Monday, January 13, 2014

नौका - नाविक

सागर की लहरों पर,
बढ़ती नौका में बैठे,
थपेड़ों से हिलते हुए,
कभी बाएं, तो कभी दाएं,

कभी मद्धम,
और कभी मंथर,
कहीं सुनहरे उजियारे में,
और कभी अंधियारे से घिर कर,

कभी मिली पुरवाई या फिर,
कहीं किसी तूफ़ान में फंसकर,
किन्तु आगे बढ़ते, हुए निरंतर,
किन्तु आगे बढ़ते रहे निरंतर,

आज मुझे,
आभास हुआ,
संसार है सागर,
और जीवन एक नौका।।।

~ एक नाविक
 

1 comment:

Rachana said...

sahi kaha bhai sansar sagar hi hai ............badhai
rachana

Blogvani

www.blogvani.com

FeedBurner FeedCount