Saturday, August 28, 2010

मातृभाषा -२

लेकिन क्या मातृभाषा का महत्त्व केवल माँ के कारण ही है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसे समाज में रहने के लिए भाषा की आवश्यकता होती ही है।
बिना भाषा के समाज का निर्माण हो ही नहीं सकता। पशु पक्षी भी भाषा की सहायता से ही समूह में रहते हैं।
उसके बिना समाज या समूह का निर्माण, पालन और पोषण संभव ही नहीं है। हमारी एकता में भी यही सहायक है।

आम तौर पर हमारी मातृभाषा हमारे आसपास के लोगों की भी भाषा होती है। किन्तु कभी कभी स्थान परिवर्तन के कारण मातृभाषा और स्थानीय भाषा अलग अलग हो सकती हैं। उस अवस्था में तो मातृभाषा का ज्ञान और उपयोग और भी महत्व पूर्ण हो जाता है। क्योंकि यही एक चीज हमें अपने परिवार, पूर्वजों, संस्कार और सभ्यता से जोड़े रखती है. उस समय मातृभाषा कम उपयोग के कारण पलती डोर जैसी भले हो जाए, किन्तु हमें पराये आसमान में उड़ते पतंग से लगी डोर की तरह अपनी धरती से बांधे रखती है।

इसके अलावा मानव की भावनाएं जगाने का सबसे अचूक उपाय उसकी मातृभाषा ही है। इस संसार में हजारो भाषाएँ हैं, और अनेको बार हमें दूसरी भाषायों का उपयोग भी करना पड़ता है, दूसरों से बात करने के लिए। किन्तु जब हम अपनी भाषा, मातृभाषा सुनते हैं तो हमारा ना केवल मस्तिषक, किन्तु ह्रदय भी उसे सुनता है। हमें उस व्यक्ति के प्रति अधिक प्रेम और विशेष झुकाव हो जाता है जो हमारी मातृभाषा में बात करता है. शायद यही कारण है की बहु-राष्ट्रीय कंपनियां भी, अपने सामान का विज्ञापन उस स्थान की 'मातृभाषा' में ही कराती हैं.

एक और ध्यान देने लायक बात है की हर व्यक्ति विशेष परिस्थितियों में, जैसे अत्यधिक प्रेम, क्रोध, डर आदि में अपनी मातृभाषा में ही बात करता है... क्योंकि वो उसके मन की आवाज होती है। याने किसी के मन तक सीधे बात करनी हो तो उसकी मातृभाषा में ही करना चाहिए। यह नुस्खा बड़े बड़े व्यापारियों को भी आता है।

मातृभाषा ज्ञान अर्जित करने के लिए भी उपयोगी हो सकती है। आज के विज्ञान और तकनीक के जमाने में भी कई देश, जैसे फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन और रूस अपनी मातृभाषा में ही विज्ञान और तकनीक पढ़ते, सीखते और विकसित करते हैं॥ और ये देश किसी भी द्रष्टि से संसार में पीछे नहीं हैं।

आखिर में यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि अपनी जड़ों, याने अपने परिवार और संस्कार पर हर इंसान को गर्व होना चाहिए, बिना उसके इंसान अधूरा रह, कटी पतंग जैसा भटकता है। उस जड़ तक पहुँचने कि डोर केवल मातृभाषा है.....

जीवन में जितनी महवपूर्ण माँ हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण है उसकी भाषा, याने कि मातृभाषा...

5 comments:

AlbelaKhatri.com said...

निशब्द रह कर भी बधाई दी जा सकती है इसलिए मैं आपकी लेखनी के सम्मान में निशब्द हूँ

M.Singh said...

achchha likha hai. matra bhasa ka chamatkaar tab pataa chaltaa hai jab door daraaj jane par koee matra bhaasa bolne vala mil jara hai.

M.Singh said...

aapkee kavitayen bhee prabhaavkaaree hain.

Jayant Chaudhary said...

Aap dono ko koti pranaam.

Pradeep said...

Jabarjast Jayant.. Bahut badhiya. Thoda sanskruti aur sansakar par matrbhashaa ka prabhaav ke bhav kuch kam hai. Matrbhashaa 3 ka intejaar rahegaa.

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