Wednesday, June 24, 2009

भगत सिंह (नाटक - नवीनतम - भाग १) ~ जयंत

भूमिका:
(बटुकेश्वर दत्त... अब बूढे हो चले हैं... बैठे हैं एक कुर्सी पर... एक अखबार पढ़कर रखते हैं... और जनता से बोलते हैं..)

मैं हूँ बटुकेश्वर दत्त...
मैंने वही हूँ जिसने भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंघ, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीरों और देश-प्रेमियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर फिरंगिओं से लड़ाई की थी॥ एक दिन हमने पंजाब असेम्बली में धमाका कर ब्रितानी हुकूमत की नींव को हिला दिया था॥ परवाह नहीं थी हमें अपनी... सिर्फ़ एक ही चाह थी, वतन और हमवतन लोगों की आज़ादी॥
(भावुक होकर)
वोह एक और समय था... आज कुछ और समय है॥
आज़ादी से लेकर आज तक, देश की हालत कैसे बदल गई है। हम भारत वासियों की भावना भी कैसे बदल गई है॥ वो जज्बा, वो जूनून जो देश पर, अपने वतन पर मर-मिटने और उसके लिए कुछ करने का था, आज सिर्फ़ अपने तक सिमट कर रह गया है...
आज के हालत देख कर आपको उन दिनों के बारे में बताने का मन करता है॥
आज भी मुझे याद है... भगत कैसे गाता था....
मैं वहां था उस समय भी....

द्रश्य १:
(भगत सिंघ एक बेंच पर बैठे हैं, भावावेश में ... गाते हुए.... "मेरा रंग दे ... बसंती चोला... मेरा रंग दे.." और फिर राजगुरु और दत्त आते हैं ... भ = भगत सिंह, दा = बटुकेश्वर दत्त, रा = राजगुरु)

दा : भगत.... क्या हुआ? आप इतने बेचैन से क्यों गा रहे हैं??
भ: (ध्यान हटा कर) आइये... राजगुरु और बटुकेश्वर भाई...
मुझे आज जलियांवाला बाग़ याद आ गया...
दा: (भाव में) उसे कोई कैसे भूल सकता है॥ फिरंगियों ने नर संहार का जो खुनी खेल खेला था वोह सदियों तक जनता भुला नहीं पाएगी।
भ: सैकड़ों निहत्थे लोगों को, जो शान्ति से भाषण सुन रहे थे, जनरल दायर ने घेर कर गोलियों से भून डाला। औरतों, बच्चों, बूढों को भी नहीं छोडा॥
रा : (दुःख से) लोगों ने अपने कानों से सुना था वो कह रहा था "भीड़ पर गोली चलाओ, उन्हें मारो, सबक सिखाओ"... खून की नदियाँ बह गई...
दा: कोई चेतावनी नहीं दी गई। बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। भागते हुए लोगों, मरते हुए बूढों, माताओं, बच्चों की चीताकारें आज भी गूंजती हैं॥
: (क्रोध में) मैं पूछता हूँ, क्या गलती थी उनकी?? सिर्फ़ यह की वो परतंत्र बन कर नहीं रह सकते थे? अपनी मातृभूमि पर उस विदेशी सरकार को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो सिर्फ़ हमारा खून चूस कर अपना खजाना भर रही है??
(जोश में जाकर एक बोतल लातें हैं जिसमें खून से सनी मिटटी है) यह मिटटी मैंने जलियांवाला बाग़ से उठायी थी॥ इसकी कसम ली थी की जो खून बहा वोह व्यर्थ नहीं जायेगा। उन मासूमों की आवाजें हमेशा याद दिलाएंगी हमारा कर्तव्य क्या है॥ वो आवाजें भारतवासियों की सोई आत्मा को झिंझोड़ के उठाएगी और उसे मजबूर करेंगी गुलामी की जंजीरें काटने के लिए।
(गुस्से में)... जो खून वहाँ बहा, वोह ऐसा सैलाब लाएगा जो फिरंगी सरकार को बहा ले जायेगा। वो खून भरी मिटटी भारत की मजबूत नींव बनेगी...
रा : (दुःख से) हमारे देश की नींव?..... कैसे बनेगी यह मजबूत?? पूरे देश में बटवारे के बीज बोए जा रहे हैं... नफरत की आग को बढाया जा रहा है।
दा: फिर यह फिरंगी हमारी आपसी लडाई का फायदा उठायेंगे... यह हमें आज तो आज, कल भी एक नहीं होने देंगे। हमारी एकता इनकी सबसे बड़ी दुश्मन है।
: (क्रोध में) इन फिरंगियों की यह वर्षों पुरानी चाल है। फ़ुट डालो और राज करो, यह तो इनकी नीति है। इसी तरह से इन्होने पुराने राजा और रजवाडों को आपस में लड़वाया, उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाया। धीरे धीरे इन फिरंगियों ने सारे भारत को निगल लिया।
रा : यही तो दुःख की बात है। आज भी इसी "फ़ुट डालो, और राज करो" का सहारा ले रहे हैं। कहीं धर्म के नाम पर, तो कहीं जात के नाम पर ये साम्राज्य वादी सरकार हमारी कमजोरी का फायदा उठाना चाहती है।
दा: (जोश में) लेकिन, अब वोह बात नहीं, हम सब जागरूक हो गए हैं। हमारी "नौजवान भारतीय सभा" ऐसे लोगों का संगठन है जोह जानते हैं के धर्म, जात, भाषा की विभिन्नता कोई मायने नहीं रखती, हम सब सबसे पहले सिर्फ़ भारतीय हैं, बाकी बाद में।
: (जोश में लेकिन गंभीरता से) हम सब भारतीय एक हैं। हम इसी मिटटी से बने हैं,इसी मिटटी पर पले, इसी मिटटी का अन्न खाकर बड़े हुए, इसी मिटटी पर एक दिन, इसी मिटटी के लिए हंसते हंसते मिट जायेंगे।
दा : ईश्वर करे ऐसा ही हो। अपने देश पर सब कुछ लुटा देना ही सर्वोत्तम कर्म है।
रा : मित्रां, इसी लिए तो हम सब साथ हैं..... भारत माँ की विजय होगी और फिरंगियों की पराजय॥
: ऐसा ही होगा... (जोश में) और उस दिन के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं... (शांत हो कर) अब चलिए हमें बाकी क्रांतिकारी साथियों से मुलाक़ात करनी है...

(ऐसा कहकर वो सबको लेकर निकल पड़ते हैं....)

10 comments:

विवेक सिंह said...

बहुत बढ़िया !

परमजीत बाली said...

नाटक पढे बहुत समय हो गया।बढिया लिखा है।सुन्दर प्रस्तुति।बधाई।

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर राषट्रप्रेम मे सराबोर बडिया नाटक के लिये बधाई

Priyanka Singh Mann said...

bhagat singh ki baat likhi jai aur main na padhun yah ho nahi sakta..aur padhane ke baad jo anand ki anubhuti hui use bayan nahin kar sakti...veer shaheed amar rahen..bahut umda lekhan,kya kabhi bacchon dwara school main karvana sakti hun par yadi aap anumati den to,..bahut shubhkamnayein!!!

AlbelaKhatri.com said...

dhnya hain jayantji aap aur aap ki lekhni...
waah
waah
aapne to deshbhakti ka jwaar la diya...

badhaai !

AlbelaKhatri.com said...

dhnya hain jayantji aap aur aap ki lekhni...
waah
waah
aapne to deshbhakti ka jwaar la diya...

badhaai !

Jayant Chaudhary said...

प्रियंका जी,

आपने पसंद किया... बहुत अच्छा लगा.
और आपने इसे मंचन करने की बात की... बहुत बहुत अच्छा लगा.
इसलिए नहीं कि मैंने लिखा है, इसलिए कि कोई तो भगत सिंह और साथियों की बात सामने लाएगा..
और बच्चों के द्वारा, बच्चों के सामने हो... यह तो सोने पर सुहागा हो गया!!

आप अवश्य प्रस्तुत करें और मुझे बताएं यदि कोई परिवर्तन करना हो (यदि बच्चों को दिक्कत आती हो संवाद आदि में तो).
कुछ विनती है.
१) उस नाटक का एक चित्र (फोटो) अवश्य भेजें या पाने ब्लॉग पर लगाएं.
२) बच्चों से एक बार वन्दे मातरम् अवश्य कहलायें... ये मेरी रायल्टी होगी (बुरा ना माने... पहली बार मौका मिला है... तो वसूल कर रहा हूँ. :))

आपके इस प्रयास में माँ सरस्वती आपके साथ हों... इन्ही मंगल कामनायों के साथ...

आपका आभारी,
~जयंत

Jayant Chaudhary said...

विवेक जी,

आप पहली बार दिखे... आपके आगमन का बहुत धन्यवाद..

आपका आभारी,
~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अलबेला जी...

अब आप अलबेला से... प्रियबोला हो चलें हैं.. :))
हमेशा कर्ण-प्रिय बातें ही करते हैं.
धन्यवाद.

आपका आभारी,
~जयंत

Jayant Chaudhary said...

बाली साहेब,

आप जैसे नाटक के कदरदान भी हैं... वाह मैं तो धन्य हो गया..

आपका आभारी,
~जयंत

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