Wednesday, June 3, 2009

** आख़िर वो भी एक माँ थी.....** (~जयंत)


उस चादर की तरह,
वो भी सिमटी रहती थी,
चादर की सलवटों के जैसे,
उसके जीवन में तहें रहती थी....

उस चादर की तरह,
हर दिन कुचली जाती थी,
चादर की चुप्पी के जैसे,
उसकी जुबान भी बंद रहती थी...

उस चादर की तरह,
यहाँ वहाँ फेंकी जाती थी,
लाचार चादर के ही जैसे,
जिस तिस के लिए बिछाई जाती थी...

उस चादर की तरह,
बाहर से गन्दी होती जाती थी,
पर मन के रेशों में,
वो आत्मा को पवित्र रखती थी...

एक चादर की तरह,
अपने बच्चों को ढांके रखती थी,
और जीवन की बला से,
कम ही सही, उन्हें बचाए रखती थी...

सर्दी की सर्द रातों में,
वो मुनिया के लिए रजाई बनती थी,
जेठ की तपती धूप में,
चादर सी, ममता की छाया देती थी...

अपने छिलते मन से,
वो, रोज अपनी कब्र खोदती थी,
अपनी गहराती शर्म जैसे,
हर दिन उसे और गहरा करती थी...

बाजारू, पुरुषों की नज़र में,
आख़िर वो एक लाचार स्त्री थी,
एक देवी, बच्चों की द्रष्टि में,
आख़िर वो भी एक माँ थी.....


~जयंत चौधरी
०३, जून २००९

काश, हम ये समझ पाते कि, क्यों ऐसा होता है
काश, हम ये समझ पाते कि, क्यों कोई विवश होता है
काश, हम यह जान पाते कि, घनघोर विवशता क्या होती है
काश, हम यह देख पाते कि, कुछ हँसती आँखें अन्दर ही अन्दर कैसे रोती हैं

11 comments:

श्यामल सुमन said...

माँ की ममता का क्या कहना। अच्छे भाव।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

महामंत्री - तस्लीम said...

मॉं की ममता, अपरम्‍पार।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

Sachche bhav m f waale aalekh se sahmat hoon zaraa dekhiye deshakal men unake lie kyaa likha hai
is link pe =>http://www.deshkaal.com/

mark rai said...

other nice piece..thanks..

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहे पढने के बाद बचता कहाँ है कुछ कहने को। अद्भुत।

vandana said...

maa ki vivashta ,uske tyag aur pyar par anupam rachna hai.
bahut gahri hai ye rachna.......lajawaab

Priyanka Singh Mann said...

जयंत जी..बहुत ही मार्मिक चित्रण है। माँ बस माँ होती है,समाज एक औरत में जो भी त्रुटियाँ खोज ले पर अपनी संतान के लिए वह प्रेम और त्याग की सदा बहने वाली धारा है। आपकी रचना माँ के अस्तित्व को नमन तो है ही पर कहीं हमारे समाज पर कटाक्ष भी है ..हमेशा की तरह बेहतरीन लेखन,लगता है जैसे हर शब्द दिल से महसूस कर के पिरोया हो...

AlbelaKhatri.com said...

aapki rachna ko naman hai bhai...
badhai !

Meenakshi Kandwal said...

चादर के किस्मत को भावपूर्ण शैली में विवश स्त्री के साथ रचा आपने।
आपके विचार पढ़कर अच्छा लगा।

अल्पना वर्मा said...

बहुत बढ़िया लिखा है.

Tripti said...

hi jayant,
I loved the last four line, below the poem, and i guess i can answer the last three lines and still searching the answer for the first one, which i know i will never get.
Very true lines for a common person.

Blogvani

www.blogvani.com

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