Thursday, May 27, 2010

...इश्क ऐसा ही सही...


हम जिन पर मर मिटे,
उन्होंने कभी जाना भी नहीं,
इश्क करना खता है, तो,
इसकी ये सजा ही सही...

मेहँदी की जगह पिस गए,
कितने ही अरमान मेरे,
बस यह सोच के खुश हूँ,
कि, निखर गए हाथ तेरे...

ख़ुशी दो पल की माँगी थी,
जन्नत की फरमाइश न थी,
बहुत थी, दो गज जमीन ही,
सारे जहां की चाह ना थी....

कहाँ का आसमान,
और कैसी ऊँचाई,
ना खुदा मिला,
ना उसकी खुदाई...

मुरझाते हैं गुल,
बहार में कैसे,
बड़ी मुद्दतों के बाद,
अब हम समझे,
दौर--बदनसीबी से,
जब सिफर खुद गुजरे ...

~सिफर (कभी कहीं ये रूप भी..)

5 comments:

Shekhar Kumawat said...

कहाँ का आसमान,
और कैसी ऊँचाई,
ना खुदा मिला,
ना उसकी खुदाई..

SAHI HE

मनोज कुमार said...

बेहतरीन!

Priya said...

मेहँदी की तरह पिस गए,
कितने ही अरमान मेरे,
बस यह सोच के खुश हूँ,
कि, निखर गए हाथ तेरे...

wow what a positivity

वन्दना said...

bahut dino baad ek sundar rachna padhne ko mili.

हरकीरत ' हीर' said...

भाव अच्छे हैं ....कुछ सुधार की जरुरत थी .....
लिखने के बाद नज़्म को दुसरे दिन फिर पढ़ें और सुधार karein .....
मेहँदी की तरह की जगह ....

मेहँदी तले पिस गए
सारे अरमान मेरे

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