Thursday, March 19, 2009

*** एक बेटा ***


धूल भरे अधरों से, आतुर हो पिता को पुकारता,
एक बालक, छिले हुए घुटने से बहते, रक्त को था पोंछता...
हाथ बढ़ाकर
उसे उठाने, पर.. पिता नहीं आए

जलते हुए नयनों के अश्रु, धीरे धीरे सब सूख गए,
पर कई विगत के अवसर, धीमे से आकर उनमे भर गए...
जब उन्हें आना था, पर..
पिता नहीं आए

वोह जब लड़खड़ा कर, गिरते पड़ते चल रहा था,
नाजुक पावों से उसका, बोझ भी नहीं संभल रहा था...
थोडा भी सहारा देने, पर..
पिता नहीं आए

गली के नकारा आवारा, लड़कों से एक बार उलझा था,
एक असहाय को बचाते, स्वयं अकेला बहुत पिटा था...
रक्षा करने उसकी, पर..
पिता नहीं आए

देखा था अपनी माँ को, दो जून की रोटी को तरसते,
उस स्वाभिमानी महिला को भी, कई बार हाथ फैलाते...
माँ, पल पल मिटती रही, पर
... पिता नहीं आए

रोते रोते कई रातों में, दुःख में सो गयी उसकी माँ,
उसने फटी चादर से ढाप लिया, खुदको, जब और देखा ना गया...
माँ के आंसू पोछने, पर...
पिता नहीं आए

उसकी प्यारी बड़ी बहन की भी, बड़ी कठिनाई से तय हुई,
मिला जो सगे सम्बन्धियों के, पाव पकड़, उससे शादी हुई...
पुत्री को डोली बैठाने, पर...
पिता नहीं आए।

जाने क्या क्या झेलना पड़ा, उसे एक छोटे से जीवन में,
हँसता खेलता घर था, पता नहीं क्यों आग लगी एक ही पल में...
आँगन की आग बुझाने, पर..
पिता नहीं आए

एक दिन, साहस बटोरकर, उसने माँ से पूछ ही लिया,
पहले तो आते थे, यदा कदा, अब नहीं, ऐसा क्यों कैसे क्या हुआ?...
इतना सब हुआ हमारे साथ, पर ...
पिता नहीं आए?

तेरे पिता भारत-रक्षक थे, गर्व से दुःख को दबा माँ ने कहा,
लौटने का वादा किया, जब करने जा रहे थे वो भारत माँ की रक्षा...
उनके कई साथी लौटे, पर...
वो कभी लौट ना पाए

वीरांगना बोली, पुत्र, उनके कर्मों के फल हम सबने हैं खाए,
कितने ही पिता-पुत्र आज संग हैं, स्वतंत्र हैं, प्रसन्न हैं कई माताएं ...
गर्व मुझे है पुत्र,
वोह... मातृभूमि के काम आए

वीरगति मिलती है विरलों को, ऐसा कृष्ण ने गीता में कहा,
वो वीर-पुत्र सीना तान के बोला, माँ मुझे रहेगा गर्व, उनपर सदा...
धन्य वीर है जो, मातृभूमि पर... अपना शीश चढ़ाए।


गौरव से चमकती आखों से, भावानाओं से कांपते अधरों से,
असीम गर्व से भरी छाती से, कहा उस वीर-पुत्र ने देशवासियों से....
कसम तुम्हे है, मेरे
पिता का... बलिदान व्यर्थ ना जाए
.....उनका बलिदान व्यर्थ ना जाए....
.....उनका बलिदान व्यर्थ ना जाए....

~~। एक विनम्र श्रधांजलि समस्त वीर शहीदों के नाम।~~

~जयंत चौधरी
स्व-रचित, मार्च -१०, २००९

13 comments:

mark rai said...

kaaphi achcha likha hai... man ko bha gaya yah post..

निशांत मिश्र said...

बहुत बढ़िया! क्या बात है! भारत से दूर रहकर भी आपको अपनी माटी की गंध खींच रही है! मुझे खुशी है कि आप मेरे ब्लौग पर आए और मैं आपके ब्लॉग पर आ पाया!

अल्पना वर्मा said...

बहुत अच्छा लिखते हैं आप.
अच्छा ब्लॉग है आप का.
हिंदी ब्लोग्स को पाठक 'अग्रीग्रटर '[जैसे ब्लोग्वानी-चिट्ठाजगत etc]ही दिलाते हैं.
आप को इन में किसी में रजिस्टर करना चाहिये..ताकि आप के ब्लॉग आप इस की प्रविष्टियों के बारे में
बाकि पाठकों को भी मालूम हो.
मुझे भी यह बात बहुत बाद में पता चली थी.
आभार सहित,

Jayant Chaudhary said...

Aap sabhi ko dhanyawaad.
Aapke protsaahan se hi bal milataa hai.

~Jayant

Reecha Sharma said...

bahut sundar prastuti.

Anonymous said...

sundar aur safal prayaas.www.freespaceofindia.blogspot.com

निर्झर'नीर said...

Chaudhary saheb.

yakin nahi hota aap US mein rahte hai.

aapne jis tarah se deshprem or shaheedoN ke balidaan ko shabd diye hai ..usmein desh ke priti aapka samarpan saaf dikhta hai.

aaj log desh mein rahkar bhi videshi ho gaye hai ..aapki soch vandniiy hai.

Priyanka Singh Mann said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Priyanka Singh Mann said...

जयंत जी अभी एक टिपण्णी पढ़ कर ज्ञात हुआ की आप विदेश में रहते हैं पर आप के लिखे हर एक शब्द से देश की मिटटी की खुशबु आती है । कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा की अभी भी बहुत लोग हैं जिनको सैनिको के बलिदान की कीमत समझ आती है वरना सशत्र सेनायें केवल जनवरी और अगस्त में "सीजनल फ्लेवर" की तरह याद की जाती हैं ।





गत पाँच वर्षों में रक्षामंत्री को एक आधी बार सीमा पर जवानों से मिलते देखा ,राहुल बाबा को युवाओं का प्रतिनिधि माना जा रहा है क्या कभी उन्होंने किसी युवा सैनिक से हाथ मिला कर जो उसी तुम्हारी क्या तकलीफ है ? झोपडियों में रह लेते हैं क्या २०००० फीट की ऊंचाई पर किसी पोस्ट में जा कर सोये हैं ? नहीं , शायद इसलिए कि मीडिया वहां तक नहीं पाती । को लिए को को को को लिए में हो ..ऐक्टर ,क्रिकेटर , अपराधी ..नेता बहुत से मिल जायेंगे । शहीदों के घर "फोटो ओपुर्चुनिटी" भर हैं इन लोगों के लिए...एक सैनिक कि शहादत उसका "प्रोफेशनल हजार्ड "..कौन याद रखेगा बलिदान को ??





गर्व कि मैं आप जैसे देशभक्त को जानती हूँ और दुःख है कि देशभक्तों की प्रजाति देश से बहुत तेज़ी से विलुप्त हो रही है पर जब तक आप जैसे लोग हैं तब तक उम्मीद बाकी है। यदि वह जो दिल में देशभक्ति का जज्बा लिए ,देश के सम्मान और रक्षा के लिए खड़ा है एक सैनिक है , तो आप भी एक सैनिक हैं जो उसी जज्बे ko liye अपनी कलम से देश सम्मान को बढ़ा रहा है । आप यूँ ही लिखते रहें ,"पप्पू कांट किसी साला " के इस युग में ऐसे लेखन की बहुत आवश्यकता है ...बहुत सी शुभकामनाएं !!

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Priyanka Singh Mann said...

jayant ji there was some typing mistake in the first comment .. I made amendments in the second one!!once again outstanding piece of writing..waiting for more !!

गौतम राजरिशी said...

गज़ब की लेखनी जयंत जी....सैनिक हूँ तो दिल को छू गयी है...
प्रियंका जी की टिप्पणी पढ़ कर मंद-मंद मुस्काता हूँ, उनकी भावनायें समझ सकता हूँ। कई-कई बार सैनिकों से ज्यादा सैनिक-पत्नियों को लड़ाई लड़नी पड़ती है, जिसे कोई नहीं समझ सकता-उस लड़ाई को, उस पीड़ा को।
आपके शब्द संबल देते हैं इन वीरानों में...

abhinav pandey said...

आपका चिट्ठा अत्यंत रोचक है.. मैने भी एक प्रयास किया है अपनी रचान्ये लिखने का...आपकी समालोचनात्मक टिप्पणी मुझे आगे बढ़ने में मादा करेंगी कृपया पढ़ें एवं बतलायें कैसा लगा मेरा चिट्ठा


http://sunhariyaadein.blogspot.com/2010/06/blog-post.html

manju said...

bahut hi acha likha h jayant ji.... is laikhne ko padte waqt meri roghnte khade ho gaye.....

Blogvani

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