Tuesday, January 26, 2010

तुम कैसे अमर हो जाते हो?? (~जयंत)




बर्फीली चोटियों पर तुम,
क्यों अपना शरीर गलाते हो?
जम जाता है जहाँ समय भी,
क्यों अपना रक्त बहाते हो?

तपती मरूभूमि में तुम,
क्यों अपना बदन झुलसाते हो?
जल जाता है जहाँ लौह भी,
तुम कैसे साहस बचाते हो?

पथरीले उत्तंग पहाड़ों पर तुम,
क्यों अपने घुटने छिलवाते हो?
पनप ना पाये जहाँ कृशा भी,
तुम कैसे द्रढ़ता उगाते हो?

घने कटीले दुर्गम वनों में,
क्यों त्वचा-खंड छोड़ आते हो?
पहुँच ना पाये जहाँ रवि भी,
तुम कैसे गश्त लगाते हो?

क्षण भर में तुम कैसे,
क्यों जीवन दांव लगाते हो?
बोलो, भारत माँ पर तुम,
क्यों सर्वस्व लुटा कर जाते हो??

एक टुकड़ा मिट्टी के लिए,
क्यों तुम, ख़ुद मिट्टी बन जाते हो?
उस मिट्टी में मिलकर भी,
तुम कैसे अमर हो जाते हो??



~Jayant Chaudhary

(Gantanrat Diwas par mere desh ke sachche naagarikon ke liye shraddhaa-suman samarpit hain.)

Saturday, January 9, 2010

कहाँ गया वो? उसे खोजो..


एक
नादाँ बालक था वो,
जग
से अनजाना था वो,
ओस
की बूँद सा था वो,
जाने
कहाँ गया वो....

रोते
रोते हँसता था वो,
गैरों
के लिए रोता था वो,
उजली
किरण सा था वो,
जाने
कहाँ गया वो....

कालचक्र में पिस गया वो,
धूल में गुम गया वो,
कैसे बिछड़ गया वो,
जाने
कहाँ गया वो...

माँ का प्यार था वो,
दादी का दुलार था वो,
मेरा बचपन था वो,
कोई तो उसको खोजो....

~जयंत चौधरी
९ जनवरी, २०१०

(मानता हूँ की इसमें थोड़ा सा प्रभाव '३ इडियट्स' के गाने का है॥ किन्तु भाव मेरे हैं और मेरे खोये बचपन के लिए हैं... आशा करता हूँ आप समझेंगे..)

Wednesday, January 6, 2010

~~ आल इज्ज़ वेल!! ~~



भैया सब् ठीक है!! चाचू सब् ठीक है!! बेटा सब् ठीक है!! आल इज्ज़ वेल!!

यह तो मेरे जीवन का मूल मन्त्र रहा आया है वर्षों से, और अब इसे एक सुन्दर गाने के रूप में देखना... आनंद आगया।

जो हो रहा है, वोह भी ठीक है, जो होगा वो भी ठीक ही होगा....
इसे पलायनवादी या झूठी सांत्वना वाला मंत्र ना माने, इसके अंतर में गहरा मतलब है छुपा हुआ।
फिल्म में भी आमिर का मित्र कहता है, "सिर्फ आल इस वेल सोचने से तो कुछ नहीं हो जाता?", उसके उत्तर में जो रांचो कहता है, उससे मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ। माना की आल इज्ज़ वेल कहने से ही सब् ठीक नहीं हो जाता, पर मन को शान्ति मिलती है, और शांत चित्त से ही व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ने का सही तरीका सोच सकता है।
मन पर नियंत्रण किसी भी खिलाड़ी, सैनिक, पायलेट, अन्तरिक्ष यात्री आदि के लिए उतना ही आवश्यक है जितना जीने के लिए वायु॥ नाजुक समय पर नियंत्रण खो देने से हार या मृत्यु का भी सामना हो सकता है..

'मन के हारे हार है, और मन के जीते जीत...'
'कहिये तो आसमान को ज़मीन पर उतार लायें, मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये...'

मन चीज़ ही ऐसी होती है, यह घबराहट में बना बनाया काम बिगाड़ दे, और यदि धीरज धारण करें तो, बिगड़ता काम बना ले।

भारतीय वायु सेना में मेरे एक मित्र थे जो एक किस्सा बताते थे १९७१ के भारत-पाक युद्ध का।
"एक था पायलेट पंडित... बड़ा गजब का लड़ाका था... कितने ही बार मौत के मुख से जीवित वापस आया, औरपाकी लोगों को हरा कर ही आता था... जब लौटला था, तो कई बार उसके प्लेन को देख कर यकीन ही नहीं होता था, कि इसमें बैठा कोई जीवित बचसकता है, ऐसा प्लेन लैंड भी कर सकता है... छिन्न भिन्न हुआ प्लेन, विंग्स में कई छेद, फिन के टुकड़े टूटे हुए... पर हर बार लौटता था वो ... कोई और होता तो शायद प्लेन को हवा में छोड़ कर कूद जाता, या डर के कारण क्रेशकर देता... मर जाता... पर वो, वो अकेला था... ऐसा जाँबाज जो उस हाल में भी लड़ कर सलामत वापस आता था॥

जानते
हो उसका राज क्या था??

उसके
चेस्ट पॉकेट में रखी राम-चरित-मानस की छोटी प्रति!!! उसका कहना था, कुचरू जी, जब तक यह मेरे सीने से लगी है, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा!!!"

इस सच्चाई के पीछे बस एक ही बात है... जब तक मन पर नियंत्रण है, जब तक मन में विश्वास है, जब तक मन में हार नहीं है, तब तक, तब तक, विजय हमारे साथ है।

ऊपर लगे चित्र से यही बताना चाहता हूँ मैं, जीवन का अंत नहीं होता, झड़ते हुए पुष्प के नीचे से नयी कोपलें आ रही हैं, नए पुष्प फिर उसमें खिलेंगे...
तो भैया, आल इज्ज़ वेल!!!!!


आज इतना ही,
~जयंत चौधरी
जनवरी, २०१०

Tuesday, January 5, 2010

मैं अमर हूँ!!

लिखने कुछ और बैठा था... लिख कुछ और रहा हूँ
समय का ही फेर है... जो मन में था उसे लिखने में देर हो गयी और अवसर चूक गया
समय समय की ही बात है

यह समय होता ही है ऐसा... निर्दयी,
कभी किसी के लिए ठहरता ही नहीं,
जब कभी चाहो तो गुजरता ही नहीं

यह समय होता ही है ऐसा... निष्ठुर,
कभी नेत्रों से गिरता है नीर निर्झर,
कहीं मन में चुभता है टीस बनकर

यह समय होता ही है ऐसा... बलवान,
रेत बनकर बिखर जाते हैं, जो रहे चट्टान,
यही तो यम बनकर दिखाता है शमशान

यह समय होता ही है ऐसा... दयावान,
आपबीती को बिसारने का देता है ज्ञान,
यही तो पतन के बाद लाता है उत्थान

यह समय करता है ऐसा... अक्सर,
खुद को वापस पाने का देता है अवसर,
इसे पहचानो तो चढ़ाता है सर आखों पर

यह समय होता ही है... अमर,
जो था, ना होगा कल, याद रख मगर,
सच यह दुःख के लिए भी है, अब काट अपना सफ़र!!!!


~जयंत चौधरी
जन, ५, २०१०

(आपका भी समय ले लिया मैंने आज... किन्तु आज समय पर लिखने का ही मन हो गया... आशा करता हूँ क्षमा करेंगे यदि आपका समय व्यर्थ किया है मैंने तो..)

हिन्दू “नाबालिग” लड़की भगाना शरीयत के मुताबिक जायज़ है? तथा दीप प्रज्जवलित करना “गैर-इस्लामिक” है? : पढ़िये दो सेकुलर खबरें (सुरेश

सुरेश जी,

आपको शत शत नमन...
कृपया और से भदकाऊ पोस्ट लिखते रहें ताकि सलीम जैसे लोग और भड़क सकें आप के खिलाफ।
आखिर सच तो कड़वा होता है। तो कड़वी गोली आसानी से नहीं खाई जाती है ना!!!!

जहां तक न्यायालय की बात है... तो क़ानून अंधा ही तो होता है॥ खराबी तो क़ानून में ही है ना॥
अच्छा है की मैं "हिन्दू"स्तान में नहीं हूँ, नहीं तो खुदा जाने मेरी बेटियों का क्या होता... कोई भगवान् ना करे ऐसे किसी लव जिहाद वाले से मिलती तो... इससे तो अच्छा सेकुलर अमेरिका है जहां दुहरी क़ानून पद्धति नहीं है॥ और १८ साल से कम की लड़की से हुए यौन संबंधों को "कानूनन बलात्कार" ही माना जाता है, चाहे स्वेच्छा से हुया हो॥

दिया के बारे में ज्यादा नाराज ना होंए... एक दिन राष्ट्र ध्वज का रंग भी हरा होने वाला है... और "अधिनायक जय हे" भी गैर-इस्लामिक हो जाएगा क्योनी खुदा की अलावा किसी और की जय बोलना भी तो गैर-इस्लामिक होगा ना!!!!!

ताजुब्ब है किसी ने अभी तक इस पर बवाल नहीं मचाया??

~जयंत

Monday, January 4, 2010

वर्ष नया, विचार पुराने?

गत का अंत और नव का आगमन

नव वर्ष के स्वागत में कितने ही परिचितों ने पत्र (ईमेल) लिखे, और ना जाने कितनों ने किस किस तरीके से मनाया गत का अंत और नव का आगमन... किन्तु ऐसे कितने हैं जिन्होंने सचमुच नवीनता और परिवर्तन लाने का प्रयास किया है?

परिवर्तन तो संसार का नियम है, किन्तु मानव मन इसके विरोधी के रूप में सामने आता है। यह मन पुराने विचारों से घिरा रहता है॥ मैं तथाकथित आधुनिक विचारों के बारे में नहीं बात कर रहा हूँ, अपितु एक दूसरा द्रष्टिकोण बता रहा हूँ। तो क्या है पुराना, जिसे छोड़ना होगा?

प्रथम, हमारी पुरानी बातें, विशेषकर कटु, दुखकारी, नकारात्मक यादें और घटनाएँ।
कभी, किसी ने हमें अतीत में कुछ कहा था या किया था, जो मन तो ठेस पहुंचा गया... तो बस, बाँध ली एक गाँठ। जो, कभी छूटती ही नहीं।
कभी, कहीं, किसी प्रयास में सफलता नहीं मिली, तो यत्न करना ही छोड़ दिया। कभी विश्लेषण नहीं किया की सफलता क्यों नहीं मिलिल, कभी और ज्यादा कड़ी तपस्या नहीं की... बस हार मान कर, पुरानी असफलता को बाँध रखा॥
जो सपने देखे थे कभी, वो पूरे नहीं हुए तो... बस स्वपन देखने ही छोड़ दिए? 'क्या फ़ायदा सपने देखने से', ऐसे विचार पाल लिए॥

द्वितीय, हमारी 'चलता है' वाली प्रवृत्ती को त्यागना होगा।
कब तक, आखिर कब तक, यह 'चलता है' वाली आदत हमें बाँध कर रखेगी?
हम मनुष्य हैं, पशु नहीं, जो अपने गले में बंधी अकर्मण्यता की रस्सी को ही नियति मान कर जड़ता के खूंटे से बंधे हुए सब् चलने दें... जैसे चल रहा है।
यह समय है खुद को चुनौती देने का॥
एक नयी दिशा में पग धरने का॥
एक नए आसमान की ओर उड़ान भरने का॥

है आप में इस नवीनता का स्वागत करने का दम??

यदि हाँ, तो "नव वर्ष आपके लिए नवीनता लाये और मंगलमय हो"।

~जयंत

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