Saturday, June 6, 2009

** एक चादर सी बिछी होगी.. ** (~जयंत)

(एक नया प्रयोग.... पिछली बार इसी विषय पर एक कविता लिखी थी... अब उसी को दूसरे रूप में लिखाहै॥ आशा करता हूँ अच्छा लगेगा॥)


वो बिस्तर पर,
एक चादर सी बिछी होगी,
एक निर्जीव,
शरीर सी पड़ी होगी,

तन के कोलाहल से,
मन की दूरी रखती होगी,
अपने मन में उठती,
हूक चुपचाप सुनती होगी,

छत को ताकते,
आखें उसकी पथराई होंगी,
पर उनमें उसके,
बच्चों की परछाई होंगी,

तन से हर दिन,
वो बेमन से, कुचलाई होगी,
किंतु उसके ह्रदय में,
फ़िर भी छुपी, अच्छाई होगी,

मय से दुर्गंधित,
गालियाँ सुनती, सहती होगी,
बच्चों की हँसी से,
फ़िर अपने कान धोती होगी,

बिस्तर पर वो,
हर दिन रिस रिसकर मरती होगी,
वो लाचार स्त्री भी,
आख़िर एक ममतामयी माँ होगी....

~जयंत चौधरी
जून २००९

16 comments:

अनिल कान्त : said...

aapki kya tareef karoon...bas shabd nahi hain mere pass
mujhe bahut achchhi lagi ye

RAJNISH PARIHAR said...

nishchit taur par wo maa hi hogi...

AlbelaKhatri.com said...

bhaiji..............itna umda bhi mat likha karo yaar, kisi ki nazar lag jaayegi..
aisa likhte ho ki .............irshya hoti hai...
BADHAI IS KAVITA K LIYE BHI >>

ARUNA said...

जयंत जी हमेशा की तरह लाजवाब है ये कविता!

awaz do humko said...

veri nice

vandana said...

nishabd kar diya.

अल्पना वर्मा said...
This comment has been removed by the author.
अल्पना वर्मा said...

मर्मस्पर्शी रचना .कविता में स्त्री के मनोभाव की अभिव्यक्ति लाजवाब है.

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

लाजवाब अभिव्यक्ति है...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

जय्ंत भाई
दोनो कविताये बेहत्रीन हे/
नारी मन को आप जिस अन्दाज़ मे पेश कर रहे हे वो मर्म को स्पश्त करता हे/
असल मे नारी भाव व्यक्त करना भी व्रह्द मस्तिश्क क उप्योग कर्ना होत हे/ खास्कर हम पुरुशो के लिये/
काफि दिनो बाद आया आप्के ब्लोग पर , किंतु ज्यद कुछ छूता भी नही था/
मेरे हिन्दी फोंत्स मे कुछ प्रोब्लम हे इस्लिये शब्द अपनी पूरी आक्रति से स्पश्त नहि हो रहे हे, आप सम्झ कर पद लेना/

Priyanka Singh Mann said...

jayant ji i know this is not the place to ask this but can u help me with something..actually wanted to put blogvani logo on my blog so that my posts become visible on blogvani..i got a link from blogvani but still clueless where to use it and how to use it..help!!!

Priyanka Singh Mann said...

thank you so much jayant ji..for helping me with technology(i m so bad at it) as well as for the comments..the problem is now partially solved.though i got the logo on my page but i m still clueless as how to ensure that my posts are visible on blogvani...that site says everytime i write something i have to click on the HTML link that they have provided n the aggregator will pick the new post and it will be visible on the site...but how??? how do i click on that link ..?

bunga raya said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Babli said...

बहुत ही उम्दा कविता लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!

Rajat Narula said...

lajawab rachna hai, sipmly superb...

Vijay Kumar Sappatti said...

i am just speachless on your writings...

is kavita ko padhkar dil ek alag se ahsaas me chala gaya ..

aankhen bheeg gayi hai ..

main aapko salaam karta hoon sir..


behatreen lekhan . yun hi likhte rahe ...

badhai ...

dhanywad.
vijay

pls read my new poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

Blogvani

www.blogvani.com

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