Tuesday, January 5, 2010

मैं अमर हूँ!!

लिखने कुछ और बैठा था... लिख कुछ और रहा हूँ
समय का ही फेर है... जो मन में था उसे लिखने में देर हो गयी और अवसर चूक गया
समय समय की ही बात है

यह समय होता ही है ऐसा... निर्दयी,
कभी किसी के लिए ठहरता ही नहीं,
जब कभी चाहो तो गुजरता ही नहीं

यह समय होता ही है ऐसा... निष्ठुर,
कभी नेत्रों से गिरता है नीर निर्झर,
कहीं मन में चुभता है टीस बनकर

यह समय होता ही है ऐसा... बलवान,
रेत बनकर बिखर जाते हैं, जो रहे चट्टान,
यही तो यम बनकर दिखाता है शमशान

यह समय होता ही है ऐसा... दयावान,
आपबीती को बिसारने का देता है ज्ञान,
यही तो पतन के बाद लाता है उत्थान

यह समय करता है ऐसा... अक्सर,
खुद को वापस पाने का देता है अवसर,
इसे पहचानो तो चढ़ाता है सर आखों पर

यह समय होता ही है... अमर,
जो था, ना होगा कल, याद रख मगर,
सच यह दुःख के लिए भी है, अब काट अपना सफ़र!!!!


~जयंत चौधरी
जन, ५, २०१०

(आपका भी समय ले लिया मैंने आज... किन्तु आज समय पर लिखने का ही मन हो गया... आशा करता हूँ क्षमा करेंगे यदि आपका समय व्यर्थ किया है मैंने तो..)

6 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

AlbelaKhatri.com said...

aapki baat maine maan li hai

jald hi us par amal karoonga


jayantji !

bahut achhi rachna ....

achhaa laga..padh kar

निर्झर'नीर said...

सुन्दर सार्थक और सरल
दाद हाज़िर है क़ुबूल करें

"

कभी नेत्रों से गिरता है नीर निर्झर "


आपकी कविता में मेरा नाम आया मन भावविभोर हो गया

अमिताभ श्रीवास्तव said...

priya jayantji,
pyaar sahit

SAMAY bada aadamkhor hota he.., aour sach yah bhi he ki yadi aapne yaa aapke liye hamne samay nikalaa to jeevan kaa bahumoolya upahaar aapko de diya.., hnaa hnaa ise aap kah lijiye ki aadamkhor de diya.., kher..aadmi likhana kuchh chahtaa he aour likhaa kuchh jataa he, iske antar me gahari baat chhupi hoti he...vo kyaa baad me fir kabhi kahunga..kintu abhi to yahi ki..achhi rachnaa ke saath prastut hue he aap...vese hamesha ese hi aate ho..bahut achha lagtaa he aapko padhhnaa..

-me to vahi ka vahi hu, na badalne vaala praani..yaani aapse dili pyaar he rahega..umrabhar,,aap chahe jnhaa rahe, vyast rahe..

Jayant Chaudhary said...

निर्झर जी,

सच कहूँ, जब यह कविता की पंक्तियाँ लिख रहा था, तो आपका नाम ध्यान आ गया था.
और मैं सोच भी रहा था आपको कैसा लगेगा...
अच्छा लगा आपको, तो अच्छा लगा मुझे!! :))

धन्यवाद,
जयंत

Tripti said...

Hi jayant, was wondering where have you gone.

Good to see you active again.

Very nice lines indeed.

Rgds
Tripti

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