Wednesday, November 2, 2011

सफलता क्या है?

जीवन की राह में, उठते गिरते, गिरते उठते, कदम बढाते जब मैं जा रहा था... तब, एक दिन कुछ ऐसा कोहराम मचा कि कभी ना रुकने वाले मेरे कदम, एकाएक थम गए। जैसे गाडी की तेज लाइट के प्रकाश से खरगोश ठिठक के जम जाता है... ठीक उसी तरह मुझे किसी ने जलते हुए प्रकाश में थमा दिया।

जलता हुआ... क्योंकि उसका उद्देश्य जलाना था, ना कि सच में प्रकाश दिखाना। जैसे जलते हुए लक्कड़ से रौशनी तो निकलती है, किन्तु जलन भी होती है, वैसे ही उस घटना में मैं जला तो, और अचंभित होकर थम गया।

मेरा विगत १०-१२ वर्षों का इतिहास, मेरी पथराई आखों के आगे नाच गया...
क्या खोया,
क्या पाया....
किसका हिसाब रखूं,
क्या समय व्यर्थ गवाया?

कितना कुछ छोड़ के, कितने सपने तोड़ के, मैंने जो कदम बढाया था, उस राह पर एक ऐसा मोड़ आया कि समय थम गया और मैं अतीत में विचरण करने लगा।

सफलता क्या है?
एक प्रश्नचिन्ह मेरे आगे मुहं बाएं करके खडा हो गया....

विद्यालय से लेकर aaj tak , अपने माताजी और पिता जी को हमेशा गौरवान्वित करने वाला मैं, विफल बताया गया... तो लगा कि एक पहाड़ गिर पड़ा। मैं अपने आप को सदैव सफल (अधिकाँश तौर पर) समझने वाला, जब आसमान से गिरा तो धरती पर पछाड़े खाने लगा।
थोड़ी देर कलपने के बाद सोचा कि सफलता किस तरह नापी जाती है?
क्या हर कोई सफलता को एक ही तराजू में तोलता है?
क्या सब् सिर्फ पैसे, मान, प्रतिष्ठा और सम्म्रद्धि पाने से ही सफल होते हैं?
इसमे से बीच के दो तो मेरे पास हैं, बहुत नहीं, परन्तु सामान्य से कहीं ज्यादा... आगे और पीछे वाले सामान्य से थोड़ा जयादा... किन्तु मैं फिर भी असफल हूँ॥
क्यों

आप कैसे नापते हैं सफलता?




Tuesday, September 6, 2011

अन्ना का तूफ़ान...

अन्ना अन्ना अन्ना.....
अन्ना का जब तूफ़ान उठे,
कोहराम मचे, बेलाम चले,
धरती डोले, आकाश हिले,
परिवर्तन का सैलाब उठे...
अन्ना अन्ना अन्ना....

Wednesday, March 16, 2011

हास्य कवि सम्मलेन - डलास २०११




Rip Roaring Laughter, Non-stop Humor, Heart Warming Recitals... If these are suite your taste buds, then come join us....

This great show will be served with fantastic food... We will fill your belly first, then your heart-for-humor will be filled.

Entrance Open: 6 pm
Complimentary Dinner Served: From 6:00 pm till 7:45 pm
Kavi Sammelan: 8:00 pm till 11:20 pm (No Intermission)
(Seating begins at 7:30 pm)
Admission Per Person: $25, VIP, VVIP
(Reserved seats for VIP & VVIP tickets)


आइये, पधारिये...

अन्तराष्ट्रीय हिंदी समिति प्रस्तुत करते हैं....

हास्य कवि सम्मलेन २०११

हंसते हंसते, पेट में बल पड़ जायेंगे
सीट पे आप उछल उछल जायेंगे,
कुछ कवितायों के आप तब मजे लेंगे,
कुछ को आप वर्षों तक दुहराएंगे....

यूँ तो कई सम्मेलनों में आप गए होंगे,
पर इसे आप सबसे अलग ही पायेंगे,
और हमारे साथ साथ आप भी दुहराएंगे,
भई इसमें तो हम बार बार आयेंगे....

आइये, पधारिये.....





Wednesday, February 23, 2011





राही को ढूंढती मंजिल नहीं, उसे स्वयं ही चलना होता है,
हो जितना भी सच्चा राही, रस्ता, उतना ही मुश्किल होता है...

~जयन्त
१ मार्च २०११
१० फाल्गुन १९३२

Tuesday, February 22, 2011

*** राह के अँधेरे...***




चलते चलते अचानक,
जब सूर्यास्त हो जाए,
और राह के अँधेरे जब,
बढ़ कर तुझे लीलने लगें...

कभी ना थकने वाले,
कभी ना रुकने वाले,
कदम जब खुद बखुद,
पीछे हटनें लगें...

घनघोर बरसती,
बारिश में जब,
सर के साये भी,
गलनें लगें...

चंहु और विपदा से,
जब घिरा हो तू,
निराशा के जहरीले नाग,
तुझे डसने लगें...

तब याद इसे,
रखना राही,
होंगे ऐसे,
इंसान बिरले....

जो जग में,
जीवित रहकर भी,
इन तकलीफों से,
ना हों गुजरे.....

है सफल वही,
इस दुनिया में,
जिसने कभी,
हौसले नहीं हारे.....


जयन्त
(फरवरी १५, २०११)
(माघ १६, `१९३२)

Thursday, February 10, 2011

** तू अकेला नहीं.... **



एक तू ही अकेला नहीं,
आग के दरिया से गुजरे हैं कई,

पाँव के छालों से ना घबरा,
जल कर भी उस पार पहुचें हैं कई,

जीवन कभी रुकता ही नहीं,
साँसों के संग चलना होगा तुझे भी,

उसे ही मिलेगी जयमाला,
जो स्वीकारेगा यह चुनौती....

~Jayant
10 Feb 2011

Monday, January 31, 2011

जीवित हूँ मैं, मुर्दा नहीं....

तूफ़ान उठे,
बिजली गिरी,
झुकी नहीं,
नज़र मेरी....

बढ़ता चला,
मैं राहें बना,
गढ़ता गया,
सपना नया....

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी...

बेदम नहीं,
बेबस नहीं,
जीवित हूँ मैं,
मुर्दा नहीं....

~जयंत चौधरी
माँ दुर्गा को समर्पित॥
१२ भद्र / ०२ सितम्बर 2010
(बैठे बैठे एक ख्याल आ गया ऑफिस में...)



Tuesday, January 25, 2011

क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??


कैसी स्वतन्त्रता, और कहाँ का गणराज्य,
अपने ही देश में तिरंगा ना फहरा सके हम श्रीमान,
जब तिरंगे का हो लाल चौक में अपमान,
क्यों करूँ मैं जन गन मन का सम्मा??

देश पे मरने वालों नहीं मिली दो गज जमीन,
और आदर्श की नीवं में हैं सारे आदर्श दफ़न,
शहीदों की चितायों पर खड़े हुए घोटाले के मकान,
कैसे करूँ मैं जन गन मन का सम्मान??

जिस गीत को लिखकर किया गया,
भारत को गुलाम रखने वाले का गुणगान,
जिसमें नहीं है भारत माँ का स्थान,
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

जिसमें है अब तक उस सिंध का बखान,
जो कब का चला गया पाकिस्तान,
उस गीत का कैसे करूँ मैं सम्मान?
उस जन गन मन का मैं कैसे करूँ सम्मान??

Blogvani

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