
Dikhe ab aap Dallas ke baad..
Woh shaam rahi bahuton ko yaad..
Jab chakhaa thaa kavitaa kaa swaad...

Aate rahiyegaa..

~Jayant

Jayant Chaudhary said...

Sameer Ji,

Sach hai.
Itani kooval kahaan hai..

~Jayant

निर्झर'नीर said...

accha kataksh kiya hai jayant jii

अमिताभ श्रीवास्तव said...

priya jaynt,
sach ko kataksh me pesh kar hazam karaya jaataa he, sach ka ise durbhagya kahe yaa soubhagya?
bahut sundar tarike se aapne apni baat kahi he/gambhirta vyaap gai/
ab aap par aataa hoo-
aap aatmiya bante jaa rahe he/isiliye mujhe apne desh par naaz he/ ynha sanskaar aour sabhyata reesti he/ aapki baate maan aour maryada se lipti itna adhik prem bahati he ki mera antahsthal bhig jaataa he/ yahi hamare bharat ki shaan he//is mitti ke sapooto ki baat hi kya/
kalaa(art) lachili hoti he aour yahi ishvar ka shrangaar he/ aapki pratibha nikhrti rahe, aap kavya ke jariye apni kalaa ko vistaar dete rahe, meri shubhkamnaye he/

mark rai said...

भाई साहब आप यहाँ के नहीं हो सकते ..विदेश से आये है ......सोचिये हम ऐसे क्यों हो गए ..क्या पहले भी ऐसे ही थे ..

Shefali Pande said...

बापू के सिद्धांत की जो खिल्ली उड़ाते हैं
वही उनकी फोटो पर हर साल हार चढाते हैं

शोभना चौरे said...

गाँधीजी के सीधांतो को समझकर आप जैसे युवा उनके मार्ग पर चलते है तो ये प्रवर्तन का शुभ स्ँकेट है |
न्ही तो जैसा की अपने वर्णन किया ही है देश के कर्णधारो का |
कभी क्वि प्रदीप जी ने लिखा था
रामराज्य की तेरी कल्पना ,उड़ी हवा मे बनके कपूर.......
बच्चो ने पढ़ लिखना छोड़ा ,तोड़ फोड़ मे है मशगूल
नेता हो गये दल बदलू ,देश की पगड़ी रहे उछाल
तेरे पूत बिगड़ गये बापू दारू बंदी हुई हलाल
फिर भी राजघाट पे तेरे फूल चढ़ते सुबह शाम
चिट्ठी मे सब्से पहले लिखता तुझको राम राम
सुनले बापू ये पैगाम........

Pyaasa Sajal said...

Gandhi ko pasand karne aur na karne waale dono tarah ke logo ko ek rachna ke roop me ye kavita zaroor pasand aayegi :)

Jayant Chaudhary said...

निर्झर जी,

आगमन का धन्यवाद..
आप समझ पाए मेरी बात...
हम रखेंगे इसे याद..

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अमित जी,

आप सचमुच अमित हैं..
आपकी व्वाख्या तो अमिट है...

"आपकी बाते मान और मर्यादा से लिपटी इतना अधिक प्रेम बहाती हैं कि मेरा अन्तःस्थल भीग जाता है"
ये लिख कर आपने बहुत मान दिया है...

"/ yahi hamare bharat ki shaan he//is mitti ke sapooto ki baat hi kya/"
ये कहकर आपने मेरा लिखना सफल कर दिया है और मुझे भावाविभोर कर दिया है..

"aapki pratibha nikhrti rahe, aap kavya ke jariye apni kalaa ko vistaar dete rahe, meri shubhkamnaye he/"
कहकर आपने आशीष दिया है..

सहस्त्र कोटि धन्यवाद्..

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

शेफाली जी,

सच कहा आपने..
आपके आगमन का धन्यवाद...

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

मार्क भाई,

आपने सोचने पर मजबूर कर दिया...
एक बड़ा जटिल प्रश्न खडा कर दिया!!!

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

शोभना जी,

आपके आगमन का आभार..
गाँधी जी तो महान थे,
और महान विचारों वाले थे..
और महानता अजर अमर होती है..
बस कभी कभी लोग सूरज की और मुहं कर के थूकने का प्रयास अवश्य करते हैं...
लेकिन आप तो जानते हैं की उनका क्या होता है!!
:)

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

प्यासा सजल जी,

जिस तरह से आपके नाम में दोनों बातें हैं...
वैसे ही इस कविता में भी दोनों भाव हैं.. :))

~जयंत

Blogvani

www.blogvani.com

FeedBurner FeedCount