Thursday, June 25, 2009

भगत सिंह (नाटक - नवीनतम - भाग २) ~जयंत

द्रश्य :
(चंद्रशेखर और सुखदेव बैठे हैं... पीछे से भगत, दत्त और राजगुरु आते हैं)

: साथियों, आपका परिचय करा दूँ। (इशारे के साथ) आप हैं राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, और आप हैं चंद्रशेखरआजाद।
दा: मित्रों, आप सब को पता होगा की आज की सभा लाला लाजपत राय जी की शहादत के सिलसिले में बुलाई गईहै।
सु: (क्रोध में) जब लाला लाजपत राय जी "साइमन कमीशन" के ख़िलाफ़ जुलुस में नारे लगा रहे थे, तो इनजालिमों ने उन्हें घेर कर बुरी तरह से मारा था। भगत भाई आप तो वहां थे। ...
भ: (बीच में, दुःख और आवेश में)... जी हाँ, और मैं कुछ नहीं कर पाया। फिरंगियों ने अपने आदेश से निहत्थे लाला जी को लाठियों से पिटवा कर उस महान देशभक्त का जिस्म छलनी करवा दिया। फिर भी लाला जी के शेरदिल इरादे ने हार ना मानी... फिरंगी टट्टुओं से मार खाते रहे...पर नारे लगाते रहे। हर वार के साथ उनकी आवाज़ बुलंद होती रही... जब तक शरीर ने साथ दिया तब तक...
सु
: (आवेश में) अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की इतनी बड़ी सजा ? सिर्फ़ अहिंसक आन्दोलन के बदले में इसतरह का दमन कारी और हिंसक जबाब?
: पंजाब केसरी लाला जी का बलिदान उन्हें बहुत महँगा पडेगा। उन्होंने लाला जी को ही नहीं पुरे हिन्दुस्तान कोमारा है। हम उन्हें बता देंगे की हिन्दुस्तानी खून को ललकारना कितना महँगा है॥
: (कठोर बन कर) हम भी ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। हमारी रगों में भी खून दौड़ता है, पानी नहीं। हम वंशज हैं राणा प्रताप, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, गुरु तेग बहादुर और करतार सिंह सराबा के । स्वतन्त्रता की असीम चाह और इसके लिए जरूरी वीरता हमें विरासत में मिली है॥
" जो वतन के लिए ना उबले, वोह खून नहीं.. पानी है,
जो मातृभूमि पर ना लुट जाए, वोह बरबाद जवानी है..."
आ: (जबाब में)
"रंग लाएगी हमारी हसरत, जब लहू पुकारेगा आस्तीन का..."
रा: (उसके जबाब में)
"सैकड़ों सालों से होती रही है ये कोशिश,
कातिलों से भी नहीं बुझता है ये आतिश,
जलती रही है शम्मा--आज़ादी--वतन,
हसते हुए जल जाएँ उसमें, है बस यही ख्वाहिश..."
दा: (सबका जोश देख कर) वाह भाई वाह।
"खूब जमेगी महफिल--हिंद, जब मिल बैठेंगे हम दीवाने,
हंसते हँसते जल जायेंगे, शम्मा--आज़ादी के परवाने"
: अब हम परवानों को मिल कर बदले के लिए योजना बनानी है॥ हमें सिर्फ़ जोश से ही नहीं, होश से भी कामलेना होगा... एक बात का हम सबको ध्यान रखना है... कोई भी निर्दोष नहीं मरना चाहिए।
: नाही घायल होना चाहिए, हमारा लक्ष्य स्कॉट है॥ और सिर्फ़ स्कॉट (क्रोध से)
दा: योजना इस प्रकार है...
<सब मिल कर बैठ जातें हैं... योजना बनाने हेतु॥ खुसफुसाहट होती है.. पार्श्व भूमि में गान चलता है...><औरआवाज खो जाती है पीछे से उठते "वंदे मातरम..." गान में॥><अंत में>
आ: तो यह तय रहा। ... बोलिए वंदे मातरम्॥
सारे: वंदे मातरम।

<सारे चले जाते हैं... सिर्फ़ दत्त जी रह जाते हैं>
दा: फिर पहचान की गलती से स्कॉट की जगह सांडर्स का वध कर दिया गया... किंतु वोह भी दोषी था और मेरे वीर साथियों ने एक पापी, आत्याचारी और क्रूर फिरंगी को उसके कर्मों की सजा देकर भारत माँ की गुलामी की जंजीर से एक कड़ी को काट डाला।
लेकिन, यह काफी नहीं था....
फिर एक बार...... एक और सभा में....


जिस प्यार से आपने प्रथम भाग को पसंद किया... उसे देख कर मैं आपके सामने द्वितीय कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ...
आप सब का धन्यवाद...

~जयंत

5 comments:

ओम आर्य said...

ek bahut sundar prayaas jisame ...............rachana anupam hai............likhate rahe

अमिताभ श्रीवास्तव said...

प्रिय जयंतजी,
आपका यह पक्ष भी उतना ही प्रभावी है जितना कि कविताओ वाला है. पसन्द आया/
मुझे अब हैरत नही होती, इसलिये कि आपमे प्रतिभा का खजाना भरा पडा है. और अब तो मै यही कहुंगा कि कुछ ऐसे ही प्रयास आप करते रहे ,लेखन की जो कला है वो कुलांचे मारती हुई स्वर्णमयी हीरन की तरह सभी के मन को लुभाती रहेगी.//आत्मीय कामनाये

गौतम राजरिशी said...

इतने थोड़े दिनों में आपकी लेखनी का फैन हो गया हूँ जयंत मैं तो..

तो ये यही नाटक है जिसका जिक्र आपने प्रियंका जी के पोस्ट पर टिप्पणी में किया था?

अमिताभ श्रीवास्तव said...

knha he jayantji aap??????

निर्झर'नीर said...

aapke har shabd se desh prem ki khushboo aati hai..

vande-matram

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