Wednesday, April 1, 2009

- तेरी माँ -



जो कांधा बन, तुझे सहारा देती है,
कभी वो भी, अन्दर से चुपचाप टूटी होगी...

जो तुझे भरपेट खिलाती है,
कभी वो भी, केवल पानी पीकर सोयी होगी...

जो तुझे पंख देकर उड़ाती है,
कभी वो भी, आसमान छूना चाहती होगी...

जो तेरे लिए दिए जलाती है,
कभी वो, अपने सपने भी उसमें जलाती होगी...

जो तेरा भय मिटाती है,
कभी वो, ख़ुद मन-ही-मन भयभीत रही होगी..

जो तुझे सर-आखों बैठाती है,
कभी वो, ख़ुद उपेक्षित सी पड़ी रही होगी...

जो तुझे जीवन अमृत पिलाती है,
कभी वो, ख़ुद घुट घुट कर विष पीती होगी....

तुझ जैसे दुनिया में लाखों हैं,
तेरी माँ, पर लाखों-करोड़ों में एक ही होगी...

जो तू ढूढ़ने निकलेगा,
कोई आत्मा, तेरी माँ जैसी कभी नहीं होगी...

युग-युग और चिर-अन्तर तक
तेरी माँ, अद्वितीय ही होगी, अद्वितीय ही होगी॥

~जयंत चौधरी
(स्व-रचित, २६ मार्च २००८)



13 comments:

neha said...

very nice...........
bahut aachi rachna ki haa

नीरज गोस्वामी said...

बहुत ही अच्छे शब्दों में आपने माँ का गुणगान किया है....सच है माँ जैसे कोई नहीं होती...इस बेहतरीन रचना के लिए आप को नमन.
नीरज

mark rai said...

काफी अच्छी रचना ... माँ तो अद्वितीय ही होती है ...सबसे ऊपर ....शब्द कम पड़ जाते है .....

freespaceofindia said...

kaphi achcha likha h magar i expect something differ from u kyuki aap likh sakte hai . i know u have a potential

Reecha Sharma said...

achchi rachna hai magar don't mind i expect something differ from u because i really know that u have a potential . leag se hatkar aur ek dharre se alag har koi nahi likh sakta. sir pls mere comment ko otherwise na lekar positive lijiyega.

Tripti said...

So true and touching this poem, Infact i observe that your poetry is moslty very toucning.

Will look forward for more!!

Jayant Chaudhary said...

रिचा जी,

आपके शब्दों का मैंने कतई बुरा नहीं माना.
यह तो आपका प्रशंशा करने का तरीका है, इसका अर्थ यह है की, आप मुझ पर और ज्यादा भरोसा करती हैं.
हाँ अपने बचाव में एक ही बात कह सकता हूँ कि यह उस समय कि कविता है जब मैं नौसिखिया था...
बहुत ही कमजोर दलील है.. क्षमा करें...
आगे से और अच्छा लिखने कि प्रेरणा आपने अवश्य दे दी है.. मैं आपका आभारी हूँ.
"निंदक, नियरे राखिये...."
(निंदक याने केवल वोह नहीं जो स्वभाववश,निंदा के लिए निंदा करता हो.. अपितु वो है को सच कहने का साहस रखता हो और गहराई में जा अच्छे से विचार कर, अपने भाव प्रकट करता हो..).

आशा करता हूँ, आप ऐसे ही मेरे शब्दों को पढ़ते रहेंगी, और अपने भाव साफगोई से प्रकट करेंगी..
उसमे मेरा ही स्वार्थ छुपा है... आखिर मुझे और अच्छा बनाना है... :))

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

Tripti Ji,

Thanks a lot for your kind words and becoming my "friend" (I somehow am not comfortable with 'follower' word)..

~Jayant

Jayant Chaudhary said...

नीरज जी,

कोटि कोटि धन्यवाद... बस एक छोटी सी अरज है...
"नमन" ना कहें.. मैं बहुत छोटा हूँ और यह शब्द बहुत बड़ा है.

मार्क और नेहा जी,

आपका आभार... धन्यवाद... आपके साथ से ही मेरी कविता में प्राण आते हैं..

~जयंत

संगीता पुरी said...

क्‍या खूब लिखा है ... बधाई।

Jayant Chaudhary said...

संगीता जी,

धन्यवाद... आप सदैव साथ देतीं हैं.. आगे भी साथ रहियेगा..

~जयंत

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

सही कहा आपने ..माँ अद्वितीय ही होती है

Jayant Chaudhary said...

Lovely Ji,

Thanks for visiting my page and your kind words.

Please keep coming here.

Regards,
Jayant

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