Monday, January 31, 2011

जीवित हूँ मैं, मुर्दा नहीं....

तूफ़ान उठे,
बिजली गिरी,
झुकी नहीं,
नज़र मेरी....

बढ़ता चला,
मैं राहें बना,
गढ़ता गया,
सपना नया....

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी...

बेदम नहीं,
बेबस नहीं,
जीवित हूँ मैं,
मुर्दा नहीं....

~जयंत चौधरी
माँ दुर्गा को समर्पित॥
१२ भद्र / ०२ सितम्बर 2010
(बैठे बैठे एक ख्याल आ गया ऑफिस में...)



5 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

: केवल राम : said...

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी..

उत्साह और प्रेरणा से भरपूर रचना ...बहुत सुंदर..... बधाई

शिखा कौशिक said...

aashaon ko poshit kartee rachana.badhai .

निर्झर'नीर said...

आशा से भरी अच्छी रचना

रंजना said...

आपके ह्रदय के ये भाव असंख्य हृदयों तक विस्तृत हो सबका जीवन पथ आलोकित करे..सबमे उर्जा भरे....

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