Wednesday, March 11, 2009

घिर के आए काले बादल


फिर घिर के आये काले बादल,
साथ में लाये कुछ बिसरे पल....

याद आ गया आज मुझे भी,
कुछ गाने सुन के हिल जाना..
सुनते सुनते उन गानों को,
मीठे सपनों में खोते जाना....

कालेज से वो गोल मार के,
छुप छुप कर के मूवी जाना..
हर हीरो में खुद को देखना
हर हीरोइन से इश्क लडाना...

गम भुला कर सारे अपने,
बैठ यारों संग बातें करना..
ग्रुप स्टडी का कर के बहाना,
रात-रात भर गप्प लडाना...

उस, एक लड़की को छुपकर देखना,
उसके संग जीवन के सपने बुनना..
काम भुला कर सारे अपने,
बस उसे देखते ही रह जाना....

वो, दोस्तों का मुझे छेड़ना
और मेरा झूठा गुस्सा दिखलाना..
सुन अपने संग में उसका नाम,
मन ही मन में मुस्काना...

याद आ गया वो भी एक पल,
मेरा वो मीठे ख्वाब सजाना..
और, मेरी सपनीली आखों के आगे,
उसका वो डोली में बैठ के जाना...

यह कैसे हुआ, क्यों हुआ,
मैंने कभी ना जाना..
बन कर रहा गया वोह,
बस एक सपना सुहाना.....

वो बन गया एक बीता पल,
घिर के आये काले बादल......

~ जयंत
(आधा अधूरा एक मित्र के जीवन पर आधारित ... ०७ मई 2008)

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