Sunday, July 4, 2010

* सीने में जब आग जलेगी *

सीने में जब आग जलेगी,
फौलाद तभी पिघलेगा...

भट्ठी में जब लपट उठेगी,
नस नस में फिर वो बहेगा...

मन में वो द्रढ़ता लाएगा,
बाहों की शक्ति बनेगा...

पर्वत भी आकर टकराएँ,
उनका विध्वंस करेगा...

अग्नि पथ पर बढ़ने वाले,
कदमों को ना रुकने देगा...

कठिनाई की तूफानी बारिश में,
यदि
उस आग को ना बुझने देगा ...

(तो,)
जल
कर, तपकर, चलकर, लड़कर,
एक दिन, लक्ष्य
को तू पा लेगा...


* माँ दुर्गा को समर्पित *
~ जयंत

4 comments:

वन्दना said...

बहुत ही गहरे भाव भरे हैं ………………कल के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।

abhinav pandey said...

मेहनत कि भट्टी में तप कर लोग अपनी मंजिले पा लेते हैं ... बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया आपने इसे...
सुनहरी यादें

Divya said...

सीने में जब आग जलेगी,
फौलाद तब ही पिघलेगा...

Ek-ek line 'oz' se bhari hui hai. I felt recharged after reading this creation.

this should be the spirit !

badhai !

Jayant Chaudhary said...

वन्दना जी,
अभिनव जी,
प्रिया जी,

आपके आगमन और प्रोत्साहन का बहुत बहुत धन्यवाद...
माँ श्वेता की कृपा है... अन्यथा मैं कुछ भी नहीं हूँ.

आपका आभारी,
जयंत

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