Monday, April 27, 2009

> फटा पुराना कवि : बना नेता - भाग २ <

(क्रमशः)...

उसका उतरा मुख-मंडल देख, हमने फरमाया,
ऐसा ही है तो सुनो ध्यान से मेरे प्यारे भाया,
अब तो जोरों पर है केवल चुनाव का ज़माना,
किसी भी फटीचर पार्टी से प्रत्याशी बन जाना,
थोड़े से अपने, थोड़े से उनके काले पैसे लगाना,
जनता को थोड़ा वादे खिलाना और पिलाना,
कैसे भी हो बहका के, तुम वोट बटोर लाना,

बस एक बार जो बन गए सांसद,
जीवन भर का मिल जाएगा मद,
देश की कौन सोचता है कम्बखत,
बस तू दोनों हाथों से लूट, हर वकत,
बच्चों को बैठा देना अपनी सीट पर,
जब बढ़ने लगे तेरे पाँव अपनी कब्र पर,
सात पीढियां भी तेरी तर जायेंगी,
भाभी भी तुझपे मर मर जायेंगी..

चमक उठा सूरज सा उसका चेहरा,
बोला, बंधू तू ही है सच्चा दोस्त मेरा,
इतना अच्छा उपाय बताकर एहसान किया,
अभी से तुझे मैंने अपना सेक्रेटरी बना दिया,
अब मिल बाँट कर हम तुम खाएँगे,
मेरे संग तेरे बच्चे भी अब तर जायेंगे...

देश के चाचा, हम तेरे हैं बड़े आभारी,
बच्चों के भविष्य की हमको राह दिखा दी,
सच कहते हैं सब, तुमको बच्चे हैं प्यारे,
अब तक भारत पर राज करते बच्चे तुम्हारे,
हम भी अब सच्चे चाचा भक्त बन जायेंगे,
अपने बाद, अपनी सीट पर, अपने बच्चे बैठाएंगे,

बंधू चलो, चलके मैं तुमको पार्टी देता हूँ,
आज बही इसी क्षण से मैं भी नेता हूँ,
तुम मेरे प्रचार अधिकारी बन जाना,
मेरे गुणगान में झूठे मूठे गीत सुनाना,

मैं ख़ुद सुनकर रह गया हक्का बक्का,
कुछ ज्यादा ही चल गया, फेंका था तुक्का,
जो अपनी ही दूकान लुटा बैठा था,
नेतागिरी के नाम पर कैसा ऐंठा था,
ऐसे आदमी का सांसद होना तय था,
पर ख़ुद चक्कर में फंस जाउंगा सोचा ना था,

मैं कहा, भैया सुनो थोडी अरज हमारी,
तुमसे तो ना संभली अपनी दुकानदारी,
कवि होने के संग करली तुमने दान-दारी,
अब कैसे सम्हालोगे नई नवेली नेतागिरी?
कहा जो मैंने थोडा उसपर विचार करो,
नेतागिरी से अब अपना दिल साफ़ करो,

वो गुर्राया, फुँफकारा, गुस्से में थर्राया,
खतरनाक तरीके से मेरे करीब आया,
बोला, पहले तो जोर से आग लगाते हो,
फ़िर अपना हाथ सेंक के निकल जाते हो?
कहो, हो की नहीं तुम मेरे सेक्रेटरी बनते,
वरना चलाऊंगा मैं अपने हाथ और लातें...

धन्य हो धन्य हो, सर झुका के मैंने कहा,
देखते देखते नेतागिरी का पहला गुण सीख लिया,
जब लालच देकर से अपना काम नहीं निकला,
झट से तुमने बाहुबली-पन का सहारा लिया,
अब मुझे दिखता पूरा सीन है,
तू ही जीतेगा, इस पर यकीन है...

पर कविराज, अब तो अपनी कविता को छोड़ो,
अपने पूर्वज कवि सांसद* की हालत से सीखो,
कवि ह्रदय सांसद को कोई नहीं है पूछता,
संवेदना का दिया, यहाँ बहुत जल्दी है बुझता...
* श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी

संसद में भी दान का कोई स्थान नहीं है,
इतने वर्षों में इसने देश को कुछ दिया नहीं है,
उसके गलियारों में केवल खरीददारी होती है,
बाहर बैठी भूखी, नंगी, बीमार जनता रोती है॥

दानी को यहाँ नहीं मिलेगा कभी पानी,
दलाली के बाजार में नहीं संसद का सानी,
दानी तो वो, जो जरूरत मंदों को देता है,
जो उनसे भी छीन के खाए, वो नेता है...

वो बोला, बस मैं सब समझ गया हूँ,
कविता और दान को छोड़ मैं नेता बना हूँ,
कहाँ की दानिशमंदी, और कौन सी कविता,
कौन हैं ये? मैं इनसे कोई नाता नहीं रखता...

उसकी सुनकर, मैं ऊपर से, जोर से हंस पड़ा,
जितना सोचा था, उससे भी ये था घाघ बड़ा,
दल बदल की जो थी इसने झलक दिखलाई,
समझ गए हम, ये था पूरा पक्का नेताई...

अब हो गया यकीं पक्का, कि ये ही जीतेगा,
सांसदों कि परम्परा का पूरा निर्वाह करेगा,
ख़ुद भोगेगा, और देश का काम तमाम करेगा,
और चमकते सांसदों में अपना नाम करेगा...

उस दिन से आज तक, हम रहें हैं पछता,
और हमारे मित्र संसद की शोभा रहें हैं बढ़ा,
लालच, भ्रष्टाचार, बाहुबल, दलबदल,असंवेदना,
आदि को अपना लो भुला के अपनी चेतना,
ये सुझाव हमने मात्र व्यंग में एक ही को दिया,
पर उसने और बाक़ी सांसदों ने सचमुच अपना लिया...
पर उसने और बाक़ी सांसदों ने सचमुच अपना लिया ॥

(ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा, सेवा, कर्मठता, देश-भक्ति आदि को श्रधांजलि के साथ)

~जयंत चौधरी
३० अप्रैल २००९

9 comments:

Mired Mirage said...

बहुत करारा व्यंग्य किया है। किन्तु ऐसा क्यों लगता है कि थप्पड़ हमारे ही गाल पर पड़ा है ? इसलिए तो नहीं कि हमें वैसे ही नेता मिलते हैं जिनके हम अधिकारी होते हैं ?
घुघूती बासूती

mark rai said...

nice and saamyik post...

Jayant Chaudhary said...

Mired Mirage Ji,

आपका कहना सच है.. १००% सत्य.
त्रुटी हमारी ही है...
वरना इनकी क्या बिसात के हम पर राज करें??

आगमन के लिए धन्यवाद,
आते रहियेगा आगे भी...

आपके लेख भी मुझे बहुत अच्छे लगे..

~जयंत

Reecha Sharma said...

very good dost jitne bhi din hum nahi the aapne to sampooran kavyaadhaara ko hi smeat kar la khada kiya hai aapne blog par . keep it up!

Reecha Sharma said...

behtar bahut khoobbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbb

Reecha Sharma said...

keep it up /1

ARUNA said...

वाह..वाह ....आपके लेखन की जितनी भी तारीफ़ करूँ, कम पड़ेगी!

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया रचना ..

निर्झर'नीर said...

samaj or desh ke patan ka ppramukh karan hai aaj ka neta ..aapne katu satya ko vyang roop dekar rachna ki sundarta ko badha diya hai

Blogvani

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