Tuesday, April 21, 2009

* मधुमय गीत सुनाता चल..*












कटु
वचन करते हैं घायल,

बना के अपनी वाणी शीतल,
सबको मलहम लगाता चल,
मधुमय गीत सुनाता चल...

चहुँ-ओर दुष्कर्मों की दलदल,
बना के अपना अंतर्मन निर्मल,
मानव धर्म निभाता चल,
प्रेम की ज्योत जलाता चल...

जीव जगत में बहुतेरे खल,
बन के तू शिशु सा निश्छल,
सत् की अलख लगाता चल,
सबको राह दिखाता चल...

ये संसार ज्यों कीचड़ का तल
बन कर के सुंदर कमल-दल,
प्रेम सुगंध फैलाता चल,
मधुवन को महकाता चल...

जीवन है बस पल दो पल,
जो है आज, नहीं है कल,
तेरा दिनकर भी जायेगा ढल,
बस उजियारा फैलाता चल॥

~जयंत चौधरी
२१ अप्रैल, २००९

14 comments:

mehek said...

ये संसार ज्यों कीचड़ का तल
बन कर के सुंदर कमल-दल,
प्रेम की सुगंध फैलाता चल,
मधुवन को महकाता चल...
behad khubsurat ,man ke kichad mein kamal khila diya,sunder vichar,jal se nirmal.sunder chitra bhi.

परमजीत बाली said...

जयंत जी,बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

जीव जगत में बहुतेरे खल,
बन के तू शिशु सा निश्छल,
सत् की अलख लगाता चल,
सबको राह दिखाता चल...

mark rai said...

itana achchha post....
aur picture to sabkuchh kah deti hai ..aage dekhne ki jarurat hi nahi padti ....man ko ise dekhne par shaanti mili...

अल्पना वर्मा said...

आप की कविताओं में हिंदी के शुद्ध शब्दों का प्रयोग बहुत पसंद आता है.
जीवन जीने की सीख और प्रेरणा देता हुआ मधुर गीत है.

Jayant Chaudhary said...

मार्क भाई,

आप तो सचमुच प्रोह्साहित करते रहते हैं..
अति धन्यवाद...

वो फोटो मैं ली थी, तो उसकी प्रशंशा के लिए पुनः धन्यवाद.

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

महक जी,

आप तो खुद महक हैं...
तो पुष्प की पंक्ति और फोटो आपको पसंद आनी ही थी :))
धन्यवाद...

आते रहिये, लिखते रहिये
और जीवन को महकाते रहिये.

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

बाली जी,

आपने शिशु का चित्र लगा रखा है... लगता है आपको बच्चों से प्रेम है..
तो आपको शिशु वाली पंक्तियाँ लुभा गयीं.. :))

चलिए अच्छा है, सबको कुछ ना कुछ पसंद आया.
मेरा प्रयास कुछ तो रंग लाया..

धन्यवाद.
~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अल्पना जी,

मैं हिंदी के प्रयोग पर विशेष बल देता हूँ..
आपने गौर किया उसके लिए धन्यवाद...
इसका अर्थ है, आप बहुत ध्यान से पढ़ती हैं. :)

हमेशा जैसे प्रोत्साहन का धन्यवाद.

~जयंत

अनिल कान्त : said...

जिंदगी जीने का एक फ़लसफा ...आपकी रचना में सदैव एक विशेषता होती है

Harkirat Haqeer said...

यह संसार ज्यों कीचड़ का तल
बन कर के सुन्दर कमल-दल
प्रेम की सुगंध फैलता चल
मधुबन को महकता चल

सकारात्मक सोच की सुन्दर कविता.....!!

जयंत जी आज जहां गद्धआत्मक कविताओं का जोर है वहां आपकी ये छंद बद्ध कविता एक सकूं सा देती है ...वह भी इतने शुद्ध रूप में लिखी ...बहुत बहुत बधाई आपको....!!

Jayant Chaudhary said...

हरकीरत जी,

धन्यवाद. बहुत दिनों से आपका आगमन नहीं हुआ था.
आज आपने मेरा मधुवन महका दिया. :)

जी हां, आपने सच कहा... मुझे छंद बद्ध कविता थोडी सी ज्यादा पसंद है. :)
दूसरों की लिखी गद्यात्मक कविता पसंद तो है,
पर मैं और कुछ लिख नहीं पाता... बाकी अधूरा सा लगता है.
इस काल के अनुसार मैं थोडा पुराना और पृथक हूँ..
आखिर है तो "मेरा बागी बौराया मन.. "

आपके प्रोत्साहन का धन्यवाद.

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अनिल भाई,

जिस दिन आपने आना बंद कर दिया, उस दिन तो मैं दुखी हो जाउंगा..
आप सदैव मीठे बोल सुनाते हैं...
मेरे ब्लॉग को महकाते हैं..

~जयंत

अमिताभ श्रीवास्तव said...

pahli baar padharaa hoo aapke blog par,
chhandbadhdh panktiyo kaa aanand leta chala gaya..
geet sunaya, tarpt bhi karaya..vish vraksh se bhi takraya..aanand aa rahaa tha isliye padhh padhh ke ghutne tike nahi..mera baagi boraya man aapki panktiyo me esa uljha ki vnhaa maa bhi yaad aai aour adh nanga ladka ant me apni vedna ke madhya halki muskaan ke saath fir vaachaal ho jaata he jab vo gadhe ki shql me desh ka bntadhaar dekhta he...

jayntji bahut achchi lekhni he aapki..meri shubhkamnaaye...

संतोष पाण्डेय said...

क्या बात है. इस पर अमल हो तो जीवन मधुवन बन जाये.

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