Wednesday, March 24, 2010

एक दिया बुझ गया


जीवन था उसका क्षणिक,
तेज था किन्तु अधिक,
कई दीयों को कर प्रज्वलित,
एक दिया, अचानक बुझ गया....

नकारात्मकता हुयी हरित,
और मन का तम हुआ मृत,
करके जीवन-राह प्रकाशित
एक दिया, आंधी में बुझ गया....

आत्मा को रखके पवित्र,
करके हम सबको मोहित,
छोड़ गया हमको वो मित्र,
एक दिया, अनंत-लीन हो गया...

जाना है सबका निश्चित,
हम कह ना पाए विदा मित्र,
पर यादों में तुम हो जीवित,
एक दिया, मन में जल गया....

एक दिया..... बुझ गया...
एक और दिया.... जल गया...


~जयंत
(मेरे प्रिय मित्र के अचानक जाने के बाद आभास हुआ की जीवन कितना निष्ठुर और क्षण भंगुर है॥ मैं आज भी यकीन नहीं कर पाता हूँ की वोह गया...... बहुत नेक और सच्चा इंसान... चला गया...)

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