Thursday, April 30, 2009

* बूंदों का सबक.. *


आशा
, एक संगिनी,
बनती है मेरी सखा,
सूरज फिर निकलेगा,
चाहे कितनी भी हो बरखा...

वर्षा भी अपनी बूंदों में,
जीवन का संदेशा लाती है,
मन के तपते मरुथल में,
आशा की फसल उपजाती है...

जीवन केवल नश्वर है,
मुझको ये भी सिखलाती है,
बनते टूटते बुलबुलों से,
यह गहरी सीख दे जाती है...

और जीवन का चक्र भी देखो,
मुझे चुपके से दिखलाती है,
धरती पर गिर, बहकर ये बुँदे,
फ़िर बादल बनकर छा जाती हैं...

अपनी छोटी सी उम्र में भी ये बूंदें,
धरती पर हरियाली फैलाती हैं,
क्षण भंगुर जीवन को कैसे है जीना,
बस यही सबक हमें सिखाती हैं
....


~जयंत चौधरी
३० अप्रैल २००९

Wednesday, April 29, 2009

" वो मेरा ह्रदय था.."


अंहकार के काले बादलों ने बिजलियाँ जिस पर गिराईं,
छिन्न भिन्न जो हुआ, वो घर नहीं, मेरा ह्रदय था...

ईर्ष्या के जहरीले भुजंगों ने जिसे बेरहमी से डसा,
तड़प तड़प जो मरा, वो हंस नहीं, मेरा ह्रदय था...

विधि के विधान ने जिसे निर्दयता से उठा फेंका,
चूर चूर जो बिखरा, वो दर्पण नहीं, मेरा ह्रदय था...

............................

वास्तविकता की तपती धरा पर,
वो गिरे बारिश की बूंदों जैसे,
और यूँ छन से उड़ गए,
कभी थे ही नहीं जैसे,
सपने बन गए,
मेरे सपने..



~जयंत चौधरी
(४/२९/०९)

Tuesday, April 28, 2009

> फटा पुराना दानी कवि! <


एक दिन एक पुराना मित्र मिल गया,
उसे फटे हाल देख मैं अन्दर से हिल गया,
जो कभी कार से नीचे ना था उतरा,
चेहरे से लगता था, मीलों पैदल चला,
मुख को ढके हुए थी हफ्तों की दाढी,
कपड़ों से लगता था, हुई पुरी बर्बादी..

हमने कहा, भैया कहाँ थे, क्या हुआ?
उसने सोचा, जानकर ही छोडेगा मुआ!!

बोला, एक दिन मन का भाव जाग गया,
और कंजूस बनिया से मैं, दानी बन गया..

दानवीरता के चलते, मैं कर बैठा बड़ा घोटाला,
एक दिन मुहल्ले में कवि सम्मलेन करवा डाला,
कवियों के संग मंच पर जा कर बैठ गया,
एक कवि से निकल, कविता का कीड़ा मुझे काट गया,

तब से घर के कागज़, स्याही बरबाद करने लगा,
ग्राहकों को पकड़, अपनी कविता सुनाने लगा,
जिनको सामान चाहिए था, बिल्कुल उधार,
सिर्फ़ वोही लगाते थे मेरी दूकान पर कतार,
बस इस कविता के रोग ने उठा के दे मारा,
धीरे धीरे सारे नगदी ग्राहक हुए, नौ-दो-ग्यारा,

हमने कहा, गलती बस तेरी ही है मेरे यार,
तुने ही चिल्ला के कहा, बैल मुझे मार,
कवि तो ख़ुद औरों के दिए दान पर पलता है,
दान देने वाला कवि, लाखों में नहीं मिलता है,
पहले तू दानी बना, फ़िर धीरे से कवि??
ऐसी दुहरी मुसीबत से कोई बचा नहीं...

खैर छोड़, अपना ले अब तू धंधा कोई और,
कविता वविता छोड़ दे, सुझाव पर कर गौर,
वो बोला, क्या आपने सुना नहीं हुआ इतना शोर?
चरों तरफ़ है मचा हुआ, केवल मंदी का जोर..

भाया, अब तो बसे बसाए धंधे उजड़ रहें हैं,
फ़िर आप क्यों मुझे कुएं में धकेल रहें हैं?
दोस्त हो या दुश्मन, बता दो मेरे भैया,
मंदी के भंवर में मत डुबाओ मेरी नैया,
लगता है मेरे जनाजे पर करोगे ता-ता-थैया,
और मुझे याद आयेगी, मेरी मैया की भी मैया..

हमने कहा, तुम पर तो हो गया तीसरा आघात,
इन सबसे तुम सीख लो एक ही छोटी सी बात,
दानी जो कवि बने, ख़ुद अपनी लुटिया देय डुबाय,
जान सको तो जान लो, 'मृत्युंजय' दिया बताय..


(आगे अगले अंक में....)

~जयंत चौधरी
अप्रैल २८, २००९

Monday, April 27, 2009

> फटा पुराना कवि : बना नेता - भाग २ <

(क्रमशः)...

उसका उतरा मुख-मंडल देख, हमने फरमाया,
ऐसा ही है तो सुनो ध्यान से मेरे प्यारे भाया,
अब तो जोरों पर है केवल चुनाव का ज़माना,
किसी भी फटीचर पार्टी से प्रत्याशी बन जाना,
थोड़े से अपने, थोड़े से उनके काले पैसे लगाना,
जनता को थोड़ा वादे खिलाना और पिलाना,
कैसे भी हो बहका के, तुम वोट बटोर लाना,

बस एक बार जो बन गए सांसद,
जीवन भर का मिल जाएगा मद,
देश की कौन सोचता है कम्बखत,
बस तू दोनों हाथों से लूट, हर वकत,
बच्चों को बैठा देना अपनी सीट पर,
जब बढ़ने लगे तेरे पाँव अपनी कब्र पर,
सात पीढियां भी तेरी तर जायेंगी,
भाभी भी तुझपे मर मर जायेंगी..

चमक उठा सूरज सा उसका चेहरा,
बोला, बंधू तू ही है सच्चा दोस्त मेरा,
इतना अच्छा उपाय बताकर एहसान किया,
अभी से तुझे मैंने अपना सेक्रेटरी बना दिया,
अब मिल बाँट कर हम तुम खाएँगे,
मेरे संग तेरे बच्चे भी अब तर जायेंगे...

देश के चाचा, हम तेरे हैं बड़े आभारी,
बच्चों के भविष्य की हमको राह दिखा दी,
सच कहते हैं सब, तुमको बच्चे हैं प्यारे,
अब तक भारत पर राज करते बच्चे तुम्हारे,
हम भी अब सच्चे चाचा भक्त बन जायेंगे,
अपने बाद, अपनी सीट पर, अपने बच्चे बैठाएंगे,

बंधू चलो, चलके मैं तुमको पार्टी देता हूँ,
आज बही इसी क्षण से मैं भी नेता हूँ,
तुम मेरे प्रचार अधिकारी बन जाना,
मेरे गुणगान में झूठे मूठे गीत सुनाना,

मैं ख़ुद सुनकर रह गया हक्का बक्का,
कुछ ज्यादा ही चल गया, फेंका था तुक्का,
जो अपनी ही दूकान लुटा बैठा था,
नेतागिरी के नाम पर कैसा ऐंठा था,
ऐसे आदमी का सांसद होना तय था,
पर ख़ुद चक्कर में फंस जाउंगा सोचा ना था,

मैं कहा, भैया सुनो थोडी अरज हमारी,
तुमसे तो ना संभली अपनी दुकानदारी,
कवि होने के संग करली तुमने दान-दारी,
अब कैसे सम्हालोगे नई नवेली नेतागिरी?
कहा जो मैंने थोडा उसपर विचार करो,
नेतागिरी से अब अपना दिल साफ़ करो,

वो गुर्राया, फुँफकारा, गुस्से में थर्राया,
खतरनाक तरीके से मेरे करीब आया,
बोला, पहले तो जोर से आग लगाते हो,
फ़िर अपना हाथ सेंक के निकल जाते हो?
कहो, हो की नहीं तुम मेरे सेक्रेटरी बनते,
वरना चलाऊंगा मैं अपने हाथ और लातें...

धन्य हो धन्य हो, सर झुका के मैंने कहा,
देखते देखते नेतागिरी का पहला गुण सीख लिया,
जब लालच देकर से अपना काम नहीं निकला,
झट से तुमने बाहुबली-पन का सहारा लिया,
अब मुझे दिखता पूरा सीन है,
तू ही जीतेगा, इस पर यकीन है...

पर कविराज, अब तो अपनी कविता को छोड़ो,
अपने पूर्वज कवि सांसद* की हालत से सीखो,
कवि ह्रदय सांसद को कोई नहीं है पूछता,
संवेदना का दिया, यहाँ बहुत जल्दी है बुझता...
* श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी

संसद में भी दान का कोई स्थान नहीं है,
इतने वर्षों में इसने देश को कुछ दिया नहीं है,
उसके गलियारों में केवल खरीददारी होती है,
बाहर बैठी भूखी, नंगी, बीमार जनता रोती है॥

दानी को यहाँ नहीं मिलेगा कभी पानी,
दलाली के बाजार में नहीं संसद का सानी,
दानी तो वो, जो जरूरत मंदों को देता है,
जो उनसे भी छीन के खाए, वो नेता है...

वो बोला, बस मैं सब समझ गया हूँ,
कविता और दान को छोड़ मैं नेता बना हूँ,
कहाँ की दानिशमंदी, और कौन सी कविता,
कौन हैं ये? मैं इनसे कोई नाता नहीं रखता...

उसकी सुनकर, मैं ऊपर से, जोर से हंस पड़ा,
जितना सोचा था, उससे भी ये था घाघ बड़ा,
दल बदल की जो थी इसने झलक दिखलाई,
समझ गए हम, ये था पूरा पक्का नेताई...

अब हो गया यकीं पक्का, कि ये ही जीतेगा,
सांसदों कि परम्परा का पूरा निर्वाह करेगा,
ख़ुद भोगेगा, और देश का काम तमाम करेगा,
और चमकते सांसदों में अपना नाम करेगा...

उस दिन से आज तक, हम रहें हैं पछता,
और हमारे मित्र संसद की शोभा रहें हैं बढ़ा,
लालच, भ्रष्टाचार, बाहुबल, दलबदल,असंवेदना,
आदि को अपना लो भुला के अपनी चेतना,
ये सुझाव हमने मात्र व्यंग में एक ही को दिया,
पर उसने और बाक़ी सांसदों ने सचमुच अपना लिया...
पर उसने और बाक़ी सांसदों ने सचमुच अपना लिया ॥

(ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा, सेवा, कर्मठता, देश-भक्ति आदि को श्रधांजलि के साथ)

~जयंत चौधरी
३० अप्रैल २००९

Sunday, April 26, 2009

~ मेरी कविता ~



मेरे
पास,
हर साँस,

जैसे उल्लास,
एक अहसास,

अदम्य साहस,
आत्म
विश्वास,

कभी सुखद,
कभी
विषाद,

अमिट प्यास,
अधूरी आस,

जैसे छलावा,
एक
मृग-मरीचिका,

मेरी वीरता,
या धीरता,

एक तरंग,
मदमस्त उमंग,

मेरा आसमां,
सारा
जहाँ,

उत्तंग हिम-शिखर,
शीतल मान-सरोवर,

मेरा दिनकर,
या मधुकर,

कुछ कहो,
कौन
हो?

उसने कहा,
तेरी कविता

~जयंत चौधरी
२२ अप्रैल २००९
(एक लहर सी उठी.... और मन के रेत पर ये मोती छोड़ गयी॥)



Saturday, April 25, 2009

> टेंशन काहे को लेने का? <


एक
दिन, मंजू जी के शिष्य,
भारत भ्रमण पर निकल पड़े,
और इंडिया पहुँच कर,
जोर से चक्कर खा कर गिर पड़े,

अखिल जी ने आज तक,
आज तक वो फोटो है छुपा रक्खा,
जिसमे साफ़ दिखता है,
की उन्हें लगा है बड़ा धक्का,


छात्र बोले, मंजू जी ने,
पता नहीं क्या था बतलाया,
इसे तो हमने वैसा,
बिल्कुल नहीं पाया

हमें हिन्दी के नाम पर,
जाने क्या सिखलाया,
इस देश का तो एक भी
वाक्य समझ ना आया

यहाँ तो हिन्दी हर वाक्य में,
प्रारंभ से पहले ही अंत हो जाती है,
वहाँ पता नहीं हमें क्यों
शुद्ध हिन्दी सिखलाई जाती है?

लगता है हम किसी,
और देश में पधार गए हैं!
जाना था भारत,
और इंडिया में उतर गए हैं!!

लगता है हिन्दी समिति
को हुआ बड़ा घाटा है,
नीतू जी ने किसी सस्ती
जगह का टिकेट काटा है,

पास खड़े नंदलाल जी ने
मुस्कुरा कर कहा,
मैंन,
जब वी मेट, देन
टेंशन काहे को लेने का

इस हिंगलिश को सुन,
छात्र बोल उठे,
वोह क्या था,
हमने ऐसे शब्द कभी नहीं सुने,

नन्दलाल जी मुस्काये,
कुछ इस तरह से समझाए,
अरे, यही तो रियल इंडिया है,
व्हाई तेरा हेड चकराए?

जैसे भी हो, कुछ भी बोल के,
तू क्यों ना काम चलाये,
हिंगलिश की गोली खा ले,
यह मंजू जी की हिन्दी दे भुलाए,

यही तो भाषाई बीमारियों
की एक मात्र दवा है,
आधे से ज्यादा भारत,
इसके ही नीचे दबा है,

इतने में संजीव जी
बीच में जोर से बोल पड़े,
बस करो बस करो,
मिनट हुए आपके पुरे,

इन सबने खा लिया,
मोती और ज्योति जी का खाना है,
जाने भी दो इन्हे,
यहाँ अभी नहीं सुलाना है,

सुनकर सोनल और
ज्योति जी चाय ले आईं,
हैण्ड-आउट लेकर गए,
कल्पना जी और किशोर भाई,

जो गिर गए थे, उन्हें
थापर जी ने उठा के बैठा दिया,
और डॉ धीरे शाह जी ने,
घायलों का उपचार किया,

मौका देख जयंत भाई
अपनी कविता सुनाने खड़े हो गए,
उन्हें देख, जो बचे-खुचे
सही सलामत खड़े थे, वो गिर गए,

छात्रों
के व्यथित मन को,
अशोक जी ने पहुचाया चैन,
अनुपम कविताएं सुना के,
खोले सबके नैन,

अभय जी हर्षित हुए,
हिन्दी का दीपक रहे जलाए,
मीरा जी, निशि जी, परम जी,
और रेखा जी, उसको रही बचाए,

आओ हम संकल्प करें,
सैकड़ों वर्षों का प्रयास व्यर्थ ना जाए,
छोटी ही सही, पर हिन्दी की,
यह ज्योत, कभी ना बुझने पाए...


~जयंत चौधरी
२४ अप्रैल २००९
(डल्लास अमेरिका, में संपन्न "कवि सम्मेलन २००९" के कार्यकर्ताओं पर एक हास्य-व्यंग कविता)
(इस कवि सम्मेलन में भारत से ३ कवि आये थे और SHOW HOUSEFULL था)


Tuesday, April 21, 2009

* मधुमय गीत सुनाता चल..*












कटु
वचन करते हैं घायल,

बना के अपनी वाणी शीतल,
सबको मलहम लगाता चल,
मधुमय गीत सुनाता चल...

चहुँ-ओर दुष्कर्मों की दलदल,
बना के अपना अंतर्मन निर्मल,
मानव धर्म निभाता चल,
प्रेम की ज्योत जलाता चल...

जीव जगत में बहुतेरे खल,
बन के तू शिशु सा निश्छल,
सत् की अलख लगाता चल,
सबको राह दिखाता चल...

ये संसार ज्यों कीचड़ का तल
बन कर के सुंदर कमल-दल,
प्रेम सुगंध फैलाता चल,
मधुवन को महकाता चल...

जीवन है बस पल दो पल,
जो है आज, नहीं है कल,
तेरा दिनकर भी जायेगा ढल,
बस उजियारा फैलाता चल॥

~जयंत चौधरी
२१ अप्रैल, २००९

Monday, April 20, 2009

~ तृप्ति... ~















मेरे
जीवन के
सुनहरे सफर में,
आए थे तुम इन्द्रधनुष बनकर,

मन मयूर नाच उठा था मेरा,
तुमको अपने संग संग पाकर,

छलका था प्रेम प्यार तुम्हारा,
अमृत बन सपनों के उपवन पर,

प्रारम्भ हुई सृजन की नव पीढी,
पनपा प्रेम नव विरवा बन कर,

तुमसे ही तो मिला था प्रियतम,
एक नन्हा सुन्दर अनुपम उपहार

हर्ष-आनंद से भर उठता है मन,
चाहे कितना भी लूँ उसे निहार,

हर्ष-उल्लास से जीवन झूम उठा,
मन में समाया, प्रेम का सागर,

मधु-मद-मय आत्मा नाच उठी,
छलक उठी सुख-सपनों की गागर,

झुलसा नही कभी घर आँगन मेरा,
तुम रहे सदैव शीतल छाया बनकर,

पीड़ा का सूखा ना कभी पड़ा,
श्रम बहा तुम्हारा, जल बनकर,

....

पर सम्भव कहाँ, कभी भी रहना,
काल-चक्र की गति से बच कर,

आगम हुआ, एक क्षण में प्रलय का,
और टूटा दुःख, विशाल पर्वत बन कर,

अरमानों की गगरी टूट गयी,
सुख-स्वप्न बिखरे चूर चूर होकर,

पर जीवन को व्यर्थ बहाती नहीं,
मैं कभी, एक पल भी आंखों से रोकर,

क्योंकि दुःख से, गर्व बहुत है ज्यादा,
मुझे तुम्हारी, अद्वितीय वीर-गति पर,

तुम संग जीकर, तुमसे ही सीखा था,
जीवन को सचमुच जीना प्रियवर,

....

मुश्किल कितना भी हो चाहे,
जीना है, अपना सर ऊँचा रखकर,

सीख लिया है मैंने भी अब तो,
जीवन विष को पीना हँस कर,

आंधियां भी ना हिला सकेंगी,
उससे, चलती हूँ मैं जिस पथ पर,

साँसों का स्पंदन कहता मुझसे,
चलते जा, तू अथक संघर्ष कर,

भान मुझे है, यह आज भी,
देखते हो तुम हमें छुपकर,

और दे जाते हो साहस व् शक्ति,
अपने होने का आभास दिला कर,

उलझा जब भी मेरा मन चिंतन,
सुलझाया तुमने चुपके से हर बार,

मंजिल को मैं हासिल कर ही लुंगी,
मुझे राह दिखाता तुम्हारा प्यार,

तुमको अपने संग लेकर चलूंगी,
है जब तक मेरी साँसों का विस्तार,

प्रेरक शक्ति तुम्ही हो प्रियवर,
झुककर कभी ना मानूंगी मैं हार,

.....

प्रेम तुम्हारा गया नहीं हैं,
रहता है, वो मुझमे बस कर,

छोटा सा था, भले साथ हमारा,
लगता सौ जन्मों से भी बढ़कर,

आज भी तुम, संग बने हो,
चाहे चले गए हो उस पार,

प्रेम हमारा अमर है प्रीतम,
पलेगा ये, जब तक है संसार...

....


प्रिय, साधना मेरी सफल ही होगी,
तप कर लूँगी, माँ और पितृ बनकर,

'तृप्ति' मुझे मिल जायगी जब अपना,
प्रेमांकुर निखरेगा सुन्दर वृक्ष बनकर....

.....


कुछ खट्टी मीठी यादों की माला,
धीरे धीरे गूंथते चलता है मेरा सफर...

फिर एक दिन हम साथ में होंगे,
हम करें प्रतीक्षा, तब तक, प्रियवर...


~जयंत चौधरी
२-१८ अप्रैल २००९

(एक अति साहसी मित्र को समर्पित.. अत्यधिक सम्मान के साथ)

Thursday, April 16, 2009

- विष वृक्ष -



नकारात्मकता,हताशा, कुंठित विचार,
पलायनता, निराशा और हार,
पनपे ना कभी,मन के धरातल पर,
कुछ भी हो जाए,याद रखना मगर,
बना ना पायें, ये कभी अपना घर,

यह वो बूटा है, अरे, सुन बेखबर,
जो साहस की नींव तोडे, विष वृक्ष बनकर,
इससे पहले कि, यह बढ़े जड़ फैलाकर,
मन की धरा से,
फेंक दे तू इसको उखाड़कर...

~जयंत चौधरी
१८ अप्रैल २००९

Friday, April 3, 2009

* नहीं घुटने टेकते कभी वीर..*



हो कितना भी विस्तृत, गहरा तिमिर,
एक
नन्हा दीपक, देता उसे चीर....
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी क्रोधित, तीव्र भंवर,
नाविक
ही जीते, ठान ले अगर...
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी उत्तंग, हिम-शिखर,
दृढ आरोही होते, विजयी उस पर..
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...

हो
कितना भी तेरा, जीवन दुष्वर,
कर
कठिनाई से, युद्ध डट कर ...
नहीं
घुटने टेकते कभी वीर,
संघर्ष
कर, मत हो अधीर...


~जयंत चौधरी
(स्व-रचित, ३ अप्रैल २००९)
(शक्ति और शौर्य की देवी माँ दुर्गा को समर्पित)


Thursday, April 2, 2009

स्त्रीयता गुहारती है !!

(१)
एक दिन बात नयी होगी,
नारी की कैद ख़तम होगी..

अंधेर दमन का मिटाने को,

समानता की सुबह होगी..

(२)
मौन हैं सब, पर
स्त्रीयता गुहारती है..

माँ के दूध की धार,
सबको दुत्कारती है..

एक ना एक दिन,
टूटेंगी सब बेडियाँ..

उठ, बाहें फड़का,
कि, मानवता
पुकारती है...

~जयंत चौधरी
४ अप्रैल २००९
(कुछ लोगों के ब्लॉग पढ़ कर यह विचार आए...)

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