Wednesday, April 29, 2009

" वो मेरा ह्रदय था.."


अंहकार के काले बादलों ने बिजलियाँ जिस पर गिराईं,
छिन्न भिन्न जो हुआ, वो घर नहीं, मेरा ह्रदय था...

ईर्ष्या के जहरीले भुजंगों ने जिसे बेरहमी से डसा,
तड़प तड़प जो मरा, वो हंस नहीं, मेरा ह्रदय था...

विधि के विधान ने जिसे निर्दयता से उठा फेंका,
चूर चूर जो बिखरा, वो दर्पण नहीं, मेरा ह्रदय था...

............................

वास्तविकता की तपती धरा पर,
वो गिरे बारिश की बूंदों जैसे,
और यूँ छन से उड़ गए,
कभी थे ही नहीं जैसे,
सपने बन गए,
मेरे सपने..



~जयंत चौधरी
(४/२९/०९)

14 comments:

shyam kori 'uday' said...

... प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!!!!

अनिल कान्त : said...

वाह भाई वाह ...बहुत ही प्रभावशाली ढंग से लिखी गयी रचना ....जो अपना प्रभाव दिखा रही है

मेरा अपना जहान

अनिल कान्त : said...
This comment has been removed by the author.
Sangeeta said...

जयंत जी
आपकी रचनाये पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है.शायद इसलिये की
मेरे पास भाव है ,शब्द नहीं |.इस कविता की ये लाइन "सपने बन गए ,सपने मेरे "
मेरे मन की भावनाये प्रकट करता है | .............संगीता शुक्ला...

mehek said...

वास्तविकता की तपती धरा पर,
वो गिरे बारिश की बूंदों जैसे,
और यूँ छन से उड़ गए,
कभी थे ही नहीं जैसे,
सपने बन गए,
मेरे सपने..
waah shabd alankar,bhav ka jadu,,yu mann mein basti hai rachana jaise thandi barsat ki fuhaar.sapne bane to sahi magar unki umar sirf palkon tak hi samit rahi,wo ud hi kaha paaye?

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही प्रभावित करती है आपकी ये रचना...!धन्यवाद..अगली रचना का इंतजार रहेगा..

Tripti said...

Nice one!

Jayant Chaudhary said...

महक जी,

क्या बात है.. आपने तो एक और आइडिया दे दिया.
:)

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

संगीता जी,

वो जीवन ही क्या जिसमें सपनें ना हो..

कभी कभी सपने जो सपने ही रह जाते हैं
वोही बेहतर है, क्योंकि वो मीठे होते हैं..
वो हमें ज्यादा सहलाते हैं,
माना, कभी कभी रुलाते भी हैं..

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

उदय जी, रजनीश जी,

पहली बार आने के लिए धन्यवाद..
आते रहिएगा, रखियेगा याद..

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अनिल भाई और तृप्ति जी,

आप हमें सदैव सहारा देते हैं..
कोटि कोटि धन्यवाद...

~जयंत

अमिताभ श्रीवास्तव said...

L_Z_V_A_A_B
bhai, shbdo ke saath jis andaaz me bhaavo ki nadiyaa bahaa rahe ho, sach kahu to ye andaze bayaa aour he.

Jayant Chaudhary said...

अमिताभ जी,

आप जैसे लोगों से ही मेरी कविता साँसें लेती है..
आपकी टिप्पणियाँ, उसमें प्राण फूंकती हैं..

कोटि प्रणाम,
जयंत

Jayant Chaudhary said...

रजनीश जी,

आभारी हूँ आपका...
अगले आगमन की है प्रतीक्षा..

~ जयंत

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