Wednesday, July 7, 2010

~ कबहू बुरा ना बोलिए... ~ जयंत


बुरा ना कबहूँ बोलिए, चाहे क्रोध ताप चढ़ जाय
वाणी ऐसन बाण है, जो कबहूँ व्यर्थ ना जाय

(चाहे कितना भी क्रोध जाए, बुरे वचन नहीं बोलने चाहिए। वाणी के बाण, कभी व्यर्थ नहीं जाते। ये बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को चोट पहुचाती है। बोलने वाला इसलिए, क्योंकि उसके जो भी अच्छा किया वो उसके बुरे वचनों से नष्ट हो जाता है,॥ और सुअने वाला तो घायल होता ही है॥)

हिरदय को वाणी बिंधे, नहि बाणन में वो घात॥
अवसर पे ना रोके तो, बरसन रहे पछतात॥
(वाणों में ह्रदय को आघात पहुंचाने की वो शक्ति नहीं होती, जो वाणी में होती है॥ वाणों का घाव समय आने पर ठीक हो जाता है... किन्तु वाणी काप्रहार समय समय पर चुभता रहता है.. यदि समय रहते उन शब्द-वाणों को ना रोका गया, तो उसने होने वाले चोट/अनिष्ट के कारण, वर्षों तकपछताना होता है...)

वाणी से जो मन छिदे, धागा नहि सिल पाय
पंख कटे फिर से सिले, पाखी उड़ नहीं पाय
(जो मन वाणी से छिद गया हो, उसे धागा भी नहीं सिल पाता। उसकी उमंग, प्रेम और प्रसन्नता उस पंख कटे पक्षी की जैसी हो जाती है, जो उन पंखों केसिले दिए जाने के बाद भी जो उड़ नहीं पाता॥)

~जयंत चौधरी
१३ आसाढ़ / जुलाई
(माँ सरस्वती की प्रेरणा से, मेरे मित्रों अर्चना और मनीष को एक भेंट..)



4 comments:

वन्दना said...

बहुत ही उपयोगी सीख्………………ये वाणी ही तो है जिससे जिसे चाहे अपना बनाया जा सकता है और जिसे चाहे पराया।

Gourav Agrawal said...

first time on your blog :)

Great post my friend :)

please keep writing :)

Divya said...

bahut achhi baat kahi....waise bhi dhyan rakhti hun...aage se aur bhi jyada rakhungi.

Prarthana gupta said...

aapne sach hi kaha hai....i'll think before,i speak....

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