Wednesday, June 16, 2010

** काँपते हाथों में **

है यकीन मुझे,
जानता हूँ, कि
तेरे काँपते हाथों में,
जान अभी बाकी है...

माना बहुत है,
पर, तू भार उठा,
जोर लगा, कि
अरमान एक बाकी है....

यह जिंदगी,
एक प्याला है,
और मौत,
तेरी साकी है...

पीता चल,
चलता चल,
जब तक,
जाम एक बाकी है....

मधु बहती है,
कविता उड़ती है,
पंखों में थोड़ी
उड़ान अभी बाकी है....

अरमान अभी बाकी है..
थोड़ी जान अभी बाकी है...


जयंत

Wednesday, June 2, 2010

ढूंढ़त है तब पावत नाय




ढूंढ़त है तब पावत नाय, पावत है तो जानत नाय,
जान सके तो जान ले मनवा, हाथन फिसलत जाय...


जीवन में मानव कितनी ही चीजों को ढूंढ़ता रहता, जैसे शांति, प्रेम, समय, सुख, भगवान् आदि.
और जब वो पास में होती हैं तो या उन्हें पहचानता नहीं, या फिर उसकी कीमत नहीं जानता.
उन्हें पहचान कर, उनको सम्हाल कर रखना अति आवश्यक है... हाथों से फिसलने नहीं देना है.

जयंत
जून २, २०१०

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