Monday, June 1, 2009

** वो.. ** (~जयंत)


घर के आँगन में,
अपने से भी छोटे, एक कोने में,
दबा, सिकुड़ा, बैठा था वो...

हवा में उड़ते,
हर ओर से उठते, कोलाहल में,
मधुर संगीत-रस, घोलता था वो...

हर आते जाते,
सजे संवरे, आगन्तुक के नेत्रों में,
उपेक्षा की छवि देख, सहता था वो...

अपने फटे पुराने,
कपडों में छुपते, सूखे फेफडों में,
जलती साँसों से, हवा भरता था वो...

तिड़के सूखे,
प्यासे अधरों पर, बैठ धूप में,
बूढ़ी-जर्जर सी शहनाई, रखता था वो...

धीरे धीरे,
शहद घोलता, जलते से दिन में,
नेत्रों से मूक याचना, करता था वो...

देकर यादें,
जीवन भर की, उस विवाह में,
दो दिन के निर्वाह की आशा, रखता था वो...

किंतु उसने,
ही कर फैलाए, नही घुटने टेके,
केवल कलाकार नहीं, एक मानव था वो....

हाथों से अपने,
बना मधुर स्वर, अपने जीवन में,
जीवन का मीठा गीत, सुनाता था वो...
जीवन का मीठा गीत, सुनाता था वो...

~जयंत चौधरी
२, जून २००९

(भाई की शादी में, एक बुजुर्ग शहनाई वादक को देख कर यह भाव उमड़े थे, जिन्होंने आज कविता का रूप ले लिया॥ उन्हें मैंने बहुत मान दिया और जो हो सकता था किया। उनकी बूढ़ी आखों की चमक आज भी याद है। उन्होंने जो वरदान दिया, आज भी सुनाई देता है। उन्हें, अपने बूढे फेफडों के बावजूद, शहनाई जैसे कठिन यंत्र को बजाना उचित लगता था... किसी और {शायद पुत्र} की दया के सहारे रहने के बजाय। उन्होंने मुझे जीवन जीने का और इसकी अमिट अजर इच्छा-शक्ति का एक नया रूप दिखाया॥ काश हम उन जैसे बुजुर्गों को और ज्यादा मान और सुरक्षित बुढ़ापा दे पाते॥)

8 comments:

अनिल कान्त : said...

बहुत बहुत बहुत बेहतरीन है भाई जी

vandana said...

kisi ke dard ko mehsoos karne wale dil kam hi hote hain aur aap unmein se ek hain.

Priya said...

very touching ! bilkul sajeev lage drashya

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत गहरी और मार्मिक रचना.

रामराम.

ARUNA said...

बहुत गहरी और सुन्दर रचना है जयंत जी !

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत और दिल को छू लेने वाली रचना लिखा है आपने !

neha said...

bahut badiya.......

AlbelaKhatri.com said...

aapka shabd saamarthya aur shailpik sugathan ki jitni prashansa ki jaaye, kam hogi........
IS UMDA RACHNA K LIYE BAHUT BAHUT BADHAI...............

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