Saturday, September 4, 2010

मातृभाषा-३

(प्रदीप के उत्साह वर्धन और सुझाव को ध्यान में रखकर यह भाग प्रस्तुत है॥)

मानवता का एक अभिन्न अंग है संस्कार और संस्कृति। बिना इसके, वो मात्र एक प्राणी ही रह जाता है जो थालीके बैंगन की तरह, मान और स्थान की तलाश में, इधर से उधर लुढ़कता रहता है।

एक व्यक्ति की पहचान उसके नाम से ज्यादा उसके संस्कारों से होती है। उसके जैसे नाम के और भी लोग हो सकतेहैं, उस जैसे चहरे वाले और भी लोग हो सकते हैं, जैसे कि जुड़वा लोग, किन्तु ठीक उसके जैसे आचार-व्यवहारवाला कोई और मिलना बहुत कठिन होता है। कई बार हम और आप भी अपने परिचितों में एक नाम वाले कईलोगों को पातें हैं। उनके बीच में फरक याद करते समय चेहरे तो याद आते ही हैं, किन्तु अनजाने में, हमारे मन केपिछले हिस्से में उनका व्यक्तित्व भी याद जाता है। हम स्वयं हर परिचित को उसके आचार और व्यवहार से हीजानते हैं, उसका नाम तो केवल एक रस्सी की तरह बन जाता है जो उसके व्यक्तित्व रुपी मटके को हमारे यादों केकुँए से बाहर निकालकर हमारे सामने रख देता है। उस मटके में साफ़ मीठा जल हो या कीचड़; यह तो उसे व्यक्तिके संस्कारों पर ही निर्भर होता है... क्योंकि उसके आचार और व्यवहारों के दो पहिये, संस्कारों की बनायी पटरी परही चलते हैं। जैसे रेलगाड़ी कि दिशा पटरी के द्वारा ही निर्धारित होती है, ठीक उसी प्रकार मानव की आचरण कि दिशा और दशा, दोनों ही, उसके संस्कारों पर निर्भर होते हैं।

इन संस्कारों को बनाने के लिए सबसे आवश्यक है, भाषा। भाषा के बिना किसी भी तरह का ज्ञान बांटना और सीखना लगभग असंभव है, विशेषकर संस्कारों का।

और क्योंकि संस्कारों की शिक्षा सबसे पहले और सबसे अधिक, माता से ही मिलती है, इसलिए यह स्वयं सिद्ध है कि मातृभाषा संस्कारों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

संस्कार और संस्कृति सिखाने के लिए किसी और भाषा के उपयोग में कुछ समस्याएं हैं। उनमें से एक है तकनीकी समस्या। किसी भी भाषा का अनुवाद दूसरी भाषा में करना बड़ा कठिन होता है। कभी कभी तो समान अर्थ वाले शब्द ही नहीं मिलते तो पूरक शब्दों से काम चलाना होता है, पर तब अर्थ का अनर्थ हो जाता है... फिर कभी शब्द मिलते हैं तो भी भाव प्रकट नहीं हो पाते...
जैसे
हम कभी कभी कहते हैं "He is so cool..." जिसका हिंदी में अनुवाद होगा "वो कितना ठंडा है...." अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि अर्थ का अनर्थ किसे कहते है !!! हिंदी में किसी व्यक्ति को ठंडा कहना याने उसके व्यक्तित्व को अनाकर्षक और अप्रिय बताना है, जिससे कि दूसरे दूरी रखना चाहतेहैं, जबकि अंग्रेजी वाक्य का मतलब अत्यधिक आकर्षक और प्रिय व्यक्तित्व से था॥

उदाहरण के तौर पर, अब आप ही बताएं "चरण स्पर्श", "भगवान् या माता पिता के पैरों की धूल", "मर्यादा पुरषोत्तम", "वन्दे मातरम्" आदि वाक्यों का भावार्थ, किसी और भाषा में कैसे समझाया जा सकता है??
फिर
हम संस्कार, और संस्कृति केवल उपदेशों के माध्यम से ही नहीं देते हैं, किन्तु नानी-दादी-माँ के किस्से कहानियां, कवितायें, गीत आदि भी सिरिंज के जैसे, धीरे धीरे व्यक्तित्व की नसों में संस्कार घोलते रहते हैं। बिना भाव को समझे कोई भी, केवल शब्दार्थ से सीख नहीं पा सकता, और जो कुछ भी वो सीखता है, वो अधूरा ही होता है।

ऐसे में किसी और भाषा का उपयोग, संस्कारों और संस्कृति को कैसे सही दिशा दे सकता है? हाँ, कभी ऐसा भी हो सकता है कि "जाना था जापान, पहुँच गए चीन..." वाली हालत हो जाए। जब माँ ही बच्चे की प्रथम शिक्षक हो, और घर ही प्रथम पाठशाला, तो उसकी भाषा याने मातृभाषा तो सबसे महत्त्वपूर्ण होगी ही॥

6 comments:

AlbelaKhatri.com said...

आप अत्यन्त उत्तम कार्य कर रहे हैं
आपने संस्कारों के प्रति जागरूक करके ही भविष्य के भारत को समृद्ध बनाया जा सकता है

आपको धन्यवाद !

अनुनाद सिंह said...

अत्यन्त सार्थक और तर्कपूर्ण विचार।

विवेक सिंह said...

शाबाश !

Pradeep said...

Bahut badhiya Jayant. Jab hindi matrubhasha ho to milane par log "Namaskar" bolate hai. Aur bolate hee swabhavik roop se unake haath jud jaate hai. Angreji mein milane par "Hello" ka chalan hai aur yeh bolatey hi haat milaney ko badh jaate hai. Yeh dono alag alag sanskar hai jo ek hee paristhiti ko alag alag tarike se jahir karatee hai. In dono hee tareekon mein vahak sthaniy bhasha ya matrubhaha hee hai. Bhasha ke nasht hone se sanskar aur sanskaron ke nasht hone se sanskruti ka nasht hona nishchit hai. To ek sanskruti ko nasht karana ho to usakee bhasha ko nasht kar do.. jo ki angrejon ne apane saath kiya. Matrubhasha ek dhagey ke samaan sanskaron kee motiyon ko piro kar sanskruti kee maala ko banaaye rakhatee hai, aisa mera sochana hai. Mere in vicharon mein Sanjay Sudan kee awaaz jyada hai.

Jayant Chaudhary said...

Beshak Pradeep...

Yahi baat sach hai.
Tumane bhi bahut khoobsoorati se likhaa hai.
Isi kaaran ham dono bachchon ko Hindi sikhaate aur Hindi men hi baaten karaate hain, USA me rah kar bhi.
Kabhi kabhi main teraa bhi udaaharan detaa hun, jaise tune Malayaalam ko bhi seekhaa Madhya Pradesh men rah kar, usi tarah M&M Hindi seekhate hain pardesh men rah kar.
Aakhir tu bhi ek utprasth udaaharan hai!!!

Jayant Chaudhary said...

Albelaa Ji,
Vivek Ji,
Anunad ji,

Koti dhanyawaad aur pranaam.

Jayant

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