Friday, May 29, 2009

मेरे ब्लॉग के 'अनुसरण' के लिए धन्यवाद...


रिचा जी ने बड़ाई से सुभारंभ किया,
मुनीश जी ने बढ़कर सहारा दिया,
मार्क जी ने ब्लॉग को 'मार्क' किया,
राजकुमारी जी ने राज-दान दिया,

तृप्ति जी ने टिप्पणियों से तृप्त किया,
नेहा जी ने आकर नेह-रस बरसा दिया,
संगीता जी ने प्रेरणा का संगीत दिया,
अनिल भाई ने कांति को बढ़ा दिया,

श्रीधर जी ने ब्लॉग की श्री को बढ़ाया,
और फ़िर स्वीकृति का स्टांप मिला,
अरुणा जी ने प्रेम से प्रकाश दिया,
पूनम जी ने रज-रश्मि को फैला दिया,

त्रिदेवी जी से निशब्द प्रोत्साहन मिला,
अलबेला जी से प्रेम मिला अलबेला,
ज़ार जी ने ब्लॉग को भरपूर हौसला दिया,
मधुर बड़ाई करती रही सदैव जी प्रिया,

महेंद्र जी से निरंतर समर्थन मिला,
अंत में उर्मी जी से तरंगी सहारा मिला,
आप सब से जो भी प्रोत्साहन मिला,
उससे ही है मेरे ब्लॉग का बाग़ खिला....

आपसे अनुरोध है, आते रहियेगा,
और ब्लॉग को महकाते रहियेगा,
आपके सुझावों से ही बेहतर बना,
आगे भी रखियेगा अपनी कृपा....

( आप सब को मेरे ह्रदय की गहराइयों से बहुत बहुत धन्यवाद॥ आप सबको लंबे समय से मेरे ब्लॉग को "अनुसरण" करने के लिए धन्यवाद देना चाहता था॥ किंतु अभी तक नहीं कर पाया... विलंब के लिए खेद है, आशा करता हूँ आपका प्रेम ऐसे ही बना रहेगा॥)
(इस धन्यवाद पत्र के लिए, आप सब के नाम या ब्लॉग के नाम का उपयोग किया है... आशा करता हूँ बुरा ना मानेंगे और कोई त्रुटी हुए तो क्षमा करेंगे॥)

~जयंत चौधरी
२९ मई, २००९

Tuesday, May 26, 2009

* वो, चुप खड़ी... *

जो,
चुप खड़ी,
परदे के पीछे,
तेरे सपनों को रंगने,
ख़ुद को ही पीसती रही,
तेरे हिस्से के दुःख सहती रही,
तुझे सुखों की छाव में सुलाती रही,
तेरे अस्तित्व हेतु, ख़ुद मिट कर मिटटी बनी,
और खुद को मिटा, तुझमें जीती रही,
रज बन, तेरी ठोकरें खाती रही,
आंसुओं में, वों अपने ही,
धीरे धीरे घुलती रही,
मगर फ़िर भी,
चुप रही,
क्यों?
?

~जयंत चौधरी

कौन है वो? माँ, पत्नी, या कभी बहन?? हर रूप में, है तो वो नारी ही!! उसके त्याग और असीम बलिदान पर खड़े होकर गर्वाते पुरुषों से यह प्रश्न है मेरा.. कभी सोचा वो क्यों चुप रहती है?

क्योंकि.. वो महान है और महानता बिना बोले और जताए परोपकार करने में है..

तुम्हे प्रतिष्ठित करने और सफलता दिलाने में उसका कितना बड़ा योगदान है, कभी विचारा? कभी उसको अपने ह्रदय से खुलकर श्रेय दिया?

Thursday, May 21, 2009

** मेरे सपने - भाग २ **


सपने,
देखता हूँ,
पलकों पर पाल,

उन्हें बड़ा करता हूँ,

ह्रदय भूमि पर रोप कर,

अपने खून पसीने से सींचता हूँ,

उन वृक्षों पर बसाकर अरमानों के परिंदे,

बनाकर आशा के छोटे बड़े घोंसले,

देकर सशक्त पंख परिश्रम के,

सिखा कर उड़ना उन्हें,
एक दिन आकाश,

छूता हूँ,

मैं.


~जयंत चौधरी
२० मई २००९

एक
नया प्रयोग,
एक शब्द से प्रारंभ,
हर पंक्ति में एक जोड़ना,
सात तक पहुँच कर,
पुनः घटाना प्रारंभ,
वापस एक,
शब्द.

आशा करता हूँ पसंद आयेगा..
(लम्बे अंतराल के बाद.... कठोर परिश्रम से थोडी राहत के क्षणों में..)

Wednesday, May 13, 2009

* मैं अब नहीं सिसकती, हाँ, मैं हूँ एक स्त्री..*


मैं अब नहीं सिसकती,
हाँ, मैं हूँ एक स्त्री..

मैं सदियों से शोषित,
भूखी और कुपोषित,
सदैव रही उपेक्षित,
करती हूँ ये घोषित...

मौन अब नहीं रहूंगी,
अत्याचार नहीं सहूंगी,
मैं सारे बंधन खोलूंगी,
और बंदी-गृह को तोडूंगी...

शक्ति का आह्वान करूंगी,
और रण की हुंकार भरुंगी,
रग-रग में उत्साह रखूंगी,
मैं दुश्मन का नाश करुँगी...

प्रगति-पथ पर मैं बढूंगी,
थक कर के मैं ना रुकूंगी,
तूफानों को मैं थामूंगी,
सागर को भी लाघूंगी....

अग्नि-वार को मैं झेलूंगी,
पर क़दमों को ना रोकूंगी,
आखों में लक्ष्य सजाऊँगी,
एक दिन उसे ही पाऊँगी...

मुझमे है वो आदि-शक्ति,
हाँ, मैं हूँ आख़िर एक स्त्री..

~जयंत चौधरी
१४ मई, २००९
[समय गया है समानता का॥ जन कल्याण का॥ स्त्री के उचित स्थान का॥ शक्ति के आह्वान का॥]

Monday, May 11, 2009

> राहुल बाबा, और संजू बाबा...<


राहुल बाबा, और संजू बाबा,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा...

देश की आपको कोई फिकर नहीं,
दिखावे के सिवा कुछ आता नहीं,
फिर भी, लोग करें हैं आपकी वाह वा,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा...

पात्रता से कोई मतलब भी नहीं,
घर-परिवार ही सबसे बात बड़ी,
मुंह में आपके चांदी का चमचा,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा....

जनता
के दर्द का अहसास नहीं,
कष्टों से पड़ा आपका पाला नहीं,
और रहे, घडियाली आंसू बहा,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा....

जो भी आप करो वोही ही सही,
ऐ के ४७ हो या हो भई क्वात्रोची,
नहीं
कोई, आपकी शक्ति का बयाँ,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा....

एक से आतंक रोका गया नहीं,
दूसरे ने कोई कसर छोड़ी नहीं,
रहे वो, बेशर्मी से कांधार भुना,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा....

राहुल बाबा, और संजू बाबा,
ओये शाबा, शाबा, ओये शाबा...


~जयंत चौधरी
(नमन है सच्चे राष्ट्र गौरवों को... और धिक्कार है तमाशेबीनों को...)
(लगाया गया फोटो किसी और ब्लॉग से लिया गया है,
किन्तु मैं उस ब्लॉग का पता खो चुका हूँ...
अतैव उसका नाम नहीं लिख पा रहा हूँ...
किन्तु सादर आभार है उनको जिन्होंने इस फोटो को दिखाया..)

Sunday, May 10, 2009

* माता का कर्ज *


जो अपनी माता का ना हुआ,
वो किसी का क्या हो पायेगा,
माता का कर्ज ना उतरेगा,
चाहे लाखों बार चुकायेगा,

इसने तुझको पाला पोसा,
यह बात कैसे झुठ्लायेगा,
जिस गोदी में पल बड़ा हुआ,
उससे बड़ा नहीं हो पायेगा,

माता पर जो तुने वार किया,
महापाप से कैसे बच पायेगा,
जीवन को ग्रहण लग जाएगा,
तू दर-दर की ठोकरें खायेगा,

जिनने तुझे वट-वृक्ष बनाया,
उन जड़ों को कैसे काटेगा,
उन पर जो तूने वार किया,
तो ख़ुद जीवित कैसे रह पायेगा,

इतिहास तेरा कैसा भी रहा,
उससे पीछा कैसे छुडाएगा,
कैसे भी हो, तुझे ढूंढ के, ये
भविष्य में फिर जायेगा,

जननी से जो प्रेम करेगा,
और पुत्र धर्म निबाहेगा,
जो उसका हित ध्यान रखेगा,
धरती पर स्वर्ग वो पायेगा....

(मातृ दिवस पर, संसार की माताओं को भेंट)
~जयंत चौधरी
मई २००९

( इस कविता में, माता के दो रूपों के बारे में लिखा गया है...
एक तो हमारी जन्मदाई माँ, और दूसरी भारत माँ...
मैंने उन लोगों पर भी कटाक्ष करने का प्रयास किया है,
जो भारत माँ के आँचल को छलनी कर रहें हैं... )

Wednesday, May 6, 2009

> गाँधी जी की चप्पलें.. <


एक दिन जाने क्या,
मेरे मन में आ गया,
और गाँधी जी की,
तस्वीर लेने चला गया,
दूकान वाला भी,
मेरी सुन चकरा गया,
बस गनीमत समझो,
वो गिर नहीं पड़ा...

बातें सुन कर हमारी,
हैरान रह गया,
हमें नीचे से ऊपर तक,
देख, उसने कहा,
भाई साहेब, आप,
यहाँ के नहीं हो सकते हैं,
सच कहूँ, आप,
१९४७ के मॉडल लगते हैं..

भला बापू का फोटो,
किसलिए लगायेंगे,
क्या उनके फोटो के,
सामने रिश्वत खाएँगे,
मैंने कहा, क्यों,
पुलिस वाला लगता हूँ क्या?
ये रोग पुलिस को है,
जिसकी ना कोई दवा..

जब तक वो,
खुले आम नहीं खाते हैं,
हराम का माल,
पचा नहीं पाते हैं,
आम आदमी को,
मनमाना चूसते हैं,
दिखावे को, फोटो,
बापू का चिपकाते हैं..

मैं तो उनका,
एक सच्चा भक्त हूँ,
ऊपर से नरम,
अन्दर से सख्त हूँ,
जो दमन के विरुद्ध,
निहत्था खड़ा हो सकता है,
वही अन्दर से सचमुच,
फौलाद हो सकता है...

अब तो वोह,
सचमुच गिर गया,
और उसके मुहँ से,
सत्य निकल गया,
अरे ये बातें तो,
बापू के साथ चली गई,
बस उनकी चप्पलें,
चश्मा, कटोरी रह गई...

उस चश्मे पर भी धन की,
कालिख सी जम गई,
नेताओं की आखों के आगे,
देश की इज्जत बिक गई...

जो सपना उन आखों ने,
इस चश्मे से देखा था,
वो राम-राज्य बस अब,
एक सपना ही रह गया,

और चप्पलों से, नेताओं ने,
खूब अपना काम निकाला,
उन्हें सिंहासन पर रख,
अपना भ्रष्ट राज्य बढ़ा डाला,

जो उन चप्पलों की,
धूल मात्र भी ना थे,
वो ही उनका नाम,
धूल में मिलाने लगे,

देशी छोड़ सिर्फ़,
विदेशी पीने लगे,
सरेआम संसद में,
चप्पल चलाने लगे...

एक रही कटोरी,
एक छोटी सी प्लेट,
उनको भी इन भ्रष्टों ने,
अपने में लिया समेट,

जिस से महात्मा ने,
सबसे बाँट कर खाया,
उनकी ही पार्टी वालों ने,
पूरा देश बेशर्मी से पचाया,

जो गरीबों को जाना था,
इन दुष्टों के पेट में गया,
घोर गरीबी है, फ़िर भी,
मेरा देश महान बन गया...

जिसने पूरा ही जीवन,
सादगी में बिताया,
उसके चंद बचे टुकड़ों को,
लोगों ने नीलाम करवाया,

गाँधी की ही पार्टी ने भी,
खूब अपना कर्तव्य निभाया,
धरोहर लाने के लिए,
एक भी कदम ना उठाया...

हमने कहा, यहाँ तो भाई,
विसंगतियों का ही खेल है,
पर गनीमत है, कि अब भी,
एक भारत माई का लाल है,

जो अपने कमाए पैसे से,
राष्ट्र-पिता की अमानत वापस लाया,
और बापू जिसके विरोधी थे,
उसी से उसने, पैसा कमाया,

कांग्रेस ने उस पर भी,
श्रेय लेने का प्रयास किया,
और गाँधी जी के सत्य के,
सिन्धांत को खुले-आम दफना दिया,

अब मैं भी गाँधी जी की,
तस्वीर लेकर क्या करूंगा,
वो सिर्फ़ तस्वीरों में रह गए हैं,
इस सच्चाई से कब तक बचूँगा.....
इस सच्चाई से कब तक बचूँगा.....

~जयंत चौधरी
६ मई २००९
(गहन दुःख से भरे ह्रदय से...)

(Artwork by wpclipart)

~ प्रेम, प्रेम है...~


प्रेम, प्रेम है,
और है क्या..
कर नहीं सकता,
कोई इसको बयाँ...

प्रेम-सरेश बिन,
जीवन बिखरा..
और बंधे प्रेम से,
जीवन का समाँ..

प्रेम-ज्योत बिन,
जग अंधियारा..
और जले प्रेम से,
जीवन में शमां..


प्रेम ना हो तो,
जग है क्या...
जो प्रेम मिले,
तो मिले जहाँ


~जयंत चौधरी
५ मई २००९

(सरेश* = गोंद, glue)

Tuesday, May 5, 2009

~ एक अधूरी आस ~


वह
क्षण नहीं था,
एक जीवन का अंत,
एक नए अध्याय का,
उसे कहते हैं प्रारंभ...

जीवन के मेले में,
आकर कहीं चला गया,
पर चंद दिनों में,
जन्मों का सुख दे गया,

संसार के नियमों को,
मान के भी तोड़ गया,
जाना था, गया,
पर यादें छोड़ गया,

और
पीछे रह गयी,
एक अधूरी आस,
नन्हे से ह्रदय में,
चुभती सी फांस,

बड़ा कठिन है समझना,
प्रेम की टेढी भाषा,
तू ही है प्रियवर अब,
मेरे जीवन की परिभाषा,

********************


(मेरे एक मित्र को सादर समर्पित...)


~जयंत चौधरी

Saturday, May 2, 2009

मगर प्यार का रंग ना बदला..


रंगों से लदते थे वन-उपवन,
लील गया उन सबको पतझड़,
जाने कितने मौसम बदले,
मगर प्यार का रंग ना बदला...

जाने कैसे, कब, हम रंगाए,
विरह के अगनित अश्रु बहाए,
पर मेरे मन की चादर से,
तेरे प्यार का रंग ना निकला...

भौतिक कठिनाई से सब थर्राए,
क्षणिक अनुरक्ति भी मुरझाए,
पीड़ा की भीषण ज्वाला से,
मगर प्यार का रंग ना पिघला...

समय का पहिया घूमता जाए,
फ़िर यौवन छोड़ बुढापा आए,
परिवर्तन आए कई जीवन में,
मगर प्यार का ढंग ना बदला...

~जयंत चौधरी
२२ अप्रैल 2009

(हरकीरत जी के कहने से मैंने पुष्प की तस्वीर बदल दी है॥)

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