Friday, April 3, 2009

* नहीं घुटने टेकते कभी वीर..*



हो कितना भी विस्तृत, गहरा तिमिर,
एक
नन्हा दीपक, देता उसे चीर....
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी क्रोधित, तीव्र भंवर,
नाविक
ही जीते, ठान ले अगर...
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी उत्तंग, हिम-शिखर,
दृढ आरोही होते, विजयी उस पर..
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी तेरा, जीवन दुष्वर,
कर
कठिनाई से, युद्ध डट कर ...
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...


~जयंत चौधरी
(स्व-रचित, ३ अप्रैल २००९)
(शक्ति और शौर्य की देवी माँ दुर्गा को समर्पित)


6 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही उम्दा लिखा है आपने।

हो कितना भी विस्तृत, गहरा तिमिर
एक नन्हा दीपक, देता उसे चीर
नही घुटने टेकते कभी वीर
संघर्ष कर, मत हो अधीर ।

वाह।

mark rai said...

very nice ...kai baar padha har baar kuchh naya mila...thanks for post.

Tripti said...

Dear Jayant,

Thanks a million for writing the poem, as always i loved it. Each word of the poem gives strength to move on.

Well i got some freidnship award from my friend and so i choose to pass on to my friends and i include you as well, please visit my http://www.life-is-a-quest.blogspot.com/ and pick up your award.
Take care

mehek said...

हो कितना भी उत्तंग, हिम-शिखर,
दृढ आरोही होते, विजयी उस पर..
नहीं घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष कर, मत हो अधीर...

bahut hi sunder aashawai rachana badhai

अल्पना वर्मा said...

Josh bhari prernadayi kavita.

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,कितना बदल गया इन्सान के साथ आपकी पोस्ट की चर्चा .

Blogvani

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