Friday, July 17, 2009

** जीवन क्या है? ** (~जयंत)


वो जीवन भी क्या जीवन है,
जो घुटनों पर चल कर हो कटा,
वो हस्त नहीं, बस माटी है,
जो जिस तिस
के आगे हो फैला,

सीना वो व्यर्थ किया धड़का,
जिसमें ना स्वाभिमान भरा,

उत्तम है शीश, जो भूमि पर पड़ा,
जब कंधों पे रहा, तब नहीं झुका....


~जयंत चौधरी
July 11, 2009


Tuesday, July 7, 2009

* राह में हो अँधेरा तो...! * (~जयंत)


कई घटनाएँ देखकर (और कुछ का भुक्तभोगी बनकर) मन थोड़ा सा विचलित हो गया था... विगत कई दिवसों से समय का घोर अभाव चल रहा था... और उससे बड़ी बात थी; मन
लग नहीं पा रहा था.. कविता, साहित्य आदि में... बहुत सी व्याधियां हैं और चुनौतियां हैं अभी जीवन में.... संघर्ष जारी है... :)
इस बी
मेरे कुछ प्रिय और आदरणीय 'प्रेरणा-स्रोतों' के प्रोत्साहन से कुछ लिखा है...

राह में हो अँधेरा तो,
ख़ुद को ना पलटने दे,
आखों में आग पैदा कर,
ख़ुद ही मशाल बना ले....

सीने में हो आग तो,
ख़ुद को ना झुलसने दे,
कीट* को पिघला कर,
मन को लौह का बना ले...

हाथ जो पिरने लगे तो,
उनको तू ना रुकने दे,
ख़ुद को चुनौती देकर,
शक्ति का संचार कर ले....

~जयंत
७-७-२००९

कीट* =
खनिज जिसमें पत्थर के साथ लौह होता हैयहाँ कीट से तात्पर्य कच्चे मन से है... जिसे पिघला पर (संकट की अग्नि में), शुद्ध लौह (मजबूत और दृढ) का रूप दिया जा सकता है


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