Saturday, August 28, 2010

मातृभाषा - 1

माननीय पाठकों,
आप सब को मेरा नत-मस्तक प्रणाम,

आज का विषय बहुत सामयिक है।
भाषा किसी भी प्राणी की मूलभूत आवश्यकता होती है।
इसी से हम और आप अपने भावों और विचारों को व्यक्त कर सकते हैं।
सबसे अहम् बात तो यह है कि, मानवों की प्रगति भाषा विकास के कारण ही संभव हो सकी है।
आज विज्ञान जिस ऊँचाई पर उड़ रहा है, वहाँ भाषा के पंखों बिना पहुँचना असंभव है।
यह तो सब जानतें हैं कि ज्ञान को भाषा के बिना आगे बढ़ाया ही नहीं जा सकता।
याने, मानव को उन्नति की मंजिल पर पहुँचने के लिए भाषा के मार्ग पर चलना होता है

भाषा के महत्त्व को स्थापित करने के बाद आइये इस विषय पर विचार करे कि मातृभाषा क्या है।
सर्वप्रथम मैं कहना चाहता हूँ कि, मातृभाषा, मात्र भाषा ही नहीं है, किन्तु उससे भी बढ़ कर है।
मातृभाषा शब्द दो विभिन्न शब्दों से मिल कर बना है... मातर और भाषा....
याने कि मातर या दूसरे शब्दों में माँ या माता की भाषा...

हमारे जीवन में माँ का कितना बड़ा स्थान है, यह व्यक्त करने कि आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि, उसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, सारे समुद्रों के जल को यदि स्याही भी बना दें, तो भी माँ की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। इसलिए, माँ से जुड़ी हर चीज़, एक विशेष स्थान पर होती है। मातृभाषा उसमें से सर्वप्रथम है।

हमारे जन्म लेने के बाद, माँ हमसे जिस भाषा में बात करती हैं, वोही तो माँ की भाषा होती है, वही मातृभाषा होती है, और वो भाषा शिशु की प्रथम भाषा होती है।

पहली बार जिन शब्दों को शिशु सुनता है, जिस भाषा में माँ उससे अपना प्यार और स्नेह व्यक्त करती है, जिस भाषा में लोरी सुना कर सुलाती है, जिस भाषा में बलैयां लेती है, और जिस में ह्रदय से आशीर्वाद देकर हमारी उन्नति की प्रार्थना करती है..... उस भाषा का स्थान कोई और भाषा कैसे ले सकती है??

6 comments:

AlbelaKhatri.com said...

आपकी मातृभक्ति और मातृभाषा के प्रति अनुराग को दर्शाती इस आलेखमाला का मैं मन से अभिनन्दन करता हूँ

Babli said...

आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

Gourav Agrawal said...

@जिस भाषा में माँ उससे अपना प्यार और स्नेह व्यक्त करती है, उस भाषा का स्थान कोई और भाषा कैसे ले सकती है ??

सही कहा मित्र जयंत, पर अक्सर परेशानी वहां खड़ी होती है जहां भाषा को ही "माँ" मान लिया जाता है और दूसरी भाषा मात्र कम्युनिकेशन के लिए सीखने से भी बचा जाता है
की कहीं "भाषा माँ" का अपमान न हो जाये :))
हिंदी हमेशा मेरी प्राथमिक भाषा है , बाकी तो बस कम्युनिकेशन का स्कोप बढ़ाने के लिए है

अच्छा लेख है ....

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !

Jayant Chaudhary said...

Khatri Ji,
Babali Ji,

Saadar pranaam. Bahut dhanywaad.

Jayant

Jayant Chaudhary said...

गौरव जी,

यह भी सच है.... कि भाषा कई बार झगड़े का कारण भी बन जाती है.... किन्तु अधिकाँश तौर ऐसा राजनीती के कारण या दूसरी भाषा वालों के द्वारा मातृभाषा के अपमान के कारण भी होता है.
जितना सम्मान हम अपनी माँ का करते हैं उअना ही मौसी का भी करें तो झगड़ा थोड़ा कम हो सकता है.. :-)

जयंत

Gourav Agrawal said...

हां मित्र ....
ये भी ठीक है

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