Saturday, April 25, 2009

> टेंशन काहे को लेने का? <


एक
दिन, मंजू जी के शिष्य,
भारत भ्रमण पर निकल पड़े,
और इंडिया पहुँच कर,
जोर से चक्कर खा कर गिर पड़े,

अखिल जी ने आज तक,
आज तक वो फोटो है छुपा रक्खा,
जिसमे साफ़ दिखता है,
की उन्हें लगा है बड़ा धक्का,


छात्र बोले, मंजू जी ने,
पता नहीं क्या था बतलाया,
इसे तो हमने वैसा,
बिल्कुल नहीं पाया

हमें हिन्दी के नाम पर,
जाने क्या सिखलाया,
इस देश का तो एक भी
वाक्य समझ ना आया

यहाँ तो हिन्दी हर वाक्य में,
प्रारंभ से पहले ही अंत हो जाती है,
वहाँ पता नहीं हमें क्यों
शुद्ध हिन्दी सिखलाई जाती है?

लगता है हम किसी,
और देश में पधार गए हैं!
जाना था भारत,
और इंडिया में उतर गए हैं!!

लगता है हिन्दी समिति
को हुआ बड़ा घाटा है,
नीतू जी ने किसी सस्ती
जगह का टिकेट काटा है,

पास खड़े नंदलाल जी ने
मुस्कुरा कर कहा,
मैंन,
जब वी मेट, देन
टेंशन काहे को लेने का

इस हिंगलिश को सुन,
छात्र बोल उठे,
वोह क्या था,
हमने ऐसे शब्द कभी नहीं सुने,

नन्दलाल जी मुस्काये,
कुछ इस तरह से समझाए,
अरे, यही तो रियल इंडिया है,
व्हाई तेरा हेड चकराए?

जैसे भी हो, कुछ भी बोल के,
तू क्यों ना काम चलाये,
हिंगलिश की गोली खा ले,
यह मंजू जी की हिन्दी दे भुलाए,

यही तो भाषाई बीमारियों
की एक मात्र दवा है,
आधे से ज्यादा भारत,
इसके ही नीचे दबा है,

इतने में संजीव जी
बीच में जोर से बोल पड़े,
बस करो बस करो,
मिनट हुए आपके पुरे,

इन सबने खा लिया,
मोती और ज्योति जी का खाना है,
जाने भी दो इन्हे,
यहाँ अभी नहीं सुलाना है,

सुनकर सोनल और
ज्योति जी चाय ले आईं,
हैण्ड-आउट लेकर गए,
कल्पना जी और किशोर भाई,

जो गिर गए थे, उन्हें
थापर जी ने उठा के बैठा दिया,
और डॉ धीरे शाह जी ने,
घायलों का उपचार किया,

मौका देख जयंत भाई
अपनी कविता सुनाने खड़े हो गए,
उन्हें देख, जो बचे-खुचे
सही सलामत खड़े थे, वो गिर गए,

छात्रों
के व्यथित मन को,
अशोक जी ने पहुचाया चैन,
अनुपम कविताएं सुना के,
खोले सबके नैन,

अभय जी हर्षित हुए,
हिन्दी का दीपक रहे जलाए,
मीरा जी, निशि जी, परम जी,
और रेखा जी, उसको रही बचाए,

आओ हम संकल्प करें,
सैकड़ों वर्षों का प्रयास व्यर्थ ना जाए,
छोटी ही सही, पर हिन्दी की,
यह ज्योत, कभी ना बुझने पाए...


~जयंत चौधरी
२४ अप्रैल २००९
(डल्लास अमेरिका, में संपन्न "कवि सम्मेलन २००९" के कार्यकर्ताओं पर एक हास्य-व्यंग कविता)
(इस कवि सम्मेलन में भारत से ३ कवि आये थे और SHOW HOUSEFULL था)


4 comments:

Harkirat Haqeer said...

जयंत जी लाजवाब प्रस्तुति.....!!

आपको बहुत बहुत बधाई हिंदी की ज्योत जलाने के लिए......!!

Tripti said...

Good one, and true to some extent.
Keep writing!!

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

लाजवाब प्रस्तुति.बधाई.

ARUNA said...

मज़ा आया पढ़कर जयंत जी!

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