Monday, January 4, 2010

वर्ष नया, विचार पुराने?

गत का अंत और नव का आगमन

नव वर्ष के स्वागत में कितने ही परिचितों ने पत्र (ईमेल) लिखे, और ना जाने कितनों ने किस किस तरीके से मनाया गत का अंत और नव का आगमन... किन्तु ऐसे कितने हैं जिन्होंने सचमुच नवीनता और परिवर्तन लाने का प्रयास किया है?

परिवर्तन तो संसार का नियम है, किन्तु मानव मन इसके विरोधी के रूप में सामने आता है। यह मन पुराने विचारों से घिरा रहता है॥ मैं तथाकथित आधुनिक विचारों के बारे में नहीं बात कर रहा हूँ, अपितु एक दूसरा द्रष्टिकोण बता रहा हूँ। तो क्या है पुराना, जिसे छोड़ना होगा?

प्रथम, हमारी पुरानी बातें, विशेषकर कटु, दुखकारी, नकारात्मक यादें और घटनाएँ।
कभी, किसी ने हमें अतीत में कुछ कहा था या किया था, जो मन तो ठेस पहुंचा गया... तो बस, बाँध ली एक गाँठ। जो, कभी छूटती ही नहीं।
कभी, कहीं, किसी प्रयास में सफलता नहीं मिली, तो यत्न करना ही छोड़ दिया। कभी विश्लेषण नहीं किया की सफलता क्यों नहीं मिलिल, कभी और ज्यादा कड़ी तपस्या नहीं की... बस हार मान कर, पुरानी असफलता को बाँध रखा॥
जो सपने देखे थे कभी, वो पूरे नहीं हुए तो... बस स्वपन देखने ही छोड़ दिए? 'क्या फ़ायदा सपने देखने से', ऐसे विचार पाल लिए॥

द्वितीय, हमारी 'चलता है' वाली प्रवृत्ती को त्यागना होगा।
कब तक, आखिर कब तक, यह 'चलता है' वाली आदत हमें बाँध कर रखेगी?
हम मनुष्य हैं, पशु नहीं, जो अपने गले में बंधी अकर्मण्यता की रस्सी को ही नियति मान कर जड़ता के खूंटे से बंधे हुए सब् चलने दें... जैसे चल रहा है।
यह समय है खुद को चुनौती देने का॥
एक नयी दिशा में पग धरने का॥
एक नए आसमान की ओर उड़ान भरने का॥

है आप में इस नवीनता का स्वागत करने का दम??

यदि हाँ, तो "नव वर्ष आपके लिए नवीनता लाये और मंगलमय हो"।

~जयंत

4 comments:

रावेंद्रकुमार रवि said...

ओंठों पर मुस्कान खिलाती शुभकामनाएँ
नए वर्ष की नई सुबह में महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ" FONT लिखने के 24 ढंग
"संपादक : सरस पायस"

Udan Tashtari said...

उचित चिन्तन!!

’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

-सादर,
समीर लाल ’समीर’

गौतम राजरिशी said...

अपना ही लिखा एक शेर याद आया:-

"‘यूं ही चलता है’ ये कह कर कब तलक सहते रहें
कुछ नये रस्ते, नयी कुछ कोशिशों की बात हो"

निर्झर'नीर said...

उत्कृष्ट विचार

गौतम राजरिशी ने बहुत सही बात कही है

"‘यूं ही चलता है’ ये कह कर कब तलक सहते रहें
कुछ नये रस्ते, नयी कुछ कोशिशों की बात हो"

Blogvani

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