Friday, July 11, 2014

उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..



उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..
कुछ छोड़ चला हूँ, तो कुछ बाँध चला हूँ..

मीठी सी जो यादें हैं उन्हें गाँठ रखा है,
कड़वी सी कुछ साँसों को मैं धो चला हूँ...

नादान से बचपन को अबतक साथ रखा है,
जहरीले से विचारों को मैं गाड़ चला हूँ...

नटखट से मेरे मन को बेलगाम रखा है,
बेबसी की बेड़ियों को मैं तोड़ चला हूँ...

नए बुने सपनों को भी आखों में रखा है,
निराशा की मरू को उमंगों से सींच चला हूँ...

साँसों को अपनी मैंने अभी बाँध रखा है,
जीवन को जीत, जीते-जागते मैं सदा चला हूँ...

उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ भूल चला हूँ..
कुछ छोड़ चला हूँ, तो कुछ बाँध चला हूँ..
जितना भी जिया, उतना भरपूर जिया हूँ....

(४१ अच्छे साल....)

Monday, January 13, 2014

नौका - नाविक

सागर की लहरों पर,
बढ़ती नौका में बैठे,
थपेड़ों से हिलते हुए,
कभी बाएं, तो कभी दाएं,

कभी मद्धम,
और कभी मंथर,
कहीं सुनहरे उजियारे में,
और कभी अंधियारे से घिर कर,

कभी मिली पुरवाई या फिर,
कहीं किसी तूफ़ान में फंसकर,
किन्तु आगे बढ़ते, हुए निरंतर,
किन्तु आगे बढ़ते रहे निरंतर,

आज मुझे,
आभास हुआ,
संसार है सागर,
और जीवन एक नौका।।।

~ एक नाविक
 

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