Thursday, May 27, 2010

...इश्क ऐसा ही सही...


हम जिन पर मर मिटे,
उन्होंने कभी जाना भी नहीं,
इश्क करना खता है, तो,
इसकी ये सजा ही सही...

मेहँदी की जगह पिस गए,
कितने ही अरमान मेरे,
बस यह सोच के खुश हूँ,
कि, निखर गए हाथ तेरे...

ख़ुशी दो पल की माँगी थी,
जन्नत की फरमाइश न थी,
बहुत थी, दो गज जमीन ही,
सारे जहां की चाह ना थी....

कहाँ का आसमान,
और कैसी ऊँचाई,
ना खुदा मिला,
ना उसकी खुदाई...

मुरझाते हैं गुल,
बहार में कैसे,
बड़ी मुद्दतों के बाद,
अब हम समझे,
दौर--बदनसीबी से,
जब सिफर खुद गुजरे ...

~सिफर (कभी कहीं ये रूप भी..)

Monday, May 17, 2010

~ सतरंगी हुए सपने मेरे ~















सतरंगी
हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे,

जीवन
से मिटे हैं अँधेरे,
रातों को मिले ज्यों सबेरे,
और मधुमय हुए हैं बसेरे,
डाले खुशियों ने मन में डेरे...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

करवट बदली इस जिंदगी ने,
और आखें खोली पलकों ने,
ख़ुशी मन में लगी है घुलने,
मरू में नेह लगी बरसने...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

फैलाए पंख अरमानों ने,
आशाएं उठ लगी उड़ने,
बांधा था जिन्हें निराशा ने,
वो पग पल पल लगे उठने....

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

जयंत चौधरी
मई १८, २०१०

Thursday, May 13, 2010

*** बूँद रक्त की, बाँकी है एक ***

मन में क्यों, रखता है भय,
होगी बस, तेरी ही विजय,
मन का, छोटा सा संशय,
बन बैठेगा, तेरी पराजय..

तू आज, हार को हरा दे,
पराजय को, पराजित कर दे,
बस आज, विधान को बदल दे,
तू ख़ुद ही, लकीरें खींच दे...

जो हाथ हैं, तो उनको उठा,
औ कदम हैं, तो उनको बढ़ा,
तुझे, बैठने से क्या मिला,
तू उठकर, ख़ुद भाग्य बना....

बूंद रक्त की, बाँकी है एक,
श्वांस अभी, बाँकी है एक,
नहीं देना, तू घुटने टेक,
जीवन तेरा, अब भी है शेष...

~
जयंत चौधरी

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