Monday, January 31, 2011

जीवित हूँ मैं, मुर्दा नहीं....

तूफ़ान उठे,
बिजली गिरी,
झुकी नहीं,
नज़र मेरी....

बढ़ता चला,
मैं राहें बना,
गढ़ता गया,
सपना नया....

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी...

बेदम नहीं,
बेबस नहीं,
जीवित हूँ मैं,
मुर्दा नहीं....

~जयंत चौधरी
माँ दुर्गा को समर्पित॥
१२ भद्र / ०२ सितम्बर 2010
(बैठे बैठे एक ख्याल आ गया ऑफिस में...)



Tuesday, January 25, 2011

क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??


कैसी स्वतन्त्रता, और कहाँ का गणराज्य,
अपने ही देश में तिरंगा ना फहरा सके हम श्रीमान,
जब तिरंगे का हो लाल चौक में अपमान,
क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मा??

देश पे मरने वालों नहीं मिली दो गज जमीन,
और आदर्श की नीवं में हैं सारे आदर्श दफ़न,
शहीदों की चितायों पर खड़े हुए घोटाले के मकान,
कैसे करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??

जिस गीत को लिखकर किया गया,
भारत को गुलाम रखने वाले का गुणगान,
जिसमें नहीं है भारत माँ का स्थान,
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

जिसमें है अब तक उस सिंध का बखान,
जो कब का चला गया पाकिस्तान,
उस गीत का कैसे करूँ मैं सम्मान?
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

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