Thursday, April 16, 2009

- विष वृक्ष -



नकारात्मकता,हताशा, कुंठित विचार,
पलायनता, निराशा और हार,
पनपे ना कभी,मन के धरातल पर,
कुछ भी हो जाए,याद रखना मगर,
बना ना पायें, ये कभी अपना घर,

यह वो बूटा है, अरे, सुन बेखबर,
जो साहस की नींव तोडे, विष वृक्ष बनकर,
इससे पहले कि, यह बढ़े जड़ फैलाकर,
मन की धरा से,
फेंक दे तू इसको उखाड़कर...

~जयंत चौधरी
१८ अप्रैल २००९

6 comments:

mark rai said...

fantastic lines.....
ठान ले तो जर्रे जर्रे को थर्रा सकते है । कोई शक । बिल्कुल नही ।
अभी थोडी मस्ती में है । मौज कर रहे है ।
पर एक दिन ठानेगे जरुर ..

रंजना said...

Bahut bahut sahi....in baton ko jo bhi yaad rakh payega hamesha uska jeevan sukh aur safalta se bhara hoga....

Sundar baten bahut hi sundar rachna maadhaym se hame padhwane ke liye dhanyawaad.

The Pink Orchid said...

bahut maarmik panktiyaan hain...

Jayant Chaudhary said...

रंजना जी,

आपकी प्रतिक्रया का धन्यवाद... आपने हमेशा मेरा उत्साह
बढाया है,,

~जयन्त

Jayant Chaudhary said...

मार्क भाई,

सच है,
जर्रे जर्रे को थर्रा सकते हैं...
बहुत खूब.

अभी मस्त रहें, बाद में देखेंगे. :)

~जयन्त

Jayant Chaudhary said...

पिंक ऑर्किड जी,

आप पहली बार आये, पर ये अंतिम बार ना ऐसी आशा करता हूँ.
प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.

~जयन्त

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