Saturday, December 19, 2009

अब काहे का वो, राष्ट्र-गान??


हो गया सरे आम, अपमान
अब काहे का वो, राष्ट्र-गान??
नहीं मोल तेरा अब, संविधान
चुप बैठे रहे गृहमंत्री, श्रीमान

आज़ादी का था जो, नारा
उससे ना रहा अब, नाता
नहीं पूज्य है भारत, माता
कैसा है ये खेल, विधाता?

'लज्जा' नहीं आती इन्हें, ज़रा
जिनने लेखन को बैन, करा
उन चित्रों को तो छोड़, दिया
जिनको हैं बनाते हुसैन, मिया

दुहरी नीति का क्या है, राज
समझा दो हमको भी, आज
दुहरी पहचान की ये है, खाज
देश प्रधान है या है, समाज??


~जयंत चौधरी

मन दुखता है, व्यथित होता है, दुहरापन देख कर... कैसे हम सब् देखते ही रह जाते हैं जब "अभिव्यक्ति" की स्वतन्त्रता के नाम पर सब् चलता है.... और दूसरी तरफ एक और अभिव्यक्ति का गला घोंट दिया जाता है॥
कैसे चुप रहूँ जब 'वन्दे मातरम्' का अपमान होता है... और हमारे 'गृह-मंत्री' भाषण में, उसी मंच से, सिर्फ उसी समुदाय की उसी "आज़ादी की लड़ाई" में उनके योगदान की तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहे होते हैं, जिस आज़ादी की लड़ाई में "वन्दे मातरम" एक युद्ध घोष था!!!! मेरी तो समझ के बाहर है यह बात...
कल को राष्ट्र ध्वज को सलाम, मेरा तात्पर्य है सेल्यूट भी करने से मना कर देंगे, क्योंकि सिर्फ उनके भगवान् को ही सलाम कर सकते हैं??
प्रश्न ये है की आप पहले क्या हैं??
आपकी पहली पहचान क्या है??
धर्म, राष्ट्र फिर प्रांत?
या
प्रांत, धर्म फिर राष्ट्र?
या
धर्म, प्रांत फिर राष्ट्र?
या
राष्ट्र फिर धर्म फिर प्रांत??

किसके पास है उत्तर??

Saturday, October 17, 2009

अमेरिका में राम लीला

आप सब को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...

विगत कई महीनों से राम लीला के कारण अत्याधिक व्यस्त हो गया था॥ अतैव कुछ लिख नहीं पाया॥
आज आपके सामने उस प्रयास का एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ।
http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=8498&Itemid=141

आशा करता हूँ की आपको पसंद आयेगा।

धन्यवाद॥

एक बार पुनः, आप सब का नव वर्ष मंगलमय और हर्षोल्लास से परिपूर्ण हो!!

~जयंत

Tuesday, August 11, 2009

Monday, August 10, 2009

नाटक भगत सिंह - अन्तिम भाग

द्रश्य ३:

<सारे एक के बाद एक आते हैं...>
: मित्रों अब हमें आगे की योजना बनानी है...
सु : (विवश होकर) हमने समझा था की फिरंगी ऑफिसर के वध से फिरंगियों को सबक मिलेगा, उन्हें हिन्दुस्तानी जीवन की कीमत का आभास होगा।
दा : वो हमारी कोई कीमत नहीं करते हैं॥ कीडे मकोडे से भी बदतर समझतें हैं। जहाँ देखिये "dogs and Indians not allowed" के बोर्ड लगे रहतें हैं। अपने ही देश में दुसरे दर्जे का नागरिक, second class citizen बना कर रख दिया है॥ हमारी ही दौलत लूट कर, (रुक कर जोर देने के लिए) हम पर राज चला कर, (रुक कर जोर देने के लिए) हमें ही गुलाम बना रखा है।
रा : सच है, जहाँ एक तरफ़ जनता भूखी मर रही है, (बेबसी से क्रोध की तरफ़) लोगों के पास तन ढकने को कपडा नहीं है, रहने को घर नहीं, और पीने को पानी नहीं, और दूसरी तरफ़, हिन्दुस्तान की संपत्ति विदेश भेजी जा रही है।
आ: यह वक्त है भारत की खोयी प्रतिष्ठा और आबरू को वापस लाने का...
भ: (जूनून में) गुलामी के पुरे जीवन से बेहतर है आजादी की एक साँस, फिर भले मौत आ जाए...
सु : यह लोग सिर्फ़ एक ही भाषा बोलते हैं, एक ही बोली समझते हैं ... हम भी उनकी बोली बोलेंगे।
आ : एक तरीका है मेरे पास ॥ (गंभीर होकर) इन्हे बम की आवाज सुनानी होगी.
: (जोश से) बहुत अच्छे ... क्यों ना हम असेम्बली में बम फेंके।
रा: लेकिन वहां तो बहुत सारे निर्दोष लोग भी होते हैं ॥ वोह ...
भ : (बीच में काट कर).... हम लोगों पर नहीं , खाली जगह में बोम्ब फेकेंगे .. हमारा इरादा निर्दोषों को मारने का नहीं हैयह हमारा उसूल नहीं है और ना ही उद्देश्य॥ इस बार का धमाका सिर्फ़ दिवाली वाले पटाखों जैसा होंगा ॥ आवाज ज्यादा , नुक्सान कम.. लेकिन फिरंगियों को बहुत अच्छे से सुनाई देगी हमारी क्रांति की आवाज।
दा : लेकिन , वहां जरूर पकडे जायेंगे ....
: (हंस कर ) यही तो मैं चाहता हूँ ....... (जोश में ) धमाके की गूंज लन्दन तक सुनाई देगी॥ मुकदमा चलेगा, अखबार वाले उसे छापेंगे और दुनिया उसे पढेगी॥ उसके माध्यम से मैं अपनी बात उन तक पहुचा दूंगा।
सारे: वाह॥
: बहुत अच्छी बात है, मैं यह काम करूंगा।
: (बीच में) वाह बीज मैंने बोया और फसल काटने आप चले?? जी नहीं, मेरा विचार है, सिर्फ़ मैं जाउंगा।
सु: (भाव में) आप स्वार्थी हो चले... भारत माँ की सेवा अकेले करना चाहते है?
: नहीं इसमे बहुत खतरा है॥ मैं अकेला काफी हूँ।
: हम क्या खतरों से डरते हैं? क्यों साथियों?
सारे: कभी नहीं॥ वंदे मातरम्।
: आजाद जी, आपको रहना होगा। आपको संगठन मजबूत रखना होगा।
दा: मैं तो आप के साथ आउंगा। चाहे कुछ भी हो जाए।
रा: भगत, आप कम से कम, बटुकेश्वर भाई को ले जाइए।
आ: लेकिन इसमे आप दोनों की जान का खतरा है।
भ: (हंस कर) मरने से कौन डरता है।
"सर-फरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है,
देखना है, जोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है"
देश के लिए शहादत, जन्नत से बढ़कर...
: यह ठीक है.. बोलिए, वंदे मातरम्...
सब: वंदे मातरम्....

<सब चले जाते हैं... दत्त जी रह जाते हैं॥>
दा: और वोह मस्तानों का टोला निकल पडा॥ वो जोश, वो जूनून, वो देशप्रेम की भावना...
उनके लिए भारत माँ से बढ़कर ना कोई स्वर्ग था, ना ही कोई जन्नत...
पंजाब असेम्बली में धमाका हुआ, भगत और दत्त ने समर्पण किया और मुकदमे को सहारा बनाया क्रांति के प्रचार में॥ सब कुछ योजना अनुसार।
लेकिन, हर देश में हर काल में गद्दार होते हैं जो देश को बेच देते हैं, उनमे से एक ने सुखदेव और राजगुरु को पकड़वा दिया। और सरकारी गवाह बन कर उन्हें सजा-ऐ-मौत दिलाने में फिरंगियों के मदद की।
और इस अभागे बटुकेश्वर को आजीवन कारावास की सजा मिली।

द्रश्य ४:

(
भगत सिंग जेल में हैं, साथ में सुखदेव, राजगुरु और दत्त जी बैठें हैं॥ भगत सिंघ पुस्तक पढ़ रहे हैं॥ इतने में जेलर साहब आते हैं॥)

जे: (आश्चर्य से) अन्तिम घड़ी में भी यह पुस्तक प्रेम... (घड़ी निकाल कर देखतें हैं)चलिए फांसी का समय हो रहा है।
: ठहरिये जेलर साहेब, एक क्रांतिकारी दुसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।
रा: आप भी क्या जाने... हम परवाने इसे अन्तिम घड़ी नहीं समझतें हैं॥
सु: और क्या..वोह फांसी का फंदा हमारे नए और स्वतंत्र जीवन का आरम्भ है।
: रहने दो मित्रों, जेलर साहेब नहीं समझेंगे॥ हम दीवानों की भाषा।
जे: (chuckles) तुम्हारा मतलब हिंसा की भाषा?
: हमने सिर्फ़ उन्ही के विरुद्ध हिंसा का उपयोग किया जिन्होंने पहले हिंसा की थी। हमने किसी भी निर्दोष को नहीं मारा चाहे वोह फिरंगी क्यों ना रहा हो... कभी नहीं॥
जे: लेकिन गाँधी की तरह अहिंसा की भाषा क्यों नहीं?
रा : हमारे रास्ते भले ही अलग हों... लेकिन मंजिल एक है। हम सभी का एक ही लक्ष्य है... सिर्फ़, आज़ादी...
जे: लेकिन तुम सब वो दिन देखने के लिए जिंदा नहीं बचोगे॥
: (हंस कर) जेलर साहेब, वोह पेड़ देख रहें हैं?? उसके फल तो आप खातें हैं, पर जिसने उसे लगाया वोह तो कब का चला गया... माली कभी अपने लिए पेड़ नहीं लगाता॥बस, यूँ समझ लीजिये की हम माली हैं... आजाद भारत की आने वाली नस्लों के लिए हम आज़ादी का पौधा लगा रहें हैं... और उसे अपने खून से सीचेंगे...
जे: (laughs) लेकिन तुम लोगों को फिरंगियों से क्या दिक्कत है?
सु : जब हवा, पानी, और सूरज की रोशनी जैसी निर्जीव चीजें आजाद हैं... तो हम इंसान भी आजाद होने चाहिए।
रा : हमें उनसे कोई जातीय बैर नहीं॥ हमें डेमोक्रेसी चाहिए, इम्पेरिअलिस्म नहीं
जे: Remeber, sun never sets on British Empire.. (chuckles)
: हमारे बलिदानी खून के बादल... उस फिरंगी राज के सूरज को धाक लेंगे॥ हमारे बाजुओं की ताकत, उस राज के चदते सूरज को भी खीच कर अस्त कर देगी।
जे: (Ridicules) तुम्हारी ताकत?? यह बाजू को थोडी देर में कटने वाले हैं..
: (जोश से) इस क्रांति के महासागर में उठते सैलाब को, आज़ादी के उमडते तूफ़ान को...रोक सके, ऐसी कोई ताकत नहीं,
हम बसंती चोले वालों के बलिदानों से उठते आज़ादी के प्रलय को....झेल सके, ऐसी कोई हुकूमत नहीं...
सब: "सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना, बाजू--कातिल में है।"
रा : हमारा एक ही धर्म है... देश-प्रेम।
सु: हमारा एक ही कर्म है... देश-सेवा।
भ: मैं तो भगत हूँ तो सिर्फ़ अपनी भारत माँ का॥
जे: (With emotions) आपकी एक जनम देने वाली माँ भी होगी॥ उसने आपकी शादी के सपने देखे होंगे। अभी आप लोगों की उमर ही क्या है??
: देखे थे ना॥ इसीलिए तो घर छड़ आया... (हंस कर) उसे क्या पता मेरी शादी तो तय हो चुकी थी....देश-प्रेम से।। (चुटकी लेकर) अब आज तो आप बरात निकालने वाले हैं। आपने मेरी वर-माला के लिए फांसी के फंदे का इन्तजाम भी कर दिया है॥ हां हां हां ...
सु: अरे साथियों, यह तो हम सबकी बारात निकाल रहें हैं ना... वोह भी एक साथ।
रा: हाँ और वर-मालाएं भी अच्छी तगडी हैं... हमारा वजन भी झेल सकती हैं... हा हा
जे : मैंने बहुत से लोग फांसी चदते देखे... पर हंसते हंसतवोह नहीं, कभी नहीं॥
: क्योंकी हम वतन के दीवाने हैं, आज़ादी के परवाने हैं... और बलिदान के मस्ताने हैं.
सब: (हाथ में हाथ लेकर)
"मेरा रंग दे बसंती चोलाsss...मेराss रंग दे बसंती चोलाssss...
आज उसी को पहन के निकला हम मस्तों का टोला...
मेरा रंग दे बसंती चोलाss....मेरा रंग दे बसंती चोलाsss..."
जे: आप सभी का देश-प्रेम देख कर... मैं नत मस्तक हो गया हूँ। लेकिन क्या करूँ, मेरी भी मजबूरियाँ हैं (भरे गले से) बच्चों की, बीबी जे, फिनल सीन १...
रेलातेद: सीन , रेलातेद सीन श्र०ट१हीज्ञिश्र्स सीन ६ःईएटाय्ह८ सीन कर मजबूर हैं... अपनी देश-प्रेम की दुल्हन से मजबूर हैं... और सबसे बड़ी मजबूरी है... हमारी बीमार, असहाय, गुलाम माँ.... भारत माँ
(हंस कर) चलिए... शादी का मुहूर्त निकला जा रहा है... हम सब बेताब हैं।
सु: (हंस कर) अरे अब जल्दी करिए॥ इस घड़ी का हमें कब से इंतज़ार है।
रा: (कटाक्ष से) लगता है यह हमें और यातना देना चाहते हैं... जाते जाते भी इनका मन नहीं भरा कोड़े मारने, बर्फ के सिल्लों, गरम सलाखों से... अब इंतज़ार की यातना...
: एक आखिरी बात... आदमी मरते हैं विचार नहीं.. हमारे जाने के बाद और आयेंगे... भारत माँ पर हंसते हंसते बलिदान हो जायेंगे...
"शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले,
शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा..."

सब: वंदे मातरम्... वंदे मातरम्.... वंदे मातरम्...
(
भगत सिंघ, राजगुरु, सुखदेव हाथों में हाथ डाले हंसते हंसते फांसी की और चल देतें हैं... जेलर के साथ... दत्त रह जाते हैं...)

दा: (सबसे).... जानते हैं... भगत की माँ ने उसका नाम "भागां वाला" रखा था। और वोह था भी... भांगा वाला... वतन पर मर मिटा और इससे बड़ा भाग्य क्या हो सकता है?? मैं अभागा रह गया..
वो मस्तानों का टोला निकल गया... पर हमें देश-भक्ति और देश-सेवा का सबक दे गया....वंदे मातरम्!!!
jay हिंद...................

यू ट्यूब पर कुछ हिस्से... हमारे नाटक के... कृपया नीचे दिए लिंकों पर क्लिक करें..

Blogvani

www.blogvani.com

FeedBurner FeedCount