Tuesday, April 28, 2009

> फटा पुराना दानी कवि! <


एक दिन एक पुराना मित्र मिल गया,
उसे फटे हाल देख मैं अन्दर से हिल गया,
जो कभी कार से नीचे ना था उतरा,
चेहरे से लगता था, मीलों पैदल चला,
मुख को ढके हुए थी हफ्तों की दाढी,
कपड़ों से लगता था, हुई पुरी बर्बादी..

हमने कहा, भैया कहाँ थे, क्या हुआ?
उसने सोचा, जानकर ही छोडेगा मुआ!!

बोला, एक दिन मन का भाव जाग गया,
और कंजूस बनिया से मैं, दानी बन गया..

दानवीरता के चलते, मैं कर बैठा बड़ा घोटाला,
एक दिन मुहल्ले में कवि सम्मलेन करवा डाला,
कवियों के संग मंच पर जा कर बैठ गया,
एक कवि से निकल, कविता का कीड़ा मुझे काट गया,

तब से घर के कागज़, स्याही बरबाद करने लगा,
ग्राहकों को पकड़, अपनी कविता सुनाने लगा,
जिनको सामान चाहिए था, बिल्कुल उधार,
सिर्फ़ वोही लगाते थे मेरी दूकान पर कतार,
बस इस कविता के रोग ने उठा के दे मारा,
धीरे धीरे सारे नगदी ग्राहक हुए, नौ-दो-ग्यारा,

हमने कहा, गलती बस तेरी ही है मेरे यार,
तुने ही चिल्ला के कहा, बैल मुझे मार,
कवि तो ख़ुद औरों के दिए दान पर पलता है,
दान देने वाला कवि, लाखों में नहीं मिलता है,
पहले तू दानी बना, फ़िर धीरे से कवि??
ऐसी दुहरी मुसीबत से कोई बचा नहीं...

खैर छोड़, अपना ले अब तू धंधा कोई और,
कविता वविता छोड़ दे, सुझाव पर कर गौर,
वो बोला, क्या आपने सुना नहीं हुआ इतना शोर?
चरों तरफ़ है मचा हुआ, केवल मंदी का जोर..

भाया, अब तो बसे बसाए धंधे उजड़ रहें हैं,
फ़िर आप क्यों मुझे कुएं में धकेल रहें हैं?
दोस्त हो या दुश्मन, बता दो मेरे भैया,
मंदी के भंवर में मत डुबाओ मेरी नैया,
लगता है मेरे जनाजे पर करोगे ता-ता-थैया,
और मुझे याद आयेगी, मेरी मैया की भी मैया..

हमने कहा, तुम पर तो हो गया तीसरा आघात,
इन सबसे तुम सीख लो एक ही छोटी सी बात,
दानी जो कवि बने, ख़ुद अपनी लुटिया देय डुबाय,
जान सको तो जान लो, 'मृत्युंजय' दिया बताय..


(आगे अगले अंक में....)

~जयंत चौधरी
अप्रैल २८, २००९

12 comments:

neha said...

wah wah!!!!

अनिल कान्त : said...

हा हा हा .....वाह मजेदार
कवी बनना और दानी बनना ....हा हा हा

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प !

mark rai said...

very nice poem...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

"अब तो tippani देने (daani) से darne लगा भाई
आपने बात जो pate की हमें bataai//
bane rahnaa hae अभी हमें kamaau pati
kavi banaa तो bahut maaregi hamari lugai(wife)"

oh tukbandi jamne lagi...kherr bahut sundar likhaa he aapne..mazaa aayaa.

शोभना चौरे said...

bhut hi sarlta se apne kvi ki vytha kh di .
dhnywad.
agle ank ka intjar rhega.

शोभना चौरे said...

bhut hi sarlta se apne kvi ki vytha kh di.
dhnywad
agle ank ka intjar rhega

Jayant Chaudhary said...

नेहा जी,

बहुत दिनों बाद आये इधर आप..
चलिए अच्छा लगी आपकी वाह वाह..

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

मार्क और अनिल भाई,
अच्छा है आपको कविता पसंद आई...

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अनुराग जी,

पधारने का धन्यवाद जी,
आगे भी आते रहियेगा जी...

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

अमिताभ जी,

क्या अच्छी आपने कविता सुनाई,
बस, बात वही मानें जो कहें भौजाई..

~जयंत

निर्झर'नीर said...

wahhhhhhhhhhhhhhhh bhai wahhhhhhhhhhhhhhhhh

kya khoob kahi ..hasy ke sath kuch vastvikta ke aaspaas..

man mohak

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