Monday, June 22, 2009

~ माथा भूमि पर धरा... पर माथा धरा ना कबहूँ.. ~ (जयंत)


मन
में राखे अंहकार, क्या पायेगा उस पार,
जीव अकेला ही चले, पीछे रह जाए संसार
- पता नहीं क्यों सब इस नश्वर संसार में अंहकार को महत्व देते हैं? अंत समय तो सबका ही आना है॥ हम सब को उस पार जाना ही है। और पीछे वो सब रह जाता है जिसपर हम अंहकार करते हैं। तो फ़िर अंहकार किस बात का, और किस काम का? जिसने सब बनाया, उसके सामने क्या अंहकार?

सत् असत का रहत है, मन में सदा संघर्ष,
सत् पर जोर लगाय ले, जो पाना हो उत्कर्ष

- मानव मन में, दानव भी होता है। जब हम दानवी प्रकृति की साथ देते हैं तो दांव बन जाते हैं.. सत् गुण और तम् गुण दोनों ही मन में रहते हैं... कभी ना कभी हमें उनके संघर्ष कासामना करना होता हैयदि हम सच्चा उत्कर्ष, याने कि अपने आप को संसार में फैले तामसिक तत्वों और कृत्यों से अलग करना चाहते हैं, कमल कि भांति जो कीचड़ में भी रह कर खिलता है, तो जैसे उसे खिलने के लिए ऊपर उठना होता है (तने के ऊपर), वैसे ही हमें भी ऊपर उठना होगाऔर ऊपरउठने के लिए हमें सत् का साथ देना होगा

मूरत आगे तू रहत, मन मूरत ज्यों नाहीं,
क्षण क्षण चौकड़ी भरे, ज्यों मृग वन माहीं॥
-
जैसे हिरण जंगल में, वैसे ही मन भी चंचल रहता है.. सदैव भागता फिरता है.. तो फ़िर भगवान् की मूरत के आगे बैठने से क्या फायदा जब मन मूरत की तरह स्थिर ना रहे? ऐसा अस्थिर मन भगवान् के ध्यान में क्या लगेगा। और जो मन से प्रभु का ध्यान ना करेगा तो फ़िर भगवान कैसे मिलेंगे??

माथा भूमि पर धरा, पर माथा धरा ना कबहूँ,
नाम तो ताते मिले, पर ईश्वर मिले ना कबहूँ

- किसी 'बड़े' आदमी ने दिखाने के लिए माथा/सर तो टिका दिया भूमि पर, किंतु अंहकार से भरा माथा/मस्तक ना रखा जमीन पर॥ जब अंहकार भरा रहा मन में, तो विनम्रता के इस दिखावे से यश (लोगों के द्वारा की गयी प्रशंशा) तो मिली, किंतु उस इश्वर से क्या छुपा है? वो सब जानता है दिखावा क्या है और अंहकार क्या है... फ़िर प्रभु कैसे उस 'बड़े' आदमी को मिलेगा??

~जयंत चौधरी
२१ जून २००९
(माँ सरस्वती के चरणों में समर्पित.)

10 comments:

ओम आर्य said...

aapke likhane ki shaili bilkul hi alag hai .......kabir ki yaad aa gaee........achchhi rachana ke liye badhayee

AlbelaKhatri.com said...

dohanuma in aadhyatmik kavitaaon k liye
hriday se abhinandan !

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!

Jayant Chaudhary said...

ओ़म जी,

आपके प्रोत्साहन का बहुत बहुत धन्यवाद.

मेरे ब्लॉग के अनुसरण करके आपने मुझे जो सम्मान दिया है... पता नहीं मैं उसका अधिकारी हूँ या नहीं...
आपने मुझे जो मान दिया... बहुत बहुत धन्यवाद.

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अलबेला जी,

आप तो मेरे सदैव प्रेरणा स्त्रोत रहें हैं.. कोटि प्रणाम.

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

समीर जी,

यहाँ लैंड करने के लिए १००-१०० धन्यवाद...
आपके आने से ब्लॉग का मान बढ़ा..

~जयंत

शोभना चौरे said...

bhut sundar dohe rche hai .ahmya ahnkar hi manav ko manvata ki unchiyo ko chune nhi deta .
badhai

अमिताभ श्रीवास्तव said...
This comment has been removed by the author.
अमिताभ श्रीवास्तव said...

bhaee,
aatmaa prasann ho gaee.
ese dohe ab padhhne me knhaa aate he../ mene kabeer ko khoob khoob padhha he..aour ab jab aapke doho me man ram rahaa he to aap samajh sakte he ki isame kuchh khaas jaroor he/ vese bhee aapaki rachnaao me ab aalochanaa jesa kuchh bhee nahee rahaa, kyuki jo rachna yaa vastu ishvar ko samarpit hoti he ve saari 'prasaad' ka roop le leti he..aour prasaad ko sirf swikaaraa jaataa he. shayad me esa pahle bhee kah chukaa hoo, aaj fir aapke prasaad ko saadar swikaar rahaa hoo.../isake liye asankhya prabhuvaad bhee/

Jayant Chaudhary said...

अमिताभ जी,

आपकी स्नेह भरी और मधुमय टिपण्णी का कोटि कोटि धन्यवाद.
धन्य तो मैं आज हो गया...
कहाँ कबीर दास जी और कहाँ मैं?
जैसे राजा भोज और गंगू तेली.....
मैं तो उनके चरणों की धूल भी बन जाऊं तो अपना लेखन और जीवन, सिद्ध समझूं.

बस यह कुछ भाव माँ की कृपा से मन में उठे थे तो व्यक्त कर दिए.

सच तो यह है... कल हमने (एक कमेटी के साथ) मिल कर हमारे टेक्सास के शहर में मंदिर में कुछ मूर्तियाँ स्थापित करवाईं...
बहुत सुन्दर और शुभ कार्य था... बहुत आनंद आया.. उस आयोजन के पश्चात घर लौटने पर इन विचारों ने जन्म लिया....

कुछ आखों ने देखा था.. कुछ मन ने देखा..
कुछ माँ ने कहा... कुछ हाथों ने लिख दिया...

बस इतना ही..

~जयंत

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