Tuesday, June 23, 2009

< विदेशों में हिन्दी में जो लेखन हो रहा है वह सब दो कौडी का है > (~जयंत)


एक
'वरिष्ठ लेखक' के एक साक्षात्कार से कुछ पंक्तियाँ मेरे मन को कचोट कर रह गयीं, नीचे देखें.....


"यह कहना मुश्किल है की इसका (विदेशों में हो रहे हिन्दी के लेखन) हिन्दी पर कितना प्रभाव पड़ेगा. दो टूक कहूँतो शायद कुछ भी नही. पर एक चीज साफ़ है की मॉरीशस के अलावा विदेशों में हिन्दी में जो लेखन हो रहा है वह सब् दो कौडी का है सारा लेखन अपने को लेखक या पत्रकार के रूप में स्थापित करने की कोशिश भर है."

मैं भी विदेश में हूँ... और अपने सुख के लिए ही लिखता हूँ...
जैसा की पूजनीय तुलसीदास जी ने भी लिखा था..."स्वान्तः सुखाय"!!
उन्हें भी 'पंडितों' ने कहा था... की क्या दो कौड़ी का लिखते हो??

मेरी कोई औकात ही नहीं है।
मैंने तो कभी अपने आप को 'स्थापित' करने का प्रयास नहीं किया।
और यदि कोई विदेश में रहने वाला भारतीय करता भी है हिन्दी के माध्यम से... तो अनुचित नहीं है।
यहाँ रह कर हिन्दी की जोत जलाए रखना बहुत टेढ़ा कार्य है॥

हिन्दी के पाठक और प्रेमी यहाँ ढूंढे से भी नहीं मिलते हैं।
हाँ 'बॉलीवुड' का कार्यक्रम है तो देखिये क्या भीड़ उमड़ती है... किंतु वो तो 'हिन्दी' के लिए नहीं है!!
हम सब जानते हैं उस भीड़ का कारण।
जहाँ हर व्यक्ति इंग्लिश में बोलता हो... वहाँ हिन्दी की ध्वजा फहराना कैसे सरल हो??

मेरी कुछ दो कौड़ी की पंक्तियाँ समर्पित हैं उन 'पुरोधा, महारथी, महागुरु वरिष्ठों' को...

ये जीवन है दो कौड़ी का...

लेखन है मन मौजी का...
हम दूर रहे पर तोड़ी ना..
हिंदी-डोर सही भले रस्सी ना..

लगे रहे हिंदी के चिपके..
भले आम मिले हो पिचके..
माना तुम गूदा हम छिलके..
किंतु परदेश में हिंदी फैलाते...
संकट में भी हिंदी दीप जलाते..
भले पड़ी हो हिंगलिश की लातें..
करते हैं हम शुद्ध हिंदी में ही बातें..
जो भी बच्चे हमारे पास हैं आते..
हम भारत से अच्छी हिंदी उन्हें सिखाते..

हिंदी का है हुआ कबाड़ा..
आंग्ल भाषा ने उसे पछाड़ा..
सबने पढ़ा उल्टा पहाड़ा..
कहा गया है आपका अखाड़ा??

आप ज्ञानी पुरोधा, मठाधीश हैं...
भारत में हिंदी बचाने में विफल हैं..

अरे जो हिंदी फिल्मों का ही खाते हैं..
'इंटर-वियूह' में इंग्लिश बक जाते हैं..
आप सब मुहँ देखते रह जाते हैं..
फिर भी उसे शान समझ कर आते है..

अब हिंदी बोलना किसकी शान है?
और हिंदी में बोलना अपमान है!!!

बच्चा बच्चा इंग्लिश ही बोले...
फिर देखो माँ बाप गर्व से फूले..
और चले गए सावन के झूले...
हम सब भी अपनी भाषा भूले...

अरे हम तो विदेशी दो कौड़ी के सही..
पर हमने हिंदी भाषा है बचा के रखी..
जहां किसी और भाषा की पौध लगी नहीं..
वहाँ आपका 'सुगन्धित महँगा' गुलाब नहीं..
हमारा दो कौड़ी का पेड़ बबूल ही सही....


~जयंत चौधरी - दो कौड़ी..
(मैंने जानबूझकर इसे दो कौड़ी जैसा ही लिखा है... पाठकों, मैं आशा करता हूँ आप क्षमा करेंगे..)

18 comments:

बालसुब्रमण्यम said...

विदेशों में रहते हुए भी आप हिंदी लिख रहे हैं, इसका मूल्य दो करोड़ भी कम है।

yuva said...

जयंत जी, यकीन मानिए. यहाँ इस शीर्षक का मतलब प्रवासी बंधुओं का दिल दुखाना नही है. इतनी टिप्पणियों के बाद भी 'युवा' की राय यही है की हिन्दी के लिए सभी प्रवासियों के योगदान अद्भुत है.

पर जिन रचनाओं को हम श्रेष्ठ रचनाओं में गिनते हैं वह हमेशा बहुत कम संख्या में होता है चाहे वह कोई भी भाषा हो.
हमने यह साक्षात्कार इसलिए प्रकाशित किया ताकि इस बहाने कुछ अच्छे रचनाकार जो विदेशों में बैठे हैं सामने आयेंगे. अगर आप या कोई आप जैसा उन्हें सामने ला पाते है तो हम समझेंगे की हमारा प्रयास सफल हुआ.

रंजना said...

Link par jakar padhne ki aawashyakta nahi....sheershak ne hi sabkuchh bata diya...

Aapki bhavnao ko naman...

Aise logon ki baton se kabhi hatotsahit na hon...
Pavitra aur mahat uddeshy se sampadit kary na hi kalushit hote hain na hi koi unhe chahkar bhi nasht kar sakta hai...

समय said...

भाई जयंत,
इस तरह से दिल पर नहीं लिया करते।
सच्ची बातें अक्सर कड़वी ही होती हैं, बल्कि कई बार तो कसैलापन ही महसूस करवाता है कि लगता है कुछ सच्चाई है।

अल्पना वर्मा said...

जयंत जी ,मैं ने भी वह लेख पढ़ा था मगर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि मुझे से बहुत अधिक ज्ञानी यहाँ विदेशों में ,और तो और यहीं ब्लॉग जगत में हैं.वे सब चुप हैं क्यों कि किसी एक के कहने से आप किस वर्ग के लेखक हैं क्या यह तय हो जाता है?
नहीं न?फिर क्यों उनकी बातों को इतनी महत्ता दे रहे हैं.जिसे जो कहना हो ,कहे..जिस बात में जितनी सच्चाई है वह सब के सामने है--यहाँ न हिंदी में कुछ पढने को मिलता है न बोलने को फिर भी हम कोशिश करते हैं कि अपने भीतर भाषा प्रेम को जीवित रखें.इस तरह के कमेन्ट जरुर निराश करते हैं..लेकिन हतोत्साहित न हों आप लिखना जारी रखें..हम अप्रवासी जितनी भी कोडी का लिखते हैं हमें ख़ुशी मिलती है कि हम अपनी भाषा से जुड़े हैं.क्या यह हमारे लिए कम है?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लगे रहो जयन्त चौधरी जी।
आपकी दिशा सही है।
साधुवाद।

अविनाश वाचस्पति said...

कौड़ी आजकल चलती नहीं है
तलाशो तो मिलती नहीं है
कौड़ी करोड़ हो गई है
तो कहने वालों को कहें
कि एक करोड़ ही दे दें।

cartoonist anurag said...

bahut badia........
jayant ji aapko badhai...
kabhi mere blog par bhi aaiye
thoda muskura lena........

Priyanka Singh Mann said...

jayantji yahan bharat main har dusra insaan angrezi ki tang todata hua hindi bolne main sharm mahsus kar raha hai vahin aap jaise apravasi bhartiya desh se door rah kar bhi bhasha se itne jude hain..aapko,sameerji jaise mahanubhavon ko itne dinon se padh rahi hun aur yahi kahna chahti hun ki aap jo bhi likh rahe hain ,jis bhaav se likh rahe hain vah amulya hai

Kajal Kumar said...

विदेश में अगर इतना बकवास लेखन हो रहा है तो ये कर्णधार यहाँ ही कौन से स्तरीय लेखन को लोगों के सामने आने दे रहे हैं...सब अपने अपने छत्ते बनाये बैठे हैं...कोई हाथ डाल के तो देखे..कितना आसान है, दूसरों पर ऊँगली उठाना..उफ़

अजय कुमार झा said...

जयंत जी...कभी कभी हिंदी साहित्य की ये बात मुझे बेहद आखर जाती है...आप काबिल हैं अच्छी बात है..मगर इसका ये मतलब नहीं की ..एक बस आप ही काबिल हैं...यहाँ होता है कभी कभी....अजी पाठक सब समझते हैं दो कौडी भी और दो करोड़ भी..इस पोस्ट के लिए धन्यवाद.

Sachi said...

Well said Kajal Kumar! There are many shop keepers from different Universities and institutions who do nothing and also don´t allow anyone to do for academic reserach !

Jayant Chaudhary said...

बालसुब्रमन्यम जी, रंजना जी, समय जी, अल्पना जी, डा. शास्त्री जी, अविनाश जी, अनुराग जी, प्रियंका जी, काजल जी, अजय जी और साची जी,

सादर नमस्कार आप सभी को,

मुझे इस पोस्ट पर इतनी सारी उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ मिली हैं की मन अपार हर्ष से छलक रहा है.
इतने सारे व्यक्ति जिन्हें "मैं" आदरणीय मानता हूँ यदि इतना प्रोत्साहन दें तो क्यों ना लिखूं मैं? और क्यों ना लिखें मेरे जैसे दो कौड़ी के प्रवासी!!

आप सबों का ह्रदय की गहराइयों से धन्यवाद..

~जयंत

RAJ SINH said...

जयंत जी हम चिंता छोडें काम में लगे रहें बस . स्वान्तः सुखाय , स्वानंद लेखन अभिव्यक्ति ही उद्देस हो .

उसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणियों में मुझे भी कुछ कहना पड़ा , जिस से स्वभावतः बचने की कोशिस ही करता हूँ .

हाँ आपकी इसी कविता की शान में भी कुछ कह आया हूँ .

मुझे अपनी नयी पीढी से भी और ज्यादा लिखे जाने की उम्मीद है . ' क्लासिक और दो कौड़ी ' जिसे तय करना हो
करता रहे . बस .

'अदा' said...

जयंत जी,
आपने बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति की है, मैं बहुत आभारी हूँ, की ऐसे व्यक्ति को आपने जगह दिखाई है, मैं आज बहुत ही ज्यादा विचलित हो गयी हूँ, इतनी घटिया सोच पढ़ कर. एक बार पुनः आपका धन्यवाद

Priya said...
This comment has been removed by the author.
Priya said...

Hindi ki jai, hindustaan ki jai, hindustani ki jai.... in bewkoofo ki baaton se tensionn nahi lene ka.......ye angraji bolte bolte mar jayega.... aur antim sanskaar sanskrit janne wale pandit se karwayegay... confused aadmi hain bhai

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aap yadi sat karya me lage he to aapkaa kaam lage rahna he, baaki koi kuchh bhi kahta chale kya fark padhtaa he,sab lage he apne pane karyo me/ karya shubh hota he to falit hona use aavyashak ho jaataa he/ use ishvar bhi rok nahi pata, vo to us karya ke anukool ho jata he.
Hindi likhana, bolana, padhhna, aasaan nahi// aapka karya sukhad he// vyast rahe/ likhate rahe//

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