Monday, March 30, 2009

~ अधनंगा लड़का ~


एक देखा अधनंगा सा लड़का, जो,
सड़क पर खड़ा, हाथ फैला रहा था..
हर आती जाती चमचमाती गाड़ी को,
भूंखी आंखों से, उम्मीद से निहार रहा था..

तन पर उसके था, एक छोटा सा चिथडा,
जो शर्म तो छुपाता था, ठंड से बचाता ना था..
एक टूटी चप्पल, और एक फटा पुराना जूता,
पैर के लिए काफी थे, माना इनका मेल ना था..

'शाइनिंग दिल्ली' में यह देख, मन में हुयी पीड़ा,
मैंने पूछा "तेरा ख्याल नहीं रखतें है? कहाँ हैं तेरे पिता?"..
मैल और मिटटी से सना उसका चेहरा, हिल गया,
"
बम-धमाके में मारे गए थे, पिछले साल.." वो बोला..

छोटे से मन को और दुखाना ना था, उसके,
और आगे पूछना ना था, फिर भी पूछ लिया, "और माँ?"..
"वोह तो कब की चल बसी, गरीबी की बीमारी से",
हम अवाक सुन्न रह गए, सुन कर उसकी व्यथा..

आंसू बहाता ना था, जिसके लिए रत्ती भर कोई,
डूब गया मेरे नयनों के पानी में, वो मासूम सा चेहरा..
परवाह किसे है, गरीबों की, लाचारों की, बेबसों की,
पूरा सत्ता तंत्र है, अमीर, चोर, लुटेरे नेताओं से घिरा..

देश भर में बम-धमाके हो तो हो, हमें क्या करना है?
बस, हम हाथ झाड़ लेंगे, पड़ोसी देश पर उंगली उठा..
मरें गरीब और आम आदमी, तब भी तान के सोना है,
वैसे भी इस देश की जनता, देती है सब कुछ भुला..

वापस बालक पर ध्यान दे, हमने और पूछा,
"
इतनी तरक्की हुयी, क्या तुझे कुछ नहीं मिला?"..
वो हैरत से हमें देख, हमारी नादानी पर हंसकर बोला,
"
आपको स्लम डॉग करोड़पति लगता हूँ मैं भला?"..

"
बाबू जी, हमको क्या? इस आर्थिक उन्नति से,
हम, दो जून की रोटी को अब भी तरस रहें हैं..
क्योंकि मेरी गरीबी के सुलगते तपते चूल्हे में,
बेशर्म हाथ, आज तक सत्ता की रोटी सेंक रहे हैं"..

उसकी बेबाक बात सुन, हम हैरान रह गए,
गहरी बातें कहता था, दिखने में था भोला..
हमने उससे आख़िर पूछा "तू कौन है?",
"
मैं हूँ 'भारत का भविष्य'", वोह कटाक्षकर बोला..

"जब से होश सम्हाला है, गरीबी से ही है मेरा नाता,
आज भी दर दर भटक रहा हूँ, पहले से ज्यादा डर रहा हूँ..
पनप नही पाता हूँ, जबकि साठ साल से हाथ ने है पाला,
पर आज भी मैं दो जून रोटी, साफ पानी को तरस रहा हूँ..

पिता देश-प्रेम था, जो ख़ुद कब का शहीद हो गया,
अब वो सिर्फ़, शहीदों की चिताओं में ही बस रह गया है..
कर्तव्य-निष्ठा मेरी माँ थी, जिसे गरीबी ने मार दिया,
और उसके मृत शरीर को, भ्रष्टाचार नोचकर खा गया है..

छोटी बहन सेवा की भी, जीते जी दुर्गति हो गई,
देश के दलालों ने उसे, स्वार्थ के कोठे पर बैठा दिया है..
बड़ी संवेदना, अपनों के हाथ से धक्का मार निकाली गई,
आज तक, फुटपाथ पर पड़ी, बस अपना रोना रो रही है...

ईमानदारी मेरा भाई था, बेचारा पल भी ना पाया,
उसको हम सबके चाचा, बरसों पहले चुपचाप खा गए..
मेरे सारे अपने, एक एक कर के टूट गए, और चाचा
हम पर राज करने को, अपनी नाकारा औलाद छोड़ गए"..

मिटटी से सने हाथों से, उसने मेरे बहते नैनों को पोछा,
और बोला, "देर नहीं है अब भी, हम उस हाथ को काट सकते हैं..
देश-प्रेम, ईमानदारी, सेवा, कर्तव्य-निष्ठा, संवेदना को जिला*
वापस ले अपना अधिका, फिर से भारत को स्वर्ग बना सकतें हैं"..
फिर से भारत को स्वर्ग बना सकतें हैं
फिर से भारत को स्वर्ग बना सकतें हैं

*(जिला = जीवित करना)

~जयंत चौधरी
३० - मार्च - २००९
(दुःख के साथ, पर आशा से भरे ह्रदय से. चुनावी समय में, एक छोटी सी टिप्पणी...)

9 comments:

संगीता पुरी said...

दिल को छू लेनेवाली रचना ... पूरी रचना को पढते काफी तकलीफ होती रही ... फिर भी आशावादी दृष्टिकोण के कारण अंत अच्‍छा लगा ... फिर से भारत को स्‍वर्ग बना सकते हें।

mehek said...

marmsparshi rachana,ansoon na aate to kaisa,dil ko chu liya,bachhe ki mann ki aasha kabile tariff hai.

अनिल कान्त : said...

दिल को छो गयी आपकी रचना .....सच को बयां करती ...


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Jayant Chaudhary said...

धन्यवाद, आप सभी का... इसे पढ़ने और आपके शब्दों के लिए..

यह सच तो है, किन्तु मैं कभी आशा का दामन नहीं छोड़ता.
आशा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है, उसकी धमनियों में रक्त दौडाती है..
यही एक चीज़ है जो हमें हर विषम परिस्थिति से उबारती है...

~जयंत

mark rai said...

bahut hi marmik chitran kiya hai...

सुशील कुमार छौक्कर said...

ये सब देखकर सोचता हूँ हम कहाँ तरक्की कर रहें। लगता है हमारी प्राथमिकता कुछ और ही है। और होनी कुछ और चाहिए। खैर आपका लिखा मार्मिक है।

reecha said...

bahut hi achchi lagi aapki yeh rachna.aur main ye bhi kahna chahungi ki maine apni kavita mein ladki hone ko abhishaap nahi balki marne k baad ki stithiti ko mehsoos karane ka pryaas kiya hai.

reecha said...

keep it up!

मुकेश कुमार तिवारी said...

जयंत जी,

पहली बार में मुझे आपके शब्द नश्तर से पैबस्त होते लगे. आज के जहर भरे हालातों पर तीखा और तल्ख बयान ना केवल सोचने पर मजबूर करता है वहीं कहीं ना कहीं हमारी सामूहिक अकर्मण्यता भी निश्चित करता है.

मुकेश कुमार तिवारी

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