Wednesday, January 30, 2008

कर्तव्य (Poora)

पात्र
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- माँ
- बेटा मेजर बत्रा
- बेटी कविता
- पिता जी (नाटक में नहीं दिखाया है)
- कैप्टन मूर्ति
- कर्नल गर्ग

द्रश्य १
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(मेजर बैठे है एक टेंट के सामने कुछ पढ़ रहें हैं। उनका मित्र कैप्टन मूर्ति आता है।)
क - गुड मार्निंग सर, क्या कर रहें है?
म - आओ कैप्टन मूर्ति... और कितनी बार कहा है 'सर' मत बोला कर।
क - क्यों सर?? (सर पर थोडा जोर देता है)
म - सर सर बोल कर सर खा जाता है!!! (सर पकड़ लेटा है)
क - क्या सर.....
म - फिर सर॥
क - सॉरी सर (चेहरा बना कर)
म - तू ऐसे नहीं मानेगा... चल १० पुश-अप लगा। अभी (कड़क आवाज में)
क - (शुरू हो जाता है)
म - बस कर मैं तो मजाक कर रहा था।
क - अरे सर आप भी ना..... ओफ्फ्फ़ सॉरी सर ... मतलब सॉरी मेजर बत्रा (!!!)
म - (हसते हुए) अब बता कैसे आना हुआ।
क - (शरारत के साथ) चिट्ठी आयी है आई है... गर्ल-फ्रेंड कि चिठ्ठी आई है....
म - मैं और गर्ल-फ्रेंड !!!! इस लंगूर के हाथ में हूर??
क - हूर तो पता नहीं पर आप जरूर हो लंगूर...
(म चिठ्ठी छीन लेटा है, और बैठ के पढ़ता है)

म - (मुस्करा कर) माँ तू भी ना... फिर वोही...
क - क्या हुआ... अर्री आप के गाल तो लाल हो रहें हैं... अब तो आप सचमुच के लंगूर लग रहें हैं॥ वह लाल मुह वाले!!!
म - माँ फिर पीछे पड़ी है... शादी कर- शादी कर... अपनी पसंद से ही कर ले, बस कर ले॥ कोई भी चलेगी, बस तू खोज ले.
क - कोई भी... तो खोज लो ना॥
म - ज़रा चारों तरफ देख.... यहाँ कहाँ मिलेगी, यहाँ तो इंसान का नाम निशाँ नहीं है...
क - ह्म्म्म.... बंदरिया तो मिल सकती है yahaan, आप बन्दर जो हो॥ (म मुँह बनाता है)
म - अबे॥
क- लेकिन आपने तो अवसर गवां दिया... चिडिया तो उड़ गयी और अब आप जाल फैलाते हो।
म - चिडिया?? जाल?? क्या मतलब??
क - (कुहनी से मार कर) वह अपनी प्रीती... आयी थी ना और बोली थी "दिल से" "कभी अलविदा ना कहना"॥ कैसे कमर में हाथ दाल रही थी... मैंने सब देखा था पीछे से (विंक करता है)। बस उस समय हाथ पकड़ लेना था।
म - ह्म्म्म्म वह तो गयी॥ तू कहाँ था, तब बोला क्यों नहीं??
क - देखने में बिजी था॥ (विंक)
म - वैसे भी वह चिडिया तो इस बन्दर के हाथ नहीं आती
क - कहो तो और बुलवा?? प्रियंका, करीना यस्स्स्स्स्स्स विदया!!

(इस समय कमांडिंग अफसर आते हैं... दोनो खडे हो कर सैल्यूट करतें हैं)
कर - आराम से॥ लो बत्रा मैंने तुम्हारी समस्या हल कर दी है।
म - मैं समझा नहीं सर?
कर - मुझे मूर्ति ने सब बता दिया था। तुम्हे अपनी माँ कि बात मानना चाहिए।
क - पर सर वह॥
कर - (मूर्ति को चुप करा कर) रुको हमेशा बीच में बोलते हो#$# मैं बत्रा कि पोस्टिंग जबलपुर करा दी है।
क - वह मारा ना पापड़ वाले को!! याहू
कर - (गुस्से में) किसे?
म - सॉरी सर, उसे पता नहीं था कि आपके ससुर जी का नाम पापड़ वाला है।
क - माफ़ करिये सर।
कर - बेटा यदि सीमा पर नहीं होता ना तो इतनी छुट नहीं मिलती। खैर बत्रा मैंने तुम्हे १ महीने कि छुट्टी दे दी है। अब जा शादी कर के ही आना। और बिना शादी के लौटे तो सारे दिन रायफल सर पर उठा कर ground के चक्कर लगाते रहोगे॥ (मुस्कराता है)
म - (भावुक हो कर) सर..... मैं कैसे आपका धन्यवाद दूँ..... माँ और कविता कितनी प्रसन्न होंगी...
क - याहू!!!! (कर को देख कर) सॉरी सर, मैं बहुत खुश हूँ मेजर बत्रा के लिए।
कर - ठीक है... पर सिर्फ आज के लिए...
म - सर आपने आज ...
कर - तुम इसके अधिकारी हो॥ बहुत हुयी देश सेवा, ५ साल से यहाँ हो। अब घर जाओ माँ राह देखती होगी।
क - और धन्यवाद मेरा कहो, मैंने सर को तुम्हारी कहानी बताई थी.... अब आप भाभी जी के साथ नर्मदा में चादानी रात में नाव में ..... (मेजर उसे गले लगा कर चुप करा देता है)




द्रश्य २
=====

(माँ बैठी है घर पर... कुछ बुनती हुयी॥ कविता आती है गाते गाते )
कव - माँ ओ माँ ... माँ ओ माँ... (गाती है और उछलती है)
माँ - क्या हुआ, कुछ बोल तो॥
कव - माँ, भैया घर आ रहा है!!
माँ - (उठ कर, सामान गिर जाता है) मेरा लाल... मेरा लाल आ रहा है?? कब?
कव - कल ही... ओ माँ ५ साल बाद।
माँ - मैं तो उसे जी भर देख भी ना पायुंगी... आसूं जो आजायेंगे।
कव - ओ माँ तू उसे देखेगी भी और शादी भी करवाएगी।
माँ - क्या कहा तुने??
कव - हाँ माँ, वह शादी के लिए मान गया है। (हाथों कि मुठ्ठी बना कर, हवा में जोर से हिला कर)
माँ - हे भगवान्!!! इतनी सारी खुशियाँ।
कव - और सुनो... उसकी पोस्टिंग जबलपुर हो गयी है॥
माँ - अरे सम्हाल मुझे... मैं तो मारे ख़ुशी के बेहोश ना हो जाऊं। तेरे पिता जी सुनेंगे तो पता नहीं क्या कारेंगे। रामू कि दुकान से मीठा लेने जायेंगे, तेरे भैया को बहुत पसंद है ना।
कव - वह जब टूर से लौटेंगे तब उनको कितनी ख़ुशी होगी॥
माँ - अच्छा... सुन वह लड़कियों के फोटो वाला डिब्बा ले आ॥ मेरे लाल को दिखानी होगी॥ और कितने सारे काम करने हैं। लड्डू बनाने होंगे, नमकीन कि तैयारी करनी होगी। जल्दी कर... (जल्दी का भाव लाना है, हाथ चला कर)
कव - (गाती है ) माँ तू कितनी अच्छी है कितनी भोली है....
माँ - चल हट!

(कविता जाने लगाती है)( इतनी में मेजर बत्रा आ जाता है)
माँ - कविता!!!!
कव - क्या हुआ... भैया!!
म - (माँ के पाव छूता है)
माँ - यह मेरा लाल ही है ना...
म - हाँ माँ मैं ही हूँ (हसते हुए) मैं आ गया।
माँ - तू तो कल आने वाला था?
म - मुझे surprise देनाथा!!
माँ - एक दिन तू ऐसा surprise देगा कि...
कव - हाँ भैया हम कुछ तैयारी भी न कर सके।
म - क्यों आप लोगों को ख़ुशी नहीं है मेरे आने कि? (झूट में) तो मैं चला जाता हूँ।
कव - तू तो बुरा मान गया।
माँ - अरी तेरा भैया तो एक अभिनेता है, देख कैसे बुद्धू बना दिया तुझे।
म - (हसते हुए) हां हां बुद्धू को भी कोई बुद्धू बना सकता है?
कव - भैया!!!!! (नाखून दिखा कर) नोच लुंगी॥
म - (और हस कर) हां हां खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे!!!
क - माँ देखो ना (रोने ही वाली है)
माँ - (मेजर को) आते ही रुलाने लग जाता है।
म - (सकपका कर) अरे मैं तो मजाक कर रहा था.
कव - माँ, देखना एक दिन रुलाएगा।
माँ - अब बस कर॥ चल बेटा अब तू लड़की पसंद कर ले। कविता तू वह डिब्बा ले आ।
म - ठीक है माँ जैसा आप कहें।

कव - (डिब्बा देकर) यह लो माँ अब्द एक भाभी ढूँढ ही लेना। मैं चली चाय बना कर लाती हूँ....
(माँ और मेजर देखते हैं....)


म - माँ तू ही पसंद कर ले, मुझसे नहीं होता।
माँ - इतने वर्षों से कुछ ना कुछ बहाना, अब तो मैं ही ढूँढ लेटी हूँ। फिर मेरे लाल कि बारात निकलेगी, बहु आएगी, फिर नाती/नातिन... मैं तो नाचती फिरुंगी..... (सपनों में खो जाती है)॥

(इतने में फ़ोन कि घंटी बजती है। मेजर फ़ोन उठाता है।)
म - हैलो मेजर बत्रा बोल रहा हूँ
कर - (फ़ोन पर) मेजर बत्रा.... मेजर ध्यान से सुनो... इस समय हमारे देश पास युद्ध के बादल मंडरा रहें है। आज १ घंटे पहले ही हम पर आक्रमण हुआ है। सारी छुट्टियाँ रद्द कर दी गयीं है। तुम्हे इसी समय वापस आ कर रिपोर्ट करना है। मुझे खेद है कि तुम्हे इस समय फ़ोन करना पडा।
म - (चहरे पर भाव ला कर) सर॥ खेद कैसा यह तो मेरा सौभाग्य है कि मैं मात्रभूमि की सेवा कर सकूँगा। मैं भारत माँ का रक्षक हूँ और इस धरती के काम आऊँगा। मैं अभी रवाना होता हूँ सर। जय हिंद सर.
कर - जय हिंद।
(फ़ोन रखता है)
(इतने में कविता आ जाती है, चाय कि ट्रे लेकर)
माँ - (चिंता में) क्या हुआ??
म- माँ दुश्मनों ने आक्रमण कर दिया है। मुझे अभी जाना होगा।
क - भैया (टूटती आवाज में)... रूक जा थोडे दिन और सही...
म- पगली, मैं अभी गया और अभी आया॥ दुश्मनों को पता नहीं है किससे टकराएँ हैं। भारत माँ के सपूत हिमालय कि तरह अडिग हैं॥ सबक सीखा देंगे उन्हें..
माँ - (रुंधे गले से)बेटा, अभी तो मैंने घडी भर भी तुझे नहीं देखा है... पिता जी के आने तक रूक जा, वह कल ही आ जायेंगे।
म- माँ, मुझे मत रोक, भारत माँ ने मुझे बुलाया है। उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, इस कर्तव्य से मैं पीछे नहीं हटूंगा।
(पीछे वंदे मातरम् शुरू होता है)
माँ - (कठोर बन कर) जा बेटा, तेरा कर्तव्य निभा कर आ।
(मेजर पाव छूकर आशीर्वाद लेटा है)
माँ - सदा विजयी हो।
कव - भैय हमें तुम पर गर्व है।
म - और मुझे आप सब पर। maa मैं वचन देता हूँ कि जल्दी लौटूंगा और तेरे सारे अरमान पूरे करूंगा। pita ji से कहना उनके वीरता के पाठ आज काम आएंगे। अब मैं जाता हूँ। जय हिंद.
(पीछे "कन्धों से मिलते हैं कंधे" शुरू होता है)






द्रश्य
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(पीछे से गोलियों, बमों की आवाज रही हैसिर्फ मेजर और कैप्टन बचे हैंदोनो जमीन पर लेट कर फायरिंग कर रहें हैंदोनो घायल हैं.)
- मेजर बत्रा, हमारे सारे साथी शहीद हो चुके हैंगोलियाँ भी खतम होने को हैं
- और रेडियो भी नष्ट हो गया हैऔर बेस कैम्प खबर देना जरूरी है
- आप जाइए, मैंने इन लुटेरों को देख लेता हूँ
- (क्रोध में) कैप्टन मूर्ति मैं और पीठ दिखा दूँ... कभी नहीं
- आप कितनी बार लड़ चुके हैं, अब मेरे बारी है
- (हस कर) यह दिल मांगे मोर!!!!
- नो मोर सरआप जाइए मैं इन्हें रोकता हूँहमारे विश्वास का यह बदला
- तुम जाओअभी इसिस समयसमय बहुत कम है...
- मगर आप बहुत घायल हैं... आप जाइए... बेस कैम्प में डाक्टर ...
(उसे रोक कर)
- तुम अभी जाओयह मेरा आदेश है
- पर आप को इस हालत में छोड़ कर नहीं....
(उसे रोक कर)
- मैं तुम्हारा सीनियर ऑफिसर हमकर्नल साहेब यहाँ नहीं है तो मैं कमांडिंग ऑफिसर भी हूँयह मेरी कमांड है कैप्टन मूर्ति, अभी जाओ और मदद ले कर आओ... अब जाओ... (क्रोध में)
- (बहुत मुश्किल से)... अच्छा सरअपना ख्याल रखना...और उन्हें मजा चखा देना और कुछ को मेरे लिए भी छोड़ देना
- तू अभी भी सुधरेगा... (हस कर) तू हमेशा ऐसे ही रहनाअब जा
(कैप्टन जाता है)
- (गोली चलाते हुए) आओ कायरों, तुम पर भारत माँ का एक सपूत भी भारी पडेगा
(गोलियां चलती रहती हैं)
(दो चार गोलियां लगाती हैं)
(इतने में कैप्टन मदद ले कर जाता है)
(मेजर के प्राण निकलने वाले हैं।) कैप्टन उसका सर गोद में ले लेता है)
- सर... सर यह क्या हुआ
- कुछ नहीं मैंने उन्हें सबक सिखा दिया... (टूटती सासों से) एक एक को गिरा दिया... तेरे लिए नहीं छोड़ पायादोस्त
- आप मत बोलो, मेडिक आता होगा... (रोना रोकते हुए)।
- पिता जी से कहना, मैं पीछे नहीं हटा... कविता को भाभी तू दे देना... (टूटती सासों से) और माँ से कहना मैं उसे दिया वचन ना पूरा कर सका पर भारत माँ को दिया वचन निभा दिया... मैंने अपना कर्तव्य (आख़िरी सांस) जय हिंद
(पीछे "कट गए सर हमारे कोई गम नहीं..." या "कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई बंगाली.... मेरे वतन के" गाना)

समाप्त...।

Monday, January 28, 2008

जाते जाते (एक कविता)

ना आरंभ में, और ना अंत में....
जीवन का अर्थ है, बस इनके अंतर में...
ना कुछ लाये थे हम, ना कुछ ले जायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

माँ के आँचल में, या तरुवर की ठंडी छाव में....
वर्षा की बूंदों में, या कोयल की सुरीली तान में....
जो सुख मिलता है हमें, वह सुख सबको दे जायेंगे...
जीवन की तपती मरुभूमि पर, अमृत रस बरसायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

स्व-रचित
- जयंत चौधरी (मार्च २६, २००७)

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