Tuesday, January 25, 2011

क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??


कैसी स्वतन्त्रता, और कहाँ का गणराज्य,
अपने ही देश में तिरंगा ना फहरा सके हम श्रीमान,
जब तिरंगे का हो लाल चौक में अपमान,
क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मा??

देश पे मरने वालों नहीं मिली दो गज जमीन,
और आदर्श की नीवं में हैं सारे आदर्श दफ़न,
शहीदों की चितायों पर खड़े हुए घोटाले के मकान,
कैसे करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??

जिस गीत को लिखकर किया गया,
भारत को गुलाम रखने वाले का गुणगान,
जिसमें नहीं है भारत माँ का स्थान,
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

जिसमें है अब तक उस सिंध का बखान,
जो कब का चला गया पाकिस्तान,
उस गीत का कैसे करूँ मैं सम्मान?
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

11 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना ...
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !!

Happy Republic Day.........Jai HIND

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (27/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !!

Priya said...

sahi hai..bas chutti ka din,fun and celebration....baaki ke log corrupt isliye nahi kyonki unhe opportunity nahi mili ....Desh se pyaar hai lekin ye pyaar bahut teesta hai...kal hi ek ADM ko jala diya gaya...Ustav sharma ne kanoon haath mein le liya ....Ek rebel and frustration to hai aam admi ke andar ...upar se aapki rachna ne jhakjhor diya

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

जयंत चौधरी जी
नमस्कार !

कैसी स्वतन्त्रता, और कहाँ का गणराज्य ?
अपने ही देश में तिरंगा ना फहरा सके हम श्रीमान !
जब तिरंगे का हो लाल चौक में अपमान…
क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??

आपके गीत की सारी बातें विचारणीय हैं… आभार और बधाई!

… लेकिन
गिद्ध भेड़िये हड़पे सत्ता !
भलों - भलों का साफ है पत्ता !
न्याय लुटा , ईमान लुट गया ,
ग़ाफ़िल मगर अवाम अलबत्ता !


गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

सही कहा गया... वैसे "जन गण मन " ये जोर्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया था कि जो जनगण के मन का अधिनायक है और भारत के भाग्य का विधाता है... वैसे तो शर्म सार करने वाली बात है की क्या यही एक गीत बचा था जिसमे अंग्रेजी हुकूमत के नायक की पूजा और चाटुकारिता की गयी..... लेकिन इसमें परिपेक्ष बदल गया यह पूजा गान अपने धवल के लिए राष्ट्र के लिए है... और हमें अपने धवल और राष्ट्र का माँ तो करना ही पड़ेगा ना इस गान को सम्मान दे कर .. आपकी रचना सुन्दर है ..विचारों को जगाती है..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

सही कहा गया... वैसे "जन गण मन " ये जोर्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया था कि जो जनगण के मन का अधिनायक है और भारत के भाग्य का विधाता है... वैसे तो शर्म सार करने वाली बात है की क्या यही एक गीत बचा था जिसमे अंग्रेजी हुकूमत के नायक की पूजा और चाटुकारिता की गयी..... लेकिन इसमें परिपेक्ष बदल गया यह पूजा गान अपने धवल के लिए राष्ट्र के लिए है... और हमें अपने धवल और राष्ट्र का माँ तो करना ही पड़ेगा ना इस गान को सम्मान दे कर .. आपकी रचना सुन्दर है ..विचारों को जगाती है..

mridula pradhan said...

जिसमें है अब तक उस सिंध का बखान,
जो कब का चला गया पाकिस्तान,
उस गीत का कैसे करूँ मैं सम्मान?
ekdam sahui baat hai.

Jayant Chaudhary said...

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद...

शर्म तो आती है बहुत, पर संविधान में है तो सम्मान तो करना ही होगा... फिर भले गिलानी या भिलानी या कोई और कमीनी इसका अपमान करे...

यशवन्त माथुर said...

विचारणीय कविता

सादर
-----
गणतंत्र को नमन करें

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

swabhavik aakrosh ubhra hai aapki kavita me...
yah har hindustani ka aakrosh hai .

Jayant Chaudhary said...

संजय जी, आप सदैव प्रोत्साहन देते हैं...
वन्दना जी, आप भी हमेशा साथ देती हैं..
प्रिया जी, आप सदैव प्रिय वचन ही कहती हैं...
राजेंद्र जी, आपसे पहली भेंट है.... आपने भी बहुत सही कहा..धन्यवाद...
डा नूतन जी, बहुत बहुत धन्यवाद.. आपसे से भी पहली भेंट है....
मृदुला जी, क्या कहें सिंध तो गया, हम बस टूटी बजा रहें हैं..
सुरेन्द्र जी, आगे भी मिलते रहें....
यशवंत जी, धन्यवाद....

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