Monday, May 17, 2010

~ सतरंगी हुए सपने मेरे ~















सतरंगी
हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे,

जीवन
से मिटे हैं अँधेरे,
रातों को मिले ज्यों सबेरे,
और मधुमय हुए हैं बसेरे,
डाले खुशियों ने मन में डेरे...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

करवट बदली इस जिंदगी ने,
और आखें खोली पलकों ने,
ख़ुशी मन में लगी है घुलने,
मरू में नेह लगी बरसने...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

फैलाए पंख अरमानों ने,
आशाएं उठ लगी उड़ने,
बांधा था जिन्हें निराशा ने,
वो पग पल पल लगे उठने....

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

जयंत चौधरी
मई १८, २०१०

2 comments:

Mithilesh dubey said...

बहुत ही उम्दा ।

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

Blogvani

www.blogvani.com

FeedBurner FeedCount