Monday, December 13, 2010

उठो क्रान्ति के संग....... (~जयंत)



दिल जलता है मेरा,
करकरे की चिता के संग,
राजनीति खेलते उसपर लोग,
जिसने पहना केसरिया रंग...

शहीदों की चितायों पर,
बजा निज स्वार्थ का मृदंग,
सफ़ेद खादी वाले नाच रहे,
खुले आम नंग-धडंग....

सिद्धांत सारे नष्ट हुए,
नैतिकता हुई सरे आम भंग,
पार्थ आज गांडीव उठा,
फिर आज छिड़ी है जंग....

पंजाब, मध्य, गुजरात, मराठा,
द्राविड, उत्तर, पूरब, बंग,
नए क्षितिज को आज थाम लो,
उठो क्रान्ति के संग...

उठो क्रांति के संग,
करो माँ भारती का पूजन,
हवन कुण्ड में आज चढ़ा दो,
हर्षित होकर तन-मन-धन...

माता की तुम लाज बचा लो.
रिपुयों का करके अंग-भंग,
ललकार तुम्हें है आज पार्थ,
पहनो फिर से केसरिया रंग.....


~जयंत चौधरी



Thursday, September 9, 2010

हिन्दुस्तान का सर काट दो


जब मैं विदेश पढ़ने गया,
और कॉलेज में जा पहुंचा,
तब हिन्दुस्तानी संगठनों को,
जोश खरोश से ढूंढ़ने लगा,

बहुत खोदा बहुत देखा,
एक दिन एक का पता लगा,
वो १५ अगस्त मनाने वाले हैं,
ऐसा किसी से उड़ते उड़ते सुना,

सुन कर मैं भी बहुत प्रसन्न हुआ,
कई दिनों के बाद दिखेगा तिरंगा,
सोच कर मन हुआ बहुत चंगा,
जैसे मरुथल में मिल जाए गंगा,

तन का तो पता नहीं,
मन ही मन बहुत उड़ा,
उड़ते उड़ते एसोसिएसन के,
द्वार खटखटाने जा पहुंचा,

जितनी जोर से उड़ रहा था,
उससे भी ज्यादा शोर से गिरा,
जब एसोसिएसन के दरवाजे पर,
मेरे प्यारे भारत का सर कटा दिखा,

क्योंकि वहाँ ऐसा नक्शा लगा था,
जिसमें काश्मीर कहीं नहीं था,
जब मैं भारत से निकला था,
तब तो वो वहाँ ही था,

मैं कुछ दिन क्या दूर रहा,
पता नहीं बीच में क्या हुआ?
धरती निगल गयी, या,
आसमान ही खा गया?

उस ऑफिस से बाहर निकलते,
देसी को पकड़कर मैंने पूछा,
इसमें गलत है क्या?
वो बोला, इसमें गलत है क्या? तू बता!!

जब भारत का कटा सर,
मैं उसे दिखाया,
तो उसने बहुत देर तक अपना,
गंजा होता सर खुजाया,

फिर भी उसकी समझ ना आया,
क्यों मैं इतना है शोर मचाया,
बहुत मैं प्रयास किया,
तब जाकर उसे कुछ दिखा,

आखिर वो बोला,
आखिर आप कहाँ जी रहें हैं,
काश्मीर कब का कट गया,
आप अभी तक सपनों में जी रहे हैं??

भारत के अलावा,
कोई काश्मीर को भारत का नहीं मानता,
अरे अमेरिका की छोड़ो,
अब तो भारतीय भी काश्मीर को नहीं जानता,

एक दिन ऐसा आयेगा,
जब हिन्दुस्तानी नक़्शे में भी,
काश्मीर अलग दिखाया जाएगा,
तब तू कहाँ जाकर चिल्लाएगा...

....

और आज उसका कहा,
सच ही निकल गया,
देखते ही देखते
भारत का नक्शा बदल गया...

.................................................................

ये देखिये, भारत में बिक रही एक कॉपी के पिछले प्रष्ट पर छापा ये नक्शा!@!

Saturday, September 4, 2010

मातृभाषा-३

(प्रदीप के उत्साह वर्धन और सुझाव को ध्यान में रखकर यह भाग प्रस्तुत है॥)

मानवता का एक अभिन्न अंग है संस्कार और संस्कृति। बिना इसके, वो मात्र एक प्राणी ही रह जाता है जो थालीके बैंगन की तरह, मान और स्थान की तलाश में, इधर से उधर लुढ़कता रहता है।

एक व्यक्ति की पहचान उसके नाम से ज्यादा उसके संस्कारों से होती है। उसके जैसे नाम के और भी लोग हो सकतेहैं, उस जैसे चहरे वाले और भी लोग हो सकते हैं, जैसे कि जुड़वा लोग, किन्तु ठीक उसके जैसे आचार-व्यवहारवाला कोई और मिलना बहुत कठिन होता है। कई बार हम और आप भी अपने परिचितों में एक नाम वाले कईलोगों को पातें हैं। उनके बीच में फरक याद करते समय चेहरे तो याद आते ही हैं, किन्तु अनजाने में, हमारे मन केपिछले हिस्से में उनका व्यक्तित्व भी याद जाता है। हम स्वयं हर परिचित को उसके आचार और व्यवहार से हीजानते हैं, उसका नाम तो केवल एक रस्सी की तरह बन जाता है जो उसके व्यक्तित्व रुपी मटके को हमारे यादों केकुँए से बाहर निकालकर हमारे सामने रख देता है। उस मटके में साफ़ मीठा जल हो या कीचड़; यह तो उसे व्यक्तिके संस्कारों पर ही निर्भर होता है... क्योंकि उसके आचार और व्यवहारों के दो पहिये, संस्कारों की बनायी पटरी परही चलते हैं। जैसे रेलगाड़ी कि दिशा पटरी के द्वारा ही निर्धारित होती है, ठीक उसी प्रकार मानव की आचरण कि दिशा और दशा, दोनों ही, उसके संस्कारों पर निर्भर होते हैं।

इन संस्कारों को बनाने के लिए सबसे आवश्यक है, भाषा। भाषा के बिना किसी भी तरह का ज्ञान बांटना और सीखना लगभग असंभव है, विशेषकर संस्कारों का।

और क्योंकि संस्कारों की शिक्षा सबसे पहले और सबसे अधिक, माता से ही मिलती है, इसलिए यह स्वयं सिद्ध है कि मातृभाषा संस्कारों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

संस्कार और संस्कृति सिखाने के लिए किसी और भाषा के उपयोग में कुछ समस्याएं हैं। उनमें से एक है तकनीकी समस्या। किसी भी भाषा का अनुवाद दूसरी भाषा में करना बड़ा कठिन होता है। कभी कभी तो समान अर्थ वाले शब्द ही नहीं मिलते तो पूरक शब्दों से काम चलाना होता है, पर तब अर्थ का अनर्थ हो जाता है... फिर कभी शब्द मिलते हैं तो भी भाव प्रकट नहीं हो पाते...
जैसे
हम कभी कभी कहते हैं "He is so cool..." जिसका हिंदी में अनुवाद होगा "वो कितना ठंडा है...." अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि अर्थ का अनर्थ किसे कहते है !!! हिंदी में किसी व्यक्ति को ठंडा कहना याने उसके व्यक्तित्व को अनाकर्षक और अप्रिय बताना है, जिससे कि दूसरे दूरी रखना चाहतेहैं, जबकि अंग्रेजी वाक्य का मतलब अत्यधिक आकर्षक और प्रिय व्यक्तित्व से था॥

उदाहरण के तौर पर, अब आप ही बताएं "चरण स्पर्श", "भगवान् या माता पिता के पैरों की धूल", "मर्यादा पुरषोत्तम", "वन्दे मातरम्" आदि वाक्यों का भावार्थ, किसी और भाषा में कैसे समझाया जा सकता है??
फिर
हम संस्कार, और संस्कृति केवल उपदेशों के माध्यम से ही नहीं देते हैं, किन्तु नानी-दादी-माँ के किस्से कहानियां, कवितायें, गीत आदि भी सिरिंज के जैसे, धीरे धीरे व्यक्तित्व की नसों में संस्कार घोलते रहते हैं। बिना भाव को समझे कोई भी, केवल शब्दार्थ से सीख नहीं पा सकता, और जो कुछ भी वो सीखता है, वो अधूरा ही होता है।

ऐसे में किसी और भाषा का उपयोग, संस्कारों और संस्कृति को कैसे सही दिशा दे सकता है? हाँ, कभी ऐसा भी हो सकता है कि "जाना था जापान, पहुँच गए चीन..." वाली हालत हो जाए। जब माँ ही बच्चे की प्रथम शिक्षक हो, और घर ही प्रथम पाठशाला, तो उसकी भाषा याने मातृभाषा तो सबसे महत्त्वपूर्ण होगी ही॥

जीवित हूँ मैं, मुर्दा नहीं....

तूफ़ान उठे,
बिजली गिरी,
झुकी नहीं,
पर नज़र मेरी....

बढ़ता चला,
मैं राहें बना,
गढ़ता गया,
सपना नया....

धरती थकी,
पर कदम नहीं,
पा लूंगा मैं,
मंजिल नयी...

बेदम नहीं,
बेबस नहीं,
जीवित हूँ मैं,
मुर्दा नहीं....

जयंत चौधरी
माँ दुर्गा को समर्पित
१२ भद्र / ०२ सितम्बर 2010


Saturday, August 28, 2010

मातृभाषा - 1

माननीय पाठकों,
आप सब को मेरा नत-मस्तक प्रणाम,

आज का विषय बहुत सामयिक है।
भाषा किसी भी प्राणी की मूलभूत आवश्यकता होती है।
इसी से हम और आप अपने भावों और विचारों को व्यक्त कर सकते हैं।
सबसे अहम् बात तो यह है कि, मानवों की प्रगति भाषा विकास के कारण ही संभव हो सकी है।
आज विज्ञान जिस ऊँचाई पर उड़ रहा है, वहाँ भाषा के पंखों बिना पहुँचना असंभव है।
यह तो सब जानतें हैं कि ज्ञान को भाषा के बिना आगे बढ़ाया ही नहीं जा सकता।
याने, मानव को उन्नति की मंजिल पर पहुँचने के लिए भाषा के मार्ग पर चलना होता है

भाषा के महत्त्व को स्थापित करने के बाद आइये इस विषय पर विचार करे कि मातृभाषा क्या है।
सर्वप्रथम मैं कहना चाहता हूँ कि, मातृभाषा, मात्र भाषा ही नहीं है, किन्तु उससे भी बढ़ कर है।
मातृभाषा शब्द दो विभिन्न शब्दों से मिल कर बना है... मातर और भाषा....
याने कि मातर या दूसरे शब्दों में माँ या माता की भाषा...

हमारे जीवन में माँ का कितना बड़ा स्थान है, यह व्यक्त करने कि आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि, उसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, सारे समुद्रों के जल को यदि स्याही भी बना दें, तो भी माँ की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। इसलिए, माँ से जुड़ी हर चीज़, एक विशेष स्थान पर होती है। मातृभाषा उसमें से सर्वप्रथम है।

हमारे जन्म लेने के बाद, माँ हमसे जिस भाषा में बात करती हैं, वोही तो माँ की भाषा होती है, वही मातृभाषा होती है, और वो भाषा शिशु की प्रथम भाषा होती है।

पहली बार जिन शब्दों को शिशु सुनता है, जिस भाषा में माँ उससे अपना प्यार और स्नेह व्यक्त करती है, जिस भाषा में लोरी सुना कर सुलाती है, जिस भाषा में बलैयां लेती है, और जिस में ह्रदय से आशीर्वाद देकर हमारी उन्नति की प्रार्थना करती है..... उस भाषा का स्थान कोई और भाषा कैसे ले सकती है??

मातृभाषा -२

लेकिन क्या मातृभाषा का महत्त्व केवल माँ के कारण ही है?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसे समाज में रहने के लिए भाषा की आवश्यकता होती ही है।
बिना भाषा के समाज का निर्माण हो ही नहीं सकता। पशु पक्षी भी भाषा की सहायता से ही समूह में रहते हैं।
उसके बिना समाज या समूह का निर्माण, पालन और पोषण संभव ही नहीं है। हमारी एकता में भी यही सहायक है।

आम तौर पर हमारी मातृभाषा हमारे आसपास के लोगों की भी भाषा होती है। किन्तु कभी कभी स्थान परिवर्तन के कारण मातृभाषा और स्थानीय भाषा अलग अलग हो सकती हैं। उस अवस्था में तो मातृभाषा का ज्ञान और उपयोग और भी महत्व पूर्ण हो जाता है। क्योंकि यही एक चीज हमें अपने परिवार, पूर्वजों, संस्कार और सभ्यता से जोड़े रखती है. उस समय मातृभाषा कम उपयोग के कारण पलती डोर जैसी भले हो जाए, किन्तु हमें पराये आसमान में उड़ते पतंग से लगी डोर की तरह अपनी धरती से बांधे रखती है।

इसके अलावा मानव की भावनाएं जगाने का सबसे अचूक उपाय उसकी मातृभाषा ही है। इस संसार में हजारो भाषाएँ हैं, और अनेको बार हमें दूसरी भाषायों का उपयोग भी करना पड़ता है, दूसरों से बात करने के लिए। किन्तु जब हम अपनी भाषा, मातृभाषा सुनते हैं तो हमारा ना केवल मस्तिषक, किन्तु ह्रदय भी उसे सुनता है। हमें उस व्यक्ति के प्रति अधिक प्रेम और विशेष झुकाव हो जाता है जो हमारी मातृभाषा में बात करता है. शायद यही कारण है की बहु-राष्ट्रीय कंपनियां भी, अपने सामान का विज्ञापन उस स्थान की 'मातृभाषा' में ही कराती हैं.

एक और ध्यान देने लायक बात है की हर व्यक्ति विशेष परिस्थितियों में, जैसे अत्यधिक प्रेम, क्रोध, डर आदि में अपनी मातृभाषा में ही बात करता है... क्योंकि वो उसके मन की आवाज होती है। याने किसी के मन तक सीधे बात करनी हो तो उसकी मातृभाषा में ही करना चाहिए। यह नुस्खा बड़े बड़े व्यापारियों को भी आता है।

मातृभाषा ज्ञान अर्जित करने के लिए भी उपयोगी हो सकती है। आज के विज्ञान और तकनीक के जमाने में भी कई देश, जैसे फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन और रूस अपनी मातृभाषा में ही विज्ञान और तकनीक पढ़ते, सीखते और विकसित करते हैं॥ और ये देश किसी भी द्रष्टि से संसार में पीछे नहीं हैं।

आखिर में यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि अपनी जड़ों, याने अपने परिवार और संस्कार पर हर इंसान को गर्व होना चाहिए, बिना उसके इंसान अधूरा रह, कटी पतंग जैसा भटकता है। उस जड़ तक पहुँचने कि डोर केवल मातृभाषा है.....

जीवन में जितनी महवपूर्ण माँ हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण है उसकी भाषा, याने कि मातृभाषा...

Wednesday, July 7, 2010

~ कबहू बुरा ना बोलिए... ~ जयंत


बुरा ना कबहूँ बोलिए, चाहे क्रोध ताप चढ़ जाय
वाणी ऐसन बाण है, जो कबहूँ व्यर्थ ना जाय

(चाहे कितना भी क्रोध जाए, बुरे वचन नहीं बोलने चाहिए। वाणी के बाण, कभी व्यर्थ नहीं जाते। ये बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को चोट पहुचाती है। बोलने वाला इसलिए, क्योंकि उसके जो भी अच्छा किया वो उसके बुरे वचनों से नष्ट हो जाता है,॥ और सुअने वाला तो घायल होता ही है॥)

हिरदय को वाणी बिंधे, नहि बाणन में वो घात॥
अवसर पे ना रोके तो, बरसन रहे पछतात॥
(वाणों में ह्रदय को आघात पहुंचाने की वो शक्ति नहीं होती, जो वाणी में होती है॥ वाणों का घाव समय आने पर ठीक हो जाता है... किन्तु वाणी काप्रहार समय समय पर चुभता रहता है.. यदि समय रहते उन शब्द-वाणों को ना रोका गया, तो उसने होने वाले चोट/अनिष्ट के कारण, वर्षों तकपछताना होता है...)

वाणी से जो मन छिदे, धागा नहि सिल पाय
पंख कटे फिर से सिले, पाखी उड़ नहीं पाय
(जो मन वाणी से छिद गया हो, उसे धागा भी नहीं सिल पाता। उसकी उमंग, प्रेम और प्रसन्नता उस पंख कटे पक्षी की जैसी हो जाती है, जो उन पंखों केसिले दिए जाने के बाद भी जो उड़ नहीं पाता॥)

~जयंत चौधरी
१३ आसाढ़ / जुलाई
(माँ सरस्वती की प्रेरणा से, मेरे मित्रों अर्चना और मनीष को एक भेंट..)



Sunday, July 4, 2010

* सीने में जब आग जलेगी *

सीने में जब आग जलेगी,
फौलाद तभी पिघलेगा...

भट्ठी में जब लपट उठेगी,
नस नस में फिर वो बहेगा...

मन में वो द्रढ़ता लाएगा,
बाहों की शक्ति बनेगा...

पर्वत भी आकर टकराएँ,
उनका विध्वंस करेगा...

अग्नि पथ पर बढ़ने वाले,
कदमों को ना रुकने देगा...

कठिनाई की तूफानी बारिश में,
यदि
उस आग को ना बुझने देगा ...

(तो,)
जल
कर, तपकर, चलकर, लड़कर,
एक दिन, लक्ष्य
को तू पा लेगा...


* माँ दुर्गा को समर्पित *
~ जयंत

Wednesday, June 16, 2010

** काँपते हाथों में **

है यकीन मुझे,
जानता हूँ, कि
तेरे काँपते हाथों में,
जान अभी बाकी है...

माना बहुत है,
पर, तू भार उठा,
जोर लगा, कि
अरमान एक बाकी है....

यह जिंदगी,
एक प्याला है,
और मौत,
तेरी साकी है...

पीता चल,
चलता चल,
जब तक,
जाम एक बाकी है....

मधु बहती है,
कविता उड़ती है,
पंखों में थोड़ी
उड़ान अभी बाकी है....

अरमान अभी बाकी है..
थोड़ी जान अभी बाकी है...


जयंत

Wednesday, June 2, 2010

ढूंढ़त है तब पावत नाय




ढूंढ़त है तब पावत नाय, पावत है तो जानत नाय,
जान सके तो जान ले मनवा, हाथन फिसलत जाय...


जीवन में मानव कितनी ही चीजों को ढूंढ़ता रहता, जैसे शांति, प्रेम, समय, सुख, भगवान् आदि.
और जब वो पास में होती हैं तो या उन्हें पहचानता नहीं, या फिर उसकी कीमत नहीं जानता.
उन्हें पहचान कर, उनको सम्हाल कर रखना अति आवश्यक है... हाथों से फिसलने नहीं देना है.

जयंत
जून २, २०१०

Thursday, May 27, 2010

...इश्क ऐसा ही सही...


हम जिन पर मर मिटे,
उन्होंने कभी जाना भी नहीं,
इश्क करना खता है, तो,
इसकी ये सजा ही सही...

मेहँदी की जगह पिस गए,
कितने ही अरमान मेरे,
बस यह सोच के खुश हूँ,
कि, निखर गए हाथ तेरे...

ख़ुशी दो पल की माँगी थी,
जन्नत की फरमाइश न थी,
बहुत थी, दो गज जमीन ही,
सारे जहां की चाह ना थी....

कहाँ का आसमान,
और कैसी ऊँचाई,
ना खुदा मिला,
ना उसकी खुदाई...

मुरझाते हैं गुल,
बहार में कैसे,
बड़ी मुद्दतों के बाद,
अब हम समझे,
दौर--बदनसीबी से,
जब सिफर खुद गुजरे ...

~सिफर (कभी कहीं ये रूप भी..)

Monday, May 17, 2010

~ सतरंगी हुए सपने मेरे ~















सतरंगी
हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे,

जीवन
से मिटे हैं अँधेरे,
रातों को मिले ज्यों सबेरे,
और मधुमय हुए हैं बसेरे,
डाले खुशियों ने मन में डेरे...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

करवट बदली इस जिंदगी ने,
और आखें खोली पलकों ने,
ख़ुशी मन में लगी है घुलने,
मरू में नेह लगी बरसने...

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

फैलाए पंख अरमानों ने,
आशाएं उठ लगी उड़ने,
बांधा था जिन्हें निराशा ने,
वो पग पल पल लगे उठने....

सतरंगी हुए सपने मेरे,
जब से पड़े हैं कदम तेरे....

जयंत चौधरी
मई १८, २०१०

Thursday, May 13, 2010

*** बूँद रक्त की, बाँकी है एक ***

मन में क्यों, रखता है भय,
होगी बस, तेरी ही विजय,
मन का, छोटा सा संशय,
बन बैठेगा, तेरी पराजय..

तू आज, हार को हरा दे,
पराजय को, पराजित कर दे,
बस आज, विधान को बदल दे,
तू ख़ुद ही, लकीरें खींच दे...

जो हाथ हैं, तो उनको उठा,
औ कदम हैं, तो उनको बढ़ा,
तुझे, बैठने से क्या मिला,
तू उठकर, ख़ुद भाग्य बना....

बूंद रक्त की, बाँकी है एक,
श्वांस अभी, बाँकी है एक,
नहीं देना, तू घुटने टेक,
जीवन तेरा, अब भी है शेष...

~
जयंत चौधरी

Wednesday, March 24, 2010

एक दिया बुझ गया


जीवन था उसका क्षणिक,
तेज था किन्तु अधिक,
कई दीयों को कर प्रज्वलित,
एक दिया, अचानक बुझ गया....

नकारात्मकता हुयी हरित,
और मन का तम हुआ मृत,
करके जीवन-राह प्रकाशित
एक दिया, आंधी में बुझ गया....

आत्मा को रखके पवित्र,
करके हम सबको मोहित,
छोड़ गया हमको वो मित्र,
एक दिया, अनंत-लीन हो गया...

जाना है सबका निश्चित,
हम कह ना पाए विदा मित्र,
पर यादों में तुम हो जीवित,
एक दिया, मन में जल गया....

एक दिया..... बुझ गया...
एक और दिया.... जल गया...


~जयंत
(मेरे प्रिय मित्र के अचानक जाने के बाद आभास हुआ की जीवन कितना निष्ठुर और क्षण भंगुर है॥ मैं आज भी यकीन नहीं कर पाता हूँ की वोह गया...... बहुत नेक और सच्चा इंसान... चला गया...)

Tuesday, January 26, 2010

तुम कैसे अमर हो जाते हो?? (~जयंत)




बर्फीली चोटियों पर तुम,
क्यों अपना शरीर गलाते हो?
जम जाता है जहाँ समय भी,
क्यों अपना रक्त बहाते हो?

तपती मरूभूमि में तुम,
क्यों अपना बदन झुलसाते हो?
जल जाता है जहाँ लौह भी,
तुम कैसे साहस बचाते हो?

पथरीले उत्तंग पहाड़ों पर तुम,
क्यों अपने घुटने छिलवाते हो?
पनप ना पाये जहाँ कृशा भी,
तुम कैसे द्रढ़ता उगाते हो?

घने कटीले दुर्गम वनों में,
क्यों त्वचा-खंड छोड़ आते हो?
पहुँच ना पाये जहाँ रवि भी,
तुम कैसे गश्त लगाते हो?

क्षण भर में तुम कैसे,
क्यों जीवन दांव लगाते हो?
बोलो, भारत माँ पर तुम,
क्यों सर्वस्व लुटा कर जाते हो??

एक टुकड़ा मिट्टी के लिए,
क्यों तुम, ख़ुद मिट्टी बन जाते हो?
उस मिट्टी में मिलकर भी,
तुम कैसे अमर हो जाते हो??



~Jayant Chaudhary

(Gantanrat Diwas par mere desh ke sachche naagarikon ke liye shraddhaa-suman samarpit hain.)

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