Thursday, May 13, 2010

*** बूँद रक्त की, बाँकी है एक ***

मन में क्यों, रखता है भय,
होगी बस, तेरी ही विजय,
मन का, छोटा सा संशय,
बन बैठेगा, तेरी पराजय..

तू आज, हार को हरा दे,
पराजय को, पराजित कर दे,
बस आज, विधान को बदल दे,
तू ख़ुद ही, लकीरें खींच दे...

जो हाथ हैं, तो उनको उठा,
औ कदम हैं, तो उनको बढ़ा,
तुझे, बैठने से क्या मिला,
तू उठकर, ख़ुद भाग्य बना....

बूंद रक्त की, बाँकी है एक,
श्वांस अभी, बाँकी है एक,
नहीं देना, तू घुटने टेक,
जीवन तेरा, अब भी है शेष...

~
जयंत चौधरी

14 comments:

दिलीप said...

badhiya rachna

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

संजय भास्कर said...

सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

संजय भास्कर said...

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

संजय भास्कर said...

मन में क्यों रखता है भय,
होगी बस तेरी ही विजय,


इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

आशीष/ ASHISH said...

Oajpoorn! pravahmayee!

Jayant Chaudhary said...

दिलीप जी:
अति धन्यवाद..

समीर जी:
अति धन्यवाद... आप जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति से प्रशंसा मिलना सुखद है.

संजय जी:
आपसे प्रथम परिचय हुआ है.. और आपने तो मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा दिया.. :-)
कोटि प्रणाम..

आशीष जी:
धन्यवाद.. बस माँ सरस्वती की कृपा है..

वन्दना said...

बहुत बढ़िया.

kunwarji's said...

शानदार रचना!



कुंवर जी,

अनिल कान्त : said...

लम्बे समय के बाद आपके ब्लॉग पर आकर मुझे विशिष्ट रचना पढने को मिली. जो जीने के लिये कहती है, आगे बढ़ने के लिये कहती है

aarya said...

बहुत ही सुन्दर व प्रेरणादायी रचना! यही सच भी है कि..
कोई चलता पदचिन्हों पर, कोई पदचिन्ह बनाता है,
है वही शूरमा इस जग में, दुनिया में पूजा जाता है |
रत्नेश त्रिपाठी

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aahaa jayantji,
bahut bahut bahut dino baad aapke blog par aayaa hu..../ aap bhi mujhe dikhe idhar mere blog par.../// achchaa lagaa..., rachna ojasvi he. jeevan path ko darshati..., vichaar deti hui si..bahut achhi likhi he../


---
knhaa the? itane dino baad??..kyaa yaad nahi aati?????

Jayant Chaudhary said...

अनिल भाई,
अति धन्यवाद्.. आपसे दो बातें किये अरसा बीत गया.. कभी कभी आपकी रचना पढ़ लेता हूँ, जब समय निकाल पाता हूँ. क्षमा करे ज्यादा नहीं पढ़ पाता.

अमिताभ जी,
याद तो याद ही है.. दबे पाँव चली आती है... जब चाहे तब.. बस हम कुछ लिखे नहीं पाते आपको यह बताने के लिए, की याद आई थी.
बहुत अच्छा लगा आपसे दो शब्द सुन कर.

रत्नेश जी,
सच कहा, कोई पदचिंह बनाता है, कोई उन पर चलता है... धन्यवाद.

कुंवर जी,
आपकी प्रशंशा का धन्यवाद..

वन्दना जी,
आभारी हूँ आपका.

~जयंत

निर्झर'नीर said...

बूंद रक्त की, बाँकी है एक,
श्वांस अभी, बाँकी है एक,
नहीं देना, तू घुटने टेक,
जीवन तेरा, अब भी है शेष...

बहुत खूब जयंत चौधरी जी
कविता यक़ीनन तारीफ़ के काबिल है
दाद हाज़िर क़ुबूल करें

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