Wednesday, June 24, 2009

मन जिसका जैसा रहे, वैसा देखे आँख (~जयंत)


मन
जिसका जैसा रहे, वैसा देखे आँख,
कूड़े सी ताते दिखे, स्वर्ण मुद्रिका लाख


- मन के भावों ने अनुसार, द्रष्टिकोण भी बदल जाता हैसंसार में प्राणी को वोही दिखाई देता है जो वो देखना चाहता हैजिसके मन में गन्दगी है, उसे स्वर्ण का ढेर (याने गुणों की खान) भी कूड़े (दुर्गुणों) जैसा ही दिखता है.. याने गुण युक्त वस्तु या व्यक्ति भी दुर्गुण संपन्न दिखती है। सुंदर गुलाब में भी काटें और कमल दल के नीचे कीचड़ यथार्थ हैं, किंतु उन पुष्पों के गुणों को कम नहीं करते हैं, वरन, बढ़ाते हैंयदि काटों और कीचड़ को ही देखते रहें तो देखने वाला उन पुष्पों के गुणों से वंचित रह जाता है

- दूसरा अर्थ है...
यदि मन में ज्ञान है, सच्चा प्रकाश है... तो उस ज्ञानी को लाखों स्वर्ण मुद्राएँ भी कूड़े जैसे ही दिखती हैं... क्योंकि उसे भौतिक वस्तुओं के यथार्थ मूल्य का ज्ञान होता है

~जयंत
२२ जून २००९
(माँ श्वेता को एक और भेंट समर्पित..)

3 comments:

ओम आर्य said...

bahut sundar rachna

Udan Tashtari said...

आभार-इन सदविचारों के लिए.

हिमांशु । Himanshu said...

माँ सरस्वती ही आपकी पथ-प्रदर्शक हैं, इसीलिये ही न इतने शुभ विचार लिख रहे हैं आप यहाँ । प्रविष्टि का आभार ।

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